अपनत्व...
अपनत्व...
बेटा, सौजन्य आओ नाश्ता लग गया है, जूस लोगे या दूध शेखर ने अपने बेटे सौजन्य को आवाज लगाई।
मुझे नाश्ता नहीं करना, बहुत देर हो गई है, मैं जा रहा हूं, सौजन्य तैयार होकर बाहर तो आया लेकिन नाश्ता किए बिना ही कॉलेज निकल गया।
और शेखर अपना मन मसोस कर रह गया, सोचने लगा, ये मुझे कब माफ करेगा, कब तक मुझे अपने किए की सजा मिलती रहेगी, मैं भी हालातों से लड़ते-लड़ते तंग आ गया हूं, एक तुम ही तो थी जो मुझे समझती थीं और हरदम समझा लेकिन मेरी एक भूल ने तुम्हें मुझसे भी अलग कर दिया, ऐसे कौन से बुरे कर्मों की सजा मिल रही है मुझे, शायद मैंने अपनी सारी जिंदगी एक अच्छा बेटा और एक अच्छा बड़ा भाई बनने में लगा दी लेकिन एक अच्छा पिता और पति नहीं बन पाया, मुझे माफ़ कर दो सुगन्धा, वापस आ जाओ मेरी जिंदगी में, सम्भाल लो सब कुछ अब मुझसे नहीं सम्भलता, देखो हमारा बेटा भी कितना बड़ा हो गया, वो भी उस हादसे के लिए मुझे ही दोषी मानता है....
शेखर का मन बहुत बेचैन हो रहा था, वो भी टेबल से उठ गया, बिना नाश्ता किए और कमरे में जाकर सुगन्धा की तस्वीर को सीने से लगा कर रोने लगा__
शाम को शेखर ने सोचा, आज सौजन्य की पसंद का खाना बनाता हूं तो शायद, उसका मन थोड़ा खुश हो जाए, और शेखर निकल पड़ा बाजार की ओर सब्जियां लाने, उसने चुन-चुनकर बड़े प्यार से सब्जियां खरीदी फिर घर आकर सौजन्य की पसंद की भिण्डी और मटर-पनीर बनाया, कितना पसंद था उसे मटर-पनीर, और भिण्डी बचपन में, जब सुगन्धा बनाती थी तो वो सारा ही खा जाता है, मुझे तो बचा-खुचा ही मिलता था, सुगन्धा बनाती भी तो कितना अच्छा थी, मैं सुगन्धा जैसा तो नहीं बना पाऊंगा, लेकिन कोशिश करता हूं कि सौजन्य ठीक से खाना खा ले, कितना कमजोर सा हो गया है, चेहरे में वो रौनक ही नहीं है, जब से सुगन्धा गई है शायद ही कभी उसने ठीक से खाना खाया हो।
शाम को सौजन्य नहीं लौटा, और शाम से रात हो गई, शेखर टेबल पर ही सौजन्य का wait करते-करते सो गया, तभी रात को दस बजे दरवाजे की घंटी बजी, शेखर ने दरवाजा खोला तो सौजन्य था।
शेखर बोला, बेटा जाओ जल्दी से हाथ-मुंह धो लो फिर साथ में बैठकर खाना खाते हैं__
सौजन्य बोला, मुझे नहीं खाना, आप खा लो, मुझे भूख नहीं है,
कैसे भूख नहीं है, सुबह भी नाश्ता नहीं किया था, देख तेरी पसंद की सब्जियां बनाई है, मटर -पनीर और भिण्डी, तुझे बचपन में बहुत पसंद थी ना, जब सुगन्धा बनाती थी तो कैसे सारी की सारी खा जाता था, हमारे लिए बिल्कुल नहीं छोड़ता था , शेखर बोला।
अरे, कह दिया ना आपसे मुझे नहीं खाना, तो क्यों जिद कर रहे हैं और हां ये मुझे बचपन में पसंद था लेकिन बचपन में तो आप भी मुझे पसंद थे, सौजन्य बोला__
ये सुनकर शेखर की आंखें भर आईं और गला रूंध गया और बोला जैसी तेरी मरजी_
सौजन्य अपने कमरे आया और खिड़की खोलकर खड़ा हो गया, थोड़ी देर ताजी हवा में खड़ा रहा फिर हाथ-मुंह धोकर, कपड़े change किए, फिर अपना college ले जाने वाला बैग खोला, उससे खाना निकाला जो वो बाहर से पैक करवा कर लाया था, खोलकर खाया फिर किताब लेकर पढ़ने बैठ गया......
