हमारे सीमा प्रहरी
हमारे सीमा प्रहरी
हमारे सीमा प्रहरी
घटना उन्नीस सौ नब्बे की है। स्कूल की ओर से बच्चों को गर्मी की छुट्टियों के दौरान ट्रैकिंग पर कुल्लू मनाली ले जाने का कार्यक्रम बना था। मुझे और मेरे दो सहयोगी शिक्षकों को 40 बच्चों के ग्रुप की जिम्मेदारी दी गई जिन्हें फ़ैजाबाद से सात दिनों के शैक्षिक भ्रमण के लिए कुल्लू ,मनाली, रोहतांग दर्रे से होते हुए वापस लौटना था।
मैंने अपनी भी दो बेटियों को साथ ले जाने का मन बना लिया जो उस समय तेरह और सोलह वर्ष की थीं। आवश्यक तैयारी करने के बाद हम इस यात्रा का भरपूर आनन्द लेने के सपने देखने लगे। वे सात दिन कैसे गुजरेंगे गए, बच्चों के लिए और हमारे लिए भी शायद यादगार बन जाएंगे। हम तीनों शिक्षकों ने एक- एक लिस्ट बना ली जिसमें किसके साथ कौन से बच्चे होंगे, उनका नाम और उनका पूरा विवरण था। मुझे तेरह बच्चों की जिम्मेदारी दी गई जो 12 से 14 आयु वर्ग के थे। एक बच्चा 8 वर्ष का भी था।
स्टेशन पर सबको इकट्ठा होना था। सभी माता-पिता अपने बच्चों को विदा करने समय से पहुंच चुके थे। ट्रेन आई और हमने सबको बाय बाय किया। बच्चों का उत्साह देखते ही बनता था।
वे सात दिन सचमुच नवीनता और रोमांच से भरे थे। कहीं ऊंचे -ऊंचे पहाड़ों की चोटियां, तो नीचे गहरी खाईयां, नदी और चश्मे, गर्म पानी के झरने, , चारों ओर प्रकृति का सौंदर्य मानो ईश्वर ने दोनों खुले हाथों बिखेरा हुआ था। ट्रेकिंग के साथ-साथ कुल्लू और मनाली शहर भी घूम कर देखा। नग्गर, हिडम्बा देवी का मन्दिर,रोहतांग पास ,रुमसू,चाइना पीक। लंबा अरसा गुजर गया कुछ याद है कुछ भूल गई। हां वह अविस्मरणीय घटना याद रह गई।
ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आकर लग गई ।जब मैने बच्चों को गिनना शुरू किया तो 4 बच्चे कम निकले, ट्रेन छूटी जा रही थी। पुरुष अध्यापकों ने अपने -अपने बच्चों को जल्दी- जल्दी ट्रेन में चढ़ा लिया, उन्होंने यह नहीं देखा कि हमारा ग्रुप नहीं चढ़ पाया । मैं बेहद घबरा गई, अपने बच्चों को खोजने लगी।इस बीच ट्रेन ने प्लेटफार्म छोड़ दिया ।
मैं उन 10 बच्चों के साथ जो प्लेटफार्म पर मेरे साथ थे और (4 अन्य जो वहां नहीं थे) के साथ वहीं प्लेटफॉर्म पर रह गई ।ये सभी छोटे थे, कक्षा 3 से लेकर कक्षा 6 के बच्चे थे। मैं क्लास 12 की अध्यापिका थी।मैं जिम्मेदार मानी जाती थी और महिला होने के नाते मुझे छोटे बच्चों का ग्रुप दिया गया था।जब ट्रेन चल पड़ी तो मेरे कक्षा 12 के 2 छात्रों ने मुझे पीछे छूटते देख लिया, वे तुरंत ट्रेन से कूद पड़े और दौड़े- दौड़े मेरे पास आए।अब तक मेरे होशो हवास मेरा लगभग साथ छोड़ चुके थे। उन बच्चों ने मुझे संभाला और कहा" ,मैम ,आप बिल्कुल मत घबराएं।" मैं सचमुच घबराई हुई थी क्योंकि टिकट मेरे पास नहीं थे, न ही मेरे पास इतने पैसे थे कि सबका टिकट बनवा लेती और वे 4 बच्चे न जाने कहां थे। तभी मुझे वे चारों बच्चे सामने से आते दिखाई दिए। पूछने पर बताया कि किसी एक बच्चे को नेचर कॉल आ गई थी( और मुझे बिना बताए) इसलिए चले गए थे। मेरी जान में जान आई।
