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क्लब ज़िंदगी
क्लब ज़िंदगी
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© Ashish Kumar Trivedi

Drama

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क्लब में रोज़ की तरह ही चहल पहल थी। सब अपने अपने हिसाब से वक्त बिता रहे थे। गोम्स और मेहरा की शतरंज की बाज़ी जमी हुई थी। हमेशा की तरह दो चार लोग उन्हें घेर कर बैठे थे। वह बस दोनों को खेलते हुए देख रहे थे। लॉन में देविका और शबाना के बीच बैडमिंटन का मैच चल रहा था। इन सब के बीच संजीव शांत बैठे थे। आज चार दिन हो गए थे। सुजाता क्लब में नहीं आई थीं।

क्लब ज़िंदगी उन लोगों के लिए था जो साठ साल या उससे अधिक थे। एक एन.जी.ओ ने कुछ रिटायर्ड लोगों की सहायता से इस क्लब का निर्माण किया था। व्यस्त जीवन शैली में लोगों के पास बुज़ुर्गों के लिए वक्त का आभाव था। क्लब ज़िंदगी उन्हें आपस में मिलने जुलने और दोस्त बनाने की एक जगह प्रदान करता था।

तकरीबन एक वर्ष पूर्व संजीव की सुजाता से इसी क्लब में मुलाकात हुई थी। सुजाता कॉलेज की रिटायर्ड प्रोफेसर थीं। उम्र के इस पड़ाव में जब साथी की सबसे अधिक ज़रूरत होती है संजीव की तरह वह भी अकेली थीं। कुछ औपचारिक मुलाकातें हमदर्दी के रिश्ते में बदल गईं। दोनों एक दूसरे के अच्छे दोस्त बन गए। अकेलापन उन्हें साथ लाया था किंतु बहुत सी और बातें थीं जो दोनों को जोड़ती थीं। दोनों को ही पढ़ने का शौक था। दोनों ही पुराने फिल्मी गीतों और गज़लों के मुरीद थे। रोज़ शाम का वक्त दोनों ही क्लब ज़िंदगी में बिताते थे।

सुजाता के पास एक और हुनर था। वह बहुत अच्छी कुक थीं। अक्सर वह संजीव के लिए कुछ ना कुछ बना कर लाती थीं। उनके हाथ की बनी डिश खाने के बाद संजीव हमेशा कहते।

"आप क्यों इतनी तकलीफ उठाती हैं।"

"देखिए ये मेरा शौक है। अब आपके अलावा कौन है जिसे खिलाऊँ। हाँ मेरा बनाया अगर आपको पसंद ना आता हो तो दूसरी बात है। मैं आगे से नहीं लाऊँगी।"

"आपके हाथों में तो जादू है। रश्मी के जाने के बाद मैं तो अच्छे खाने के लिए तरस गया था।"

सात साल पहले संजीव की पत्नी का देहांत हो गया। तब से वह बिल्कुल अकेले पड़ गए। एक बेटी थी जो न्यूज़ीलैंड में थी। अपने काम और घर की ज़िम्मेदारियों में उसे बहुत कम समय मिल पाता था। अतः फोन पर बात भी कई दिनों के बाद हो पाती थी। संजीव को कमी थी तो यही कि उनके पास कोई भी ऐसा नहीं था जिससे मन की बात कर सकें। लेकिन सुजाता की दोस्ती ने उनके जीवन के अकेलेपन को बहुत हद तक दूर कर दिया था।

उन लोगों की दोस्ती को लगभग एक साल हो गया था। लेकिन दोनों कभी भी एक दूसरे के घर नहीं गए थे। सुजाता ने उन्हें एक बार अपने घर का पता देते हुए आने की दावत ज़रूर दी थी पर संजीव गए नहीं थे। संजीव ने पता याद किया।

'दिलकश गार्डन बंगला नंबर २५'

शहर का पॉश इलाका। वहाँ सब बड़े बड़े बंगले ही थे। ढूंढ़ना मुश्किल नहीं होगा। सुजाता का हालचाल लेने के इरादे से संजीव दिलकश गार्डन जाने के लिए क्लब से निकल गए। करीब बीस मिनट बाद वह बंगला नंबर २५ के सामने खड़े थे। कार बंगले के बाहर पार्क कर वह अंदर चले गए।

बंगले के भीतर पहुँचे तो माहौल कुछ अलग ही नज़र आया। तेज़ म्यूज़िक बज रहा था। पार्टी जैसा महौल था। संजीव को लगा कि वह किसी गलत बंगले में आ गए। वह लौटने ही वाले थे कि सुजाता की आवाज़ सुनाई पड़ी।

"अरे संजीव वापस क्यों जा रहे हैं ?"