दूसरे दिन college में सौजन्य अकेला ही कैंटीन में बैठा था, तभी कार्तिक ने सौजन्य को आवाज दी__
ये भाई, क्या हुआ ?अकेला क्यों बैठा है? वो भी इतना उदास, फिर कुछ हुआ क्या? यार तू भी ना ! माफ क्यों नहीं कर देता uncle को, खुद का भी जी जलाता है और uncle को भी परेशान करता है, पुरानी बातों को पकड़ के क्यों बैठा है भाई!
भूल क्यों नहीं जाता, पुरानी बातों को, जिंदगी ऐसे नहीं चलती यार, बहुत सारे समझौते करने पड़ते हैं, अपनों के लिए, क्यों? अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहा फालतू की बातों में, सुकून से जी भाई, अब तू ही बता, तूने अपनी जिंदगी के कितने साल खराब कर दिए, ऐसे अपना खून जलाकर, क्या मिला तुझे, तेरे ऐसे दु:खी रहने से aunty वापस आ जाएगी क्या?
अब तू भी ऐसी ही बातें कर रहा है, कार्तिक
तुझे तो मेरे बारे में सब पता है, सौजन्य बोला
यार, तुझे मैं बहुत अच्छे से जानता हूं, इसलिए तो बोल रहा हूं कि इतना उदास मत रहा कर मुझे अच्छा नहीं लगता, कार्तिक बोला।
क्या करूं, यार ! मैं उन्हें देखता हूं तो मुझे सब याद आने लगता है, मेरा दिल दुखता है, ये कहते-कहते सौजन्य की आंखें भर आईं।
अच्छा छोड़, ये सब , मैं तो तुझे कुछ बताने आया था, कार्तिक बोला।
हां बोल, क्या बात है? सौजन्य ने कहा
यार, बहुत दिन से मामा-मामी बुला रहे हैं, तो सोच रहा हूं, घूम आऊँ, पिंकी भी कह रही थी कि भइया, कब आएंगे, आप
अरे, वहीं पिंकी जो दो साल पहले हमारे यहां आई थी, तो रक्षाबंधन में मैंने और तूने दोनों ने राखी बंधवाई थी और तुझे पता है मामा जी का transfer" मनाली "हो गया है तो वो कह रहे थे कि आ जाओ "मनाली" घूमने, कार्तिक बोला।
तो जा हो आ मनाली, दिक्कत क्या है? सौजन्य बोला।
कुछ नहीं यार, तू भी चलेगा मेरे साथ, बोल चलेगा ना, अकेले वहां बोर हो जाऊंगा, कार्तिक बोला।
सौजन्य मान गया, उसने कार्तिक के साथ जाने को हां बोल दी।
सौजन्य और कार्तिक मनाली पहुंचे, मामी ने तरह-तरह के व्यंजन बनाये, पिंकी भी बहुत खुश थी।
कार्तिक ने चिढ़ाया, अब तू college में पढ़ने लगी है, अब तो बड़ी हो जा,
मैं बड़ी हो गई हूं भइया और समझदार भी, आपसे दो साल ही तो छोटी हूं , पिंकी बोली ।
और सौजन्य भइया आप को यहां अच्छा नहीं लग रहा क्या? जो आप इतने गुमसुम से है, पिंकी ने पूछा।
फिर कार्तिक बोल पड़ा, कुछ नहीं पिंकी, इसका nature ही कुछ ऐसा है, मेरी और तेरी तरह ज्यादा बातें नहीं करता, बहुत ही शांत बच्चा है।
ऐसे ही बातें होती रही और सौजन्य बस शांत मन से सबकी बातें सुनता और हां और ना में गर्दन हिला देता, वो दिल खोलकर हंसना तो चाहता था लेकिन उसका मन कहीं ना कहीं किसी कोने में बहुत गहरा घाव छुपाये बैठा था जो उसे इसकी इजाजत नहीं देता था।
फिर मामी ने पूछा, अच्छा शाम को क्या खाओगे कार्तिक?
