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Sahil Hindustaani

Abstract Romance Fantasy

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Sahil Hindustaani

Abstract Romance Fantasy

4 शायरियाँ

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जाने क्यूँ उनकी मुस्कुराहट का तलबग़ार रहता हूँ मैं

जबकि हर बार वो मुझे घायल कर जाती है


ग़ज़ल जैसे सँवारी हुई हो बयाज़ में

ऐसे सिमटी हुई आज वो चादर में


हाए ! कितनी नसीबदार है ज़ुल्फ़ें तेरी

हरदम तेरे रुखसार जो चूमती है


तेरा नाम सुनकर ही, गुलाबी हो उठता हूँ

कैसे कहती मुझे फ़िर, 'तू प्यार नहीं करता।


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