ज़िंदगी की यादगार गुरु कृपा
ज़िंदगी की यादगार गुरु कृपा
आस्था हर रोज़ की भाँति आज भी दोपहर का खाना खाकर अपने दफ्तर के कार्य में फिर से व्यस्त हो गई थी। आज सुबह से ही उसकी मनोदशा कुछ ठीक नहीं थी। आज उसके पापा की तीसवीं पुण्यतिथि जो थी। उसके पापा उसके जीवन के आदर्श थे। वह पापा को हमेशा अपना गुरु मानकर चलती थी और उन्हीं की बताई हुई राह पर चलती थी। अपने पापा की तरह वह भी बहुत ही नेक, ईमानदार और मेहनती थी और इसी वजह से वह घर और दफ्तर दोनों जगह पर ख़ूब ही निष्ठा से कार्य करती थी। पापा के आशीर्वाद की वजह से ही उसका हर जगह पर बेहद ही अच्छा नाम था। आज उसे पापा की बहुत याद आ रही थी और पापा की बेहद ही कमी महसूस हो रही थी। कुछ समय के लिए वह अपने पापा के त्यागो और उनकी दी हुई शिक्षाओं की यादों में कुछ खो सी गई और उसकी आंखों में अपने पापा से बिछड़ने के ग़म के आंसू तैरने लगे तभी उसके मोबाइल की घंटी बजी और उसके वरिष्ठ अधिकारी ने उसे अपने कक्ष में आने को कहा। आस्था अपना काम छोड़कर अपने वरिष्ठ अधिकारी के कक्ष की ओर चल दी। भीतर जाने पर उसके वरिष्ठ अधिकारी ने उसे बैठने को कहा और बताया कि आज शाम को 5 बजे अध्यक्ष महोदय के साथ बैठक है, जिसमें आस्था को भी उपस्थित होना आवश्यक है। आस्था आश्चर्यचकित थी कि बैठक में उसे क्यों बुलाया जा रहा है? उच्च स्तरीय बैठक में उसका क्या काम है? उसने अपने वरिष्ठ अधिकारी से इस बारे में जब पूछा तो उन्होंने यही कहा कि यह तो वहाँ जाने पर ही पता चलेगा। अंत में उन्होंने उसे 4.30 बजे तक अध्यक्ष महोदय के प्रतीक्षा कक्ष में पहुँचने की हिदायत दी।
आस्था वापस आकर पुनः अपने काम में तल्लीन हो गई और 4.30 बजने पर , मन में असंख्य सवाल लिए कि आखिर बैठक में उसे क्यों बुलाया जा रहा है तथा उसे अध्यक्ष महोदय से किस तरह से बात करनी होगी इत्यादि सोचते-सोचते वह अध्यक्ष महोदय के प्रतीक्षा कक्ष में पहुंच गई।
पूरे पाँच बजे उसको अध्यक्ष महोदय के चैम्बर में बुलाया गया। जहाँ पर उस के विभागाध्यक्ष और उसके वरिष्ठ अधिकारी पहले से ही मौजूद थे। अध्यक्ष महोदय ने सबसे पहले उस का स्वागत किया और फिर उसके काम और अनुभव के विषय में उससे जानकारी ली। बाद में अध्यक्ष महोदय ने खुद उसे बताया कि उस की ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा को देखते हुए उसके विभागाध्यक्ष ने उसे श्रेष्ठ कर्मचारी का प्रमाण पत्र देने की सिफारिश की है। यह सुनते ही आस्था के मन के अंदर चल रही कशमकश अचानक से खुशी में और एक अनोखे सुकून में बदल गई। बैठक के दौरान आस्था के विभागाध्यक्ष ने उस की और उस के काम की खूब ही प्रशंसा की। उस से अपने संगठन के और अधिक विकास हेतु विचार विमर्श किया गया। अंत में उसे उस के अतुल्य कार्य हेतु प्रमाणपत्र दिया गया तथा उस का अध्यक्ष महोदय के साथ फोटो निकाल कर बैठक को समाप्त किया गया। अध्यक्ष महोदय और अपने विभागाध्यक्ष का आभार व्यक्त करके अध्यक्ष महोदय के कक्ष से बाहर निकलते वक़्त आस्था को आज एक अनोखी खुशी महसूस हो रही थी और आज फिर से उसे अपनी ईमानदारी पर गर्व महसूस हो रहा था। आज उसे उसकी ईमानदारी से कार्य करने का इतना अच्छा फल जो मिल चुका था। आज का दिन उसके लिए एक यादगार दिन बन चुका था जिसमें एक तरफ अपने पापा से बिछड़ने का ग़म समाया हुआ था तो दूसरी तरफ उसके पापा और उसके अधिकारियों की एक यादगार और कभी न भूलने वाली गुरु कृपा की खुशी का एहसास शामिल था।