अरे कुछ भी बना लीजिए, मैं तो सब खा लेता हूं, कार्तिक बोला।
अरे, ऐसे कैसे, तुम अपनी पसंद बताओ, मामी बोली।
अच्छा ऐसा कीजिए कि नारियल की चटनी, साम्भर और डोसा बना लीजिए, कार्तिक बोला।
मामी बोली, नारियल तो है नहीं,
कार्तिक बोला, मुझे बता दीजिए, कहां मिलता है, मैं लेकर आता हूं
सौजन्य बोला, यार तू सबके साथ बातें कर, मैं लेकर आता हूं।
मामा जी ने बाजार का रास्ता बता दिया और सौजन्य बाजार चला आया.....
सौजन्य रास्ते में चला जा रहा था, तभी किसी ने पीछे से जोर की ठोकर मारी और वो मुंह के बल जमीन पर पसर गया, उसे बहुत गुस्सा आया, वो जल्दी से उठा....
और जैसे ही पीछे मुड़ा, देखा कि कोई scooty में है फिर एक लड़की अपना helmet उतार कर तुरंत sorry बोल पड़ी और उसने पूछा आपको कहीं ज्यादा तो नहीं लगी, वो गुस्से में बोला नहीं......
और लंगड़ाते हुए जाने लगा...
उस लड़की ने कहा, रूकिए, I am so sorry...
आपको जहां जाना है, मैं आपको अपनी scooty से छोड़ देती हूं
सौजन्य बोला, मुझे मरने का कोई शौक नहीं है, scooty से धक्का दिया तो अभी दांत टूटते-टूटते बचे, अगर scooty में बैठा तो स्वर्ग ही पहुंचा दोगी__
ये सुनो, ज्यादा भाव मत खाओ, चलो चुपचाप बैठो और बोलो, कहां जाना है, पहुंचा देती हूं, लड़की गुस्से से बोली___
सौजन्य उसे देखकर, रह गया और बोला, मुझे नारियल खरीदने है चटनी के लिए, कहां मिलेंगे?
वो बोली, चलो बैठो__
और सौजन्य बैठ गया, उसके पीछे__
सौजन्य ने दो नारियल खरीदे, वो खड़ी रही
अब बैठो, चलो पहुंचा देती हूं,
वो लोग घर पहुंचे,
लड़की बोली, तुम यहां रहते हो, लेकिन ये तो मेरी सहेली पिंकी का घर है, तुम यहां कैसे?
मैं पिंकी के यहां मेहमान बनकर आया हूं, उसके भइया कार्तिक का दोस्त हूं,
वो बोली, तो फिर ठीक है, अब अंदर चले
अंदर पहुंचे, तो कार्तिक बोला, क्या हुआ, यार
कुछ नहीं, इस लड़की ने अपनी scooty से ठोक दिया, मुंह के बल गिरा, ऊपर से इतना भाव खा रही है__
पिंकी ने जैसे ही उसे देखा, अरे शगुन तू....
सौजन्य, कार्तिक से बोला, ये शगुन नहीं अपशगुन है...
तू जबसे शिमला के dental college में पढ़ने लगी, तब से तेरी कोई खबर ही नहीं.…..
सौजन्य बोला, पिंकी तेरी सहेली dental college में पढ़ती है तभी लोगों के दांत तोड़ने में इतनी माहिर हैं__
अब शगुन को गुस्सा आ गया, बोली__
ए मिस्टर, बहुत देर से तुम्हारे नखरे, बर्दाश्त कर रही हूं, sorry भी बोल दिया, फिर भी__
सौजन्य बोला, क्या कर लोगी?
