माँजी की वत्सलता
माँजी की वत्सलता
माँजी बहुत वात्सल्यमयी थीं। अपनी दादी को हम मॉंजी कहते थे। वे घर में सबका ध्यान रखती थीं। सुबह उठ जाती थीं। अपने कपड़े ख़ुद धोती थीं। अपने कमरे में झाड़ू भी ख़ुद लगा लेती थी। कभी ख़ाली नहीं बैठती थीं। गीता पढ़ती रहती थीं या कुछ काम करती रहती थीं। उनसे हमने बहुत सी बातें सीखीं। सूजी का हलवा बनाना सीखा। पोस्त की पंजीरी बनानी सीखी। वे हमें सिखाने के लिये पास पीढ़ा रख बैठ जातीं थीं और चूल्हे की आग ठीक करती रहती थीं, कभी तेज़ कभी कम ।कभी लकड़ी बाहर निकाल देतीं कभी चूल्हे के अंदर कर देतीं। उस समय गैस नहीं थी। नीचे बैठकर चूल्हे पर खाना बनता था ।लकड़ी की आग होती थी।
माँजी सबको खिलाकर तब भोजन करती थीं, किसी से अपना कुछ काम नहीं कराती थीं।
एक बार पता नहीं क्या बात हुई कि मैंने दूध पीने से मना कर दिया। अब पूरी बात तो याद नहीं है, मुझे पता नहीं किस बात पर ग़ुस्सा आ गया। दूध का मुझे श़ौक था ,रोज़ ही दूध पी लेती थी। घर में बहुत सी गायें थी, गाय का ताज़ा दूध सुबह दुह कर आता था, फिर उबाला जाता था । उस दूध का स्वाद बहुत अच्छा होता था। इतना मीठा होता था कि अलग से मीठा डालने की ज़रूरत नहीं रह जाती थी।
दूध पीने से मनाकर मैं नीचे से उठकर ऊपर की मंज़िल के कमरे में चली आयी। ऊपर जीने पर चढ़कर हम लोगों के पढ़ने का कमरा था। मैं वहाँ भी न बैठकर छत पर आ गई और छत से लगे दूसरे कमरे में जा रही थी तो देखा कि माँजी दूध का गिलास हाथ में लिए ऊपर चली आ रही हैं। मैं हतप्रभ हो गई और देखकर भी अनदेखा कर दिया।
मॉंजी ने शायद यह समझा कि मैं ग़ुस्से में दूध छोड़कर आ गई , या शायद किसी बात से नाराज़ हो गई। वे मुझे मनाने के लिए आईं थीं। मुझ में गुस्सा बहुत था, ऐसा मेरे बाऊजी जी कहते थे । वे कहते थे मुझसे कि तुम बहुत अच्छी हो बस गुस्सा व ज़िद छोड़ दो। पर लगता है कि हठ करके जो ठान लेती थी वह चाहते हुए भी छोड़ना मेरे लिए मुश्किल होता था।
मॉंजी वृद्धावस्था में किस तरह जीना चढ़कर ऊपर आयी होंगी जबकि वे कभी ऊपर नहीं आती थीं। उस दिन वे किसी तरह दूध का भरा गिलास लिए जीना चढ़कर आईं, पूरी छत भी पार की ,दूसरे कमरे तक आईं और पुचकारकर प्यार से मुझे दूध पीने के लिए कहने लगीं। पर मैंने उनका प्यार नहीं समझा, अपनी ही ज़िद में रही और कहती रही कि मुझे नहीं पीना दूध।
मॉंजी अब ज़्यादा सब्र नहीं कर सकीं। उन्हें इतना नाराज़ मैंने कभी नहीं देखा था। उन्होंने दूध का गिलास वहीं छत पर उलट दिया ,सारा दूध बह गया। मैं अवाक थी। मुझे दूध ले लेना चाहिए था, अंदर से यह सोचते हुए भी मैं उनसे दूध का गिलास नहीं पकड़ पाई थी और अब सारा दूध ज़मीन पर बिखर गया था । मॉंजी ख़ाली गिलास लिए कुछ बड़बड़ाती हुई चली गईं।
मैं ठगी सी रह गयी ।माँजी कभी अन्न का अपमान न करती थीं। किस वेदना से उन्होंने दूध फेंका होगा यह आज समझ पा रही हूँ। कितने वात्सल्य से मेरा ध्यान रखकर वे दूध का भरा गिलास लेकर धीरे धीरे जीना चढ़कर ऊपर आयी होंगी, मुझे पढ़ने के कमरे में देखा होगा और फिर छत पर देखा होगा फिर दूसरे कमरे में आयी होंगी। पर मैंने उनके परिश्रम ,उनकी मोहब्बत ,उनके मेरे से लगाव को नहीं समझा ,अपनी ही ज़िद में रही। जब तक कुछ समझती दूध ज़मीन पर गिर चुका था। उसके बाद मुझे अफ़सोस हुआ पर तब क्या उसका फ़ायदा था। मॉंजी का जी दुखाया ,उनका ऊपर तक आने का भी ख्याल नहीं किया ,उनका मेरे प्रति लगाव का भी ख्याल नहीं किया।
मॉंजी हमेशा मुझे मॉं की डॉंट से बचातीं थीं और जब कभी मॉं मेरे साधारण रूप रंग को देखकर बुराई करतीं कि इसको ढकेलना मुश्किल होगा, तो मॉंजी मेरा पक्ष लेकर कहतीं ”पहन ओढ़कर सुंदर लगेगी ,बहुत होशियार है ,प्यारी बेटी है, क्यों कुछ कहती हो।"
मॉंजी बहुत बुद्धिमान थी। बाऊजी उनसे सलाह कर के सब काम करते थे। उनकी राय का सब सम्मान करते थे। घर में सभी की समस्या वे प्यार से सुलझा देती थीं , कभी उन्होंने किसी को डाँटा फटकारा नहीं था ,कभी किसी की आलोचना नहीं की थी ।
आज अपने उस व्यवहार पर मुझे पछतावा है। आँखों में आँसू हैं, पर अब मॉंजी इस दुनिया में नहीं हैं कि उनसे क्षमा माँग लूँ। न मॉं ही हैं कि उन्हें बता दूँ कि मॉंजी की बातों ने मुझे कितना आत्मविश्वास दिया था। और कभी अपने को हीन न समझने का बल दिया था।