अब हम भागे -भागे इंक्वायरी काउंटर पर पहुंचे, वहां जाकर पता चला 20 मिनट बाद दूसरी ट्रेन आएगी ,मगर उसका स्टॉपेज केवल 2 से 3 मिनट का ही है। मैंने बच्चों को हिदायत दी कि सभी जल्दी से किसी भी तरह , किसी भी डिब्बे में चढ़ जाएंगे।उन दिनों डिब्बे इंटरकनेक्टेड हुआ करते थे। आधे घंटे बाद जब दूसरी ट्रेन आई, सौभाग्य से हम सभी चढ़ने में सफल हो गए। मेरी छोटी बेटी भी मेरे साथ थी। इस भागा- दौड़ी में उसके कान का एक बाला भी कहीं गिर गया।
कंपार्टमेंट में पहुंचकर देखती क्या हूं ,वह बोगी सीमा के नौजवानों की रिजर्व थी। अब मुझे काटो तो खून नहीं, क्योंकि बहुत सी उल्टी -सीधी बातें सेना के सिपाहियों के बारे में सुन रखी थीं। मरता क्या न करता वाली स्थिति थी।
उन नौजवानों को किसी के यूं उनके डब्बे में इतनी बड़ी पलटन लेकर घुस आने का अंदेशा नहीं था इसलिए कुछ लेटे, कुछ बैठे और कुछ भोजन से पूर्व की तैयारी में लगे थे। मुझे स्कूली छात्रों के साथ देख कर पहले तो चौंके। फिर शायद मेरी घबराहट देखी तो उन्होंने मुझे आश्वसत किया।कहा, मैडम,आप बिल्कुल ना घबराएं ,और बच्चों से पूछा कहां से आ रहे हो और कैसे उस डिब्बे में आ गए। पूरी बात पता चलने पर उन्होंने बच्चों से कहा,कोई बात नहीं,आप ऊपर की बर्थ पर दो -दो बच्चे हो जाओ। देखते ही देखते बच्चों ने छ: सीटें ले लीं। मेरी बेटी मुझसे सटी बैठी थी।मैं भी उसकी सुरक्षा को लेकर बहुत चिंतित थी। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं भी आराम कर लूं। मुझे भी एक सीट ऑफर कर दी। मुझे नहीं पता कि जिनकी सीट पर हम सभी काबिज हो गए थे उन्होंने अपनी रात कैसे बिताई। चिंता के बीच भी शायद थकान हावी हो गई कि मुझे नींद आ गई।मैं उनका धन्यवाद भी ना कर पाई। न जाने वे किस स्टेशन पर उतर गए थे।
हम अपने शेष ग्रुप के साथ लखनऊ पहुंचकर मिल पाए।हमारी खुशकिस्मती थी कि इस बीच कोई भी टिकट चेकर उस कंपार्टमेंट में नहीं आया था।
आज जब मैं सोचती हूं तो मुझे ग्लानि होती है कि डिब्बे में प्रवेश करते ही पूर्वाग्रह के कारण मैं कितना सशंकित हो गई थी।न जाने लोगों ने कैसी- कैसी बातें फैला रखीं थीं, और मैं स्वयं भी कितना ... ! जिनसे मै खुद को असुरक्षित महसूस कर रही थी, उन्होंने कैसे मेरी शंका को निर्मूल और निराधार साबित किया !उस कठिन परिस्थिति में, जब मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था तो उन नौजवानों ने मेरी परेशानी को अपनी जिम्मेदारी समझा और मेरी सहायता की।
मेरा सिर आज भी गर्व से ऊंचा उठ जाता है,जब भी यह वाकया याद आता है कि कैसे उन्होंने उस विश्वास को कायम रखा कि वे केवल सीमा प्रहरी नहीं, हर स्थान,हर अवसर पर मुश्किल में पड़े इंसान के मुस्तैद रक्षक हैं।
हम सकुशल फ़ैजाबाद पहुंच गए।आज भी मैं उस घटना के बारे में सोचती हूं, तो कांप जाती हूं ,क्योंकि मेरे पास टिकट नहीं थे, न ही पर्याप्त पैसे , अगर टी सी आ जाता तो क्या होता अथवा उनमें से ही यदि कोई जवान ...?
उन सीमा प्रहरियों ने जो किया उसका प्रतिदान नहीं हो सकता। मेरे हृदय में उनके प्रति अगाध सम्मान है। मैं उनके ऋण से ऊऋण नहीं हो सकती।