वो बोली, बहुत कुछ
तो करो, लो, सौजन्य बोला
कार्तिक ये सब देख रहा था, उसे अच्छा लग रहा था, सौजन्य ऐसे खुलकर बात कर रहा था, उसने सोचा अगर शगुन, सौजन्य की जिंदगी में आ जाए तो कितना अच्छा हो....
फिर उसने दोनों को शांत कराया__
फिर पिंकी, शगुन से बोली और कब तक है मनाली में_
यार, पापा की तबीयत, अचानक खराब हो गई थी और बुआ जी अकेले नहीं सम्भाल पा रही थी तो, उन्होंने मुझे बुला लिया, अब पापा ठीक है, उनके पूरी तरह ठीक होने पर शिमला चली जाऊंगी,
मामी बोली, अब आ गई है तो खाना खा कर जाना, पापा को phone कर दे, अगर देर हो गई तो uncle छोड़ आएंगे car से,
scooty यहीं छोड़ देना, सुबह कार्तिक से भिजवा देंगे।
शगुन बोली, ठीक है aunty__
शगुन ने घर phone कर दिया, सबने साथ में खाना खाया फिर पिंकी और मामा जी, शगुन को car से छोड़ने गए।
शगुन ने कहा कि uncle अंदर आइए, लेकिन मामाजी बोले, फिर कभी बेटा, इत्मीनान से, और मामा जी और पिंकी चले आए।
और घर पर, कार्तिक ने मामी से पूछा, शगुन की मां नहीं है क्या? मामी जी।
तो मामी बोली आज से बारह साल पहले मां किसी accident में नहीं रही, शगुन के पापा हरिद्वार गए थे, मां के अस्थिविसर्जन के लिए, शगुन भी उनके पीछे-पीछे चली जा रही थी गंगा मैया में, उन्होंने ध्यान नहीं दिया, तभी एक महिला ने देख लिया और शगुन को बचा लिया, शगुन के पापा ने उस महिला को धन्यवाद दिया__
बहुत बहुत धन्यवाद बहन, जो आपने मेरी बच्ची की जान बचाई
मैं आपके लिए क्या कर सकता हूं_
तो वो महिला बोली मैं अनाथ हूं, मेरा कोई नहीं है, कृपया मुझे कोई काम दिलवा दीजिए__
तो शगुन के पापा उसे अपने साथ ले आए, अपनी सगी बहन से भी ज्यादा मानते हैं, उन्हें__
उन्होंने ने ही शगुन को पाल-पोस कर इतना बड़ा किया है__
कार्तिक बोला, अच्छा तो ये बात है, वो शगुन की सगी बुआ नहीं है__
और उधर शगुन घर पहुंची, तुरंत बुआ को आवाज लगाई_
पापा सो गए, बुआ
हां, बेटा मैंने कह दिया था कि आप सो जाओ मैं इन्तज़ार करती हूं, बिटिया का__
पता है, बुआ आज एक पागल लड़का मिल गया था, वो पिंकी के भाई का दोस्त निकला__
और ऐसे ही बुआ से बातें करते-करते, शगुन सो गई...…...
दूसरे दिन कार्तिक, शगुन की scooty वापस देने उसके घर गया, उसने दरवाजे पर लगी घण्टी बजाई, __
शगुन की बुआ जी ने दरवाजा खोला,
उन्होंने पूछा? आप कौन
जी मैं पिंकी का भाई, शगुन की scooty वापस देने आया था, कार्तिक बोला__
अच्छा बेटा तुम, अरे अंदर आओ, बुआ बोली...
उन्होंने, शगुन को आवाज दी, बिटिया, बाहर आओ, पिंकी के भइया आए हैं,
शगुन आई, पूछा, तुम्हारा खड़ूस दोस्त नहीं आया?