"मुझे लगा कि मैं गलत बंगले पर आ गया।"

"वो मेरा बेटा, बहू और बच्चे यू.एस. से आए हुए हैं। बस पुराने दोस्तों की महफिल सजी है।"

"तो आप बच्चों के साथ वक्त बिताइए मैं फिर कभी आता हूँ।"

"आप संकोच ना करें। भीतर आइए। बच्चे अपने में व्यस्त हैं।"

सुजाता हॉल की सीढ़ियां चढ़ते हुए उन्हें ऊपर अपने कमरे में ले गईं। कुर्सी पर बैठते हुए संजीव ने कहा।

"आपका बंगला बहुत सुंदर है।"

सुजाता ने दीवार पर टंगी अपने पति की तस्वीर की तरफ इशारा कर कहा।

"सुकेश ने बनवाया था। वह हार्ट सर्जन थे। बागबानी का बहुत शौक था उन्हें। जब फुर्सत मिलती अपने पेड़ पौधों की देखभाल करते थे।"

सुजाता उठ कर कुछ देर के लिए नीचे गईं। संजीव कमरे की सजावट देखने लगे। सुजाता लौटीं तो उनसे पूँछा।

"आपकी बेटी भी आती रहती होगी।"

"अपनी माँ के मरने पर आई थी। मुझे साथ ले जाने की ज़िद कर रही थी। पर मैं गया नहीं।"

"क्यों ?"

"बेटी दामाद दोनों ही अपने काम में व्यस्त रहते। बच्चे अपने में। रहना तो अकेले ही पड़ता। विदेश से तो अपना देश ही भला।"

"वो तो ठीक है। पर समय के साथ शरीर ढलने लगता है। तब किसी के पास होने की ज़रूरत महसूस होती है।"

"अब जब तक चला सकता हूँ ऐसे ही चला लूँगा। फिर देखी जाएगी।"

तभी मेड चाय की ट्रे रख कर चली गई। साथ में मठिरियां भी थीं।

"ज़रूर बच्चों के आने की खुशी में आपने बनाई होंगी।"

सुजाता मुस्कुरा दीं।

"बच्चों के तो टेस्ट बदल चुके हैं। उनके बच्चों ने कभी ये सब चखा नहीं। बस अपनी खुशी के लिए बनाईं हैं। पता नहीं अमेरिका जाकर यह सब बनाने का मौका मिले या नहीं।"

संजीव मठरी तोड़ कर मुंह में डालने वाले थे। सुजाता की बात सुन कर रुक गए। उनके आश्चर्य को भांप कर सुजाता ने कहा।

"अभी मैं बात कर रही थी कि एक उम्र के बाद जब शरीर थकता है तो किसी के साथ की ज़रूरत महसूस होती है। मैं सत्तर की हो गई हूँ। हो सकता है कि कुछ दिन चला लूँ। पर बाद में तो बच्चों के पास जाना ही होगा। सोचा अभी जाऊँगी तो नए माहौल में ढलने में आसानी होगी।"

सुजाता ने चाय का प्याला संजीव की तरफ बढ़ाया। फिर अपने प्याले से एक घूंट भर कर बोलीं।

"सुमित वहाँ अपना बिज़नेस शुरू करना चाहता है। अब मेरे बाद यह बंगला उसे ही मिलता। उसने एक पार्टी खोज ली। बस कुछ औपचारिकताएं पूरी करने के बाद अगले हफ्ते बंगला उन्हें सौंप कर चले जाएंगे। सुमित का वहाँ अपना घर है। पैसे उसके बिज़नेस में काम आ जाएंगे।"

कुछ देर दोनों चुपचाप चाय पीते रहे। सुजाता ने आगे कहा।

"मैं सोच रही थी कि कल परसों में मैं आपसे क्लब ज़िंदगी में आकर मिलूँगी। अच्छा किया आप आ गए।"

उसके बाद फिर दोनों खामोश हो गए। चाय समाप्त कर संजीव ने जाने की इजाज़त मांगी। सुजाता उन्हें ठहरने को कह कर एक बार फिर नीचे चली गईं। लौटीं तो हाथ में एक डब्बा था। वह संजीव की तरफ बढ़ा कर बोलीं।

"ये आपके लिए है।"

संजीव ने उसे हाथ में पकड़ कर कहा।

"शुक्रिया...ये क्या है ?"

"वो मैंने पिछली सर्दियों में मैंने आपको गुड़ सोंठ और आटे की कतली खिलाई थी।"

"हाँ उसमें मूंगफली के दाने और गरी भी थी। बहुत स्वादिष्ट थीं।"

"वही कतली है इस डब्बे में। खाकर मुझे याद करिएगा।"

संजीव को भेजने के लिए सुजाता बाहर कार तक आईं।

"संजीव अपना खयाल रखिएगा।"

"आप भी। आपको अमेरिका में आपके जीवन के लिए शुभ कामनाएं। बच्चों के साथ आपका जीवन सुख से बीते।"

"धन्यवाद..."

संजीव ने सुजाता से कहा कि वह अब अंदर चली जाएं। सुजाता ने हाथ जोड़ कर नमस्कार किया। उनके जाने के बाद संजीव भी अपने घर की तरफ चल दिए।

क्लब ज़िन्दगी इश्क़ दोस्ती साथ अकेलापन उम्र वक्त

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