मैंने scooty की चाबी दी और आने लगा, तभी बुआ जी ने आवाज लगाई, बेटा पहली बार आए हो, चाय तो पीकर जाओ, बस थोड़ी देर बैठो , अभी बना कर लाती हूं, थोड़ी देर बाद बुआ जी चाय बनाकर ले आई और साथ में कुछ नाश्ता भी, मैंने चाय-नाश्ता किया और आ गया, लेकिन बुआ जी मुझे जानी -पहचानी सी लगी ऐसा लगा कि शायद मैंने उन्हें कहीं देखा है लेकिन कहां, ये याद नहीं आ रहा था___
फिर दूसरे दिन कार्तिक, सौजन्य और पिंकी हिडिंबा माता के दर्शन करने गए, वहां हमें शगुन मिली, बोली पापा की तबीयत ठीक हो गई है तो प्रसाद चढ़ाने आई थी, सबने साथ में दर्शन किए, लेकिन सौजन्य और शगुन कार्तिक और पिंकी की नज़रें बचाकर एक -दूसरे को देख रहे थे।
लेकिन फिर दूसरे दिन रात के समय पिंकी के पास शगुन का phone आया,
शगुन रो रही थी, पिंकी , पापा की फिर से बहुत तबीयत खराब हो गई है, please अंकल या कार्तिक को hospital भेज दो,
पिंकी ने पापा को बताया, कार्तिक मामा जी और सौजन्य hospital पहुंचे।
शगुन, मामा और कार्तिक के पास आई, बोली heart surgery के लिए डाक्टर ने कहा, सारे papers पर sign भी ले लिए, बस बाहर से किसी डाक्टर को बुलाया है।
तभी शगुन की बुआ की सबके सामने आई, बुआ को देखकर सौजन्य बस, हक्का-बक्का रह गया, उसने आगे आकर उनके पैर छुए और गले से लग गया, बुआ ने एक बार ध्यान से देखा और वो भी फूट-फूटकर रोने लगी।
शगुन, कार्तिक और मामा जी को कुछ समझ नहीं आया।
तभी सौजन्य बोल पड़ा___
मां, कहां चली गई थी, आप
हम सबने कितना ढूंढा आपको__
तभी डाक्टर साहब आ गये और operation शुरू हो गया सब operation theatre के बाहर operation खत्म होने का इंतजार कर रहे थे, operation खत्म हुआ, डाक्टर ने कहा सब ठीक है, अब आप लोग patient के होश में आने का wait करें।
मामा जी बोले शगुन बेटा, अभी आप लोग जाओ हम लोग hospital में है, कुछ खा-पीकर और थोड़ा आराम करके आप लोग आ जाना, फिर हम घर चले जाएंगे।
शगुन और बुआ जी चले गए।
तभी कार्तिक बोला, सौजन्य, ये ही आंटी है, मैंने तेरे घर पर कभी एक-आध बार इनकी तस्वीर देखी थी, तभी उस दिन मैं शगुन की scooty वापस करने गया था तो मुझे ये जानी पहचानी लगी, लेकिन उस दिन मुझे कुछ याद नहीं आया।
हां, ये ही मेरी मां है, सौजन्य बोला।
तो ऐसा क्या हुआ था कि आंटी को घर छोड़ना पड़ा, तूने हमेशा कहा कि इन सबके ज़िम्मेदार अंकल है, लेकिन पूरी बात कभी नहीं बताई।
सौजन्य ने बोलना शुरू किया।
मुझे जबसे समझ आ गई थी, तब से मैंने हमेशा दादी के घर में मां को बस काम करते ही देखा है, पापा सबसे बड़े थे घर में और जब वो पढ़ाई कर रहे थे, तभी दादी ने उनकी शादी करवा दी ये कहकर कि ये तेरे छोटे भाई-बहन को सम्हालूँ या घर के काम करूं तेरी बहु आ जाएगी तो वो घर के काम करेगी और मैं बाहर के काम सम्भाल लूंगी और कम उम्र में पापा की शादी मां से हो गई, मां भी पापा से दो साल छोटी थी, इतनी छोटी उम्र में मां ने इतने बड़े परिवार की जिम्मेदारी सम्भाल ली।
पापा ने बहुत मेहनत करके पढ़ाई की, और उनको सरकारी नौकरी भी मिल गई, फिर दादी ने दो साल में ही जिद करके पापा का transfer अपने ही कस्बे में करवा लिया, पापा की जितनी भी तनख्वाह मिलती, दादी हर महीने ले लेती और हमेशा यही सुनाती कि तेरी पढ़ाई में भी तो कितना खर्च हुआ है, पिता जी के करने बस से घर थोड़े ही चलेगा।
मैंने हमेशा देखा था कि मां बेचारी के पास हमेशा सिर्फ चार साड़ियां होती थीं, दो घर के पहनने के लिए और दो आने-जाने के लिए, और वो साड़ियां भी उन्हें मायके से मिल जाया करती थी जब कभी एक-आध दो दिन के लिए उन्हें जाने को मिल जाता था। ना कोई गहने और ना कोई साज-श्रृंगार , सिंदूर भी उन्हें भगवान के मंदिर से लेकर लगाना पड़ता था, उनका खुद का पति कमाता था और उनकी ये हालत थी।
मैंने तो कभी कभी देखा था कि खाना भी कम पड़ जाता था और वो ऐसे ही बर्तनों में लगा हुआ खाना पोंछकर खा लेती थीं और पानी पीकर सो जाती थीं।
मेरे पैदा होने के बाद भी, अगर पापा मेरे लिए कुछ लाते थे तो दादी तुरंत ताना मारती थी कि तेरे छोटे-बहन भी तो है, उनके लिए भी कभी कुछ ले आया कर, बड़ा बेटे वाला हो गया।
मैं पांच साल का हो गया था तो मां ने कहा किसी अच्छे अंग्रेजी स्कूल में डलवा देते हैं लेकिन पापा बोले जैसा मां कहेगी वैसा होगा और दादी बोली क्या जरूरत है ज्यादा पैसे खर्च करने की, यही पास के सरकारी स्कूल में नाम लिखवा देते हैं।
फिर मेरी एक छोटी बहन हुई, दादी को बहुत बुरा लगा कि बेटी हुई है, उसे ना तो कभी सम्भालती और ना गोद में लेती, मां को फुर्सत नहीं रहती तो मुझे कह देती, बेटा जरा रानी को देख लेना, रोये अगर तो मुझे बुला लेना, यही नाम था मेरी बहन का , वो किसी के लिए रानी ना हो लेकिन मेरी मां के लिए रानी थी।
फिर एक रोज मां को एक चिट्ठी मिली, घर के आंगन में झाड़ू लगाते वक्त, मां ने दादी को दिखाई, दादी बोली तू मेरी बेटी को बदनाम कर रही है, वो कुछ और नहीं बुआ के लिए किसी का प्रेम पत्र था।
दादी ने पापा से शाम को शिकायत कर दी, पापा ने उस रात मां को बहुत मारा, लेकिन कुछ दिनों बाद बुआ किसी के साथ भाग गई, तब पापा को एहसास हुआ कि मां उस दिन सही कह रही थी।
अब मैं दस साल का हो चुका था और मेरी बहन रानी पांच साल की, फिर चाचा की भी शादी हो गई और उनका बेटा अभी साल भर का ही था, चाचा कुछ भी नहीं कमाते थे, दादा जी retire हो चुके थे, अब सारा घर पापा की कमाई पर आश्रित था और चाची भी कोई काम नहीं करती थी, सारा काम अब भी मेरी मां ही करती थी।
फिर एक रोज, सर्दियों के दिन थे, चाची, अपने बेटे के साथ छत पर थी, और रानी भी वहीं खेल रही थी, अचानक किसी खिलौने के पीछे दोनों बच्चों में छीना-झपटी हो गई, रानी ने चाची के बेटे को मार दिया और सीढ़ियों पर खड़ी हो गई, चाची गुस्से में आई और रानी के सर पर जोर की चपत मारी, रानी सम्भल नहीं पाई और सीढ़ियों से गिर गई, मैंने नीचे से खड़े होकर ये सब देखा उसके सर से खून बह रहा था लेकिन चाची ने उसे नहीं उठाया, फिर मैंने मां को आवाज दी, मां दौड़कर आई, दादी से रानी को अस्पताल ले चलने को कहा लेकिन दादी ने मां की बात नहीं सुनी, फिर मां ने पड़ोस वाली दादी को बुला ने कहा, वो भागी आईं और तुरंत रिक्शे में मां और रानी को ले गई।
अस्पताल में रानी को भर्ती कर लिया गया, खून बहुत गया था, मां ने अपना खून भी दिया, तब तक पापा भी आ गए, थोड़ी देर बाद चाची और दादी रोते हुए आए, चाची ने पूछा कैसी है रानी?
मां पहले से ही गुस्से में थी, एक झन्नाटेदार थप्पड़ चाची के गाल पर मां ने धर दिया।
मां का गुस्सा देखकर , उस समय तो चाची ने कुछ नहीं कहा, दादी और चाची उस वक्त वहां से चली गई।
रानी रात भर मौत से लड़ती रही, फिर सुबह होते होते थक गई, और हम सब को छोड़कर चली गई।
पिता जी ने बहुत भारी मन से रानी को दफनाया क्योंकि खुले दिल से ना मुझको और ना रानी को कभी प्यार ही नहीं कर पाए थे, शायद इस बात का उन्हें बहुत अफसोस था। मां और मेरे आंसू तो रूक ही नहीं रहे थे, हम खाली हाथ घर पहुंचे।
घर पहुंचते ही, दरवाजे पर ही दादी बोली, पहले छोटी बहू से माफी मांग तब अंदर आना जो कल तू ने सबके सामने थप्पड़ मारा था, उसके लिए।
मां ने पापा की ओर देखा, पापा कुछ नहीं बोले, और मां उसी वक्त ना जाने कहां चली गई, पापा ने सोचा मायके गई होंगी, लेकिन मां वहां भी नहीं मिली, और उस दिन के बाद मुझे आज मिली है।
कहते हैं ना कि नारी जब तक सीता है तो ठीक है लेकिन जब उसके आत्मसम्मान पर ठेस लगती है तो वो चण्डी बन जाती है फिर उसे मनाने के लिए भगवान शंकर उसके पैरों तले आ जाते तब शांत होती है।
फिर पापा, मुझे लेकर कहीं और रहने लगे, हमने दादी का घर छोड़ दिया, बाद में पता चला कि चाचा ने धोखे से सारी जायदाद पर दादा जी से हस्ताक्षर करवा लिए, दादा जी इस सदमे को नहीं सह पाए और स्वर्ग सिधार गए, कुछ दिनों बाद दादी भी चल बसी, बाद में चाचा जी को लकवा मार गया और चाची उनकी सेवा करती है, कुछ दिनों बाद पता चला कि बुआ जिसके साथ भागी थी वो लड़का उन्हें धोखा देकर भाग गया है, सबको अपने अपने किए की सजा मिल गई।
शगुन भी सब कुछ बुआ से जानना चाहती थी, बुआ ने भी सारी बातें शगुन को बता दी, उसके बाद मेरे कानों में सोने के बाले थे, उनको बेचकर कुछ पैसे मिले, जिससे मैं हरिद्वार जाना चाहती थी, ताकि गंगा मैया में जल-समाधि ले सकूं, लेकिन तुम मिली , तुम डूब रही थी, मुझे तुम में अपनी रानी दिखी और तुम्हें बचा लिया फिर उसके बाद तो तुम्हें सब पता है।
उधर कार्तिक ने सौजन्य के landline पर अंकल को phone कर सब कुछ बता दिया, और वो भी दो दिन के बाद आ गए।
शगुन के पापा भी अब ठीक थे, सौजन्य के पापा ने सुगंधा से माफी मांगी, सुगंधा ने उन्हें माफ कर दिया।
एक बार फिर से बिछड़ा हुआ परिवार मिल गया।
