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Amita Kuchya

Tragedy

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Amita Kuchya

Tragedy

बूढ़ी काकी

बूढ़ी काकी

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आज से बहुत साल पहले की बात हैं। मैं अपने गांव गयी थी।  तब वहां पास में ही बूढ़ी काकी रहती थी। मैंने उन्हें शुरू से यही रहते देखा था तब मुझे लगता था कि कितना उनका भरा पूरा परिवार हैं। उन्हें सब का साथ बहुत अच्छा लगता था। वे शुरू से ही बड़े परिवार में पली बढ़ीं तो उन्हें लगता था कि साथ में रहने से अपनापन बढ़ता हैं। इस कारण वे चाहती थी कि सब साथ में रहें। लेकिन उनकी शादी जल्दी हो गई थी। वे पढ़ाई नहीं कर पायी थी ।


उनकी शादी छोटे में ही बड़ी धूमधाम से संयुक्त परिवार में संपन्न हो गई। उन्हें सास -ससुर जेठ - जेठानी, ननद देवर वाला घर मिला था।और वो इस परिवार में आकर अपने आप को बहुत खुश किस्मत समझ रही थी। उन्होंने परिवार के लिए बहुत कुछ किया जितना वो कर सकती थीं। वो हमेशा सब काम पूरी जिम्मेदारी निभा रही थी।


पर कहा जाता है कि समय की गति एक ही नहीं होती। उनके तीन साल तक कोई बच्चा हुआ सब ताने देने लगे । वो अंदर ही अंदर सिसक कर रह जाती।जब भी उन्हें रोना आता तो भगवान के सामने अपना दर्द बांटने की कोशिश करतीं। फिर पति भी उनके साथ न थे। वे भी उन्हें कसूरवार ठहराते।


कुछ समय तक वो काम से सबको खुश करने की कोशिश करतीं रही। 

पर वो जब भी अकेली होती तो सोचती वो भरे पूरे परिवार में कितनी अकेली ही हैं। पर उन में साहस था । सब कुछ सहन कर रही थी।


अब सास भी उलाहना देने लगी ।बहु तू बच्चा नहीं दे सकती, तो तेरी क्या जरुरत

इस तरह के ताने की बौछार होने से हताश हो गयी।


फिर वो अपने मां के परिवार में आ गयी यहां कुछ समय तक तो ठीक रहा पर वो भाइयों पर बोझ नहीं बनना चाहती थीं। तब उन्होंने सोचा अकेले जीवन कैसे चलेगा । तब खुद कुछ करना चाहा । काकी गांव की थी। वे पढ़ी लिखी नहीं थी ।


 उन्होंने सोचा खेती बाड़ी में भाइयों का हाथ बटांएगी इस तरह उन्होंने मायके में ही जीवन निकाल दिया। और पति ने भी कोई खबर नहीं ली। बूढ़ी काकी ने अपने आपको कभी भी कमजोर होने नहीं दिया। और दूसरों के लिए एक उदाहरण भी बनी । उन्होंने अपने भाईयों का साथ पाकर जीवन में संघर्ष तो किया ही।पर उन्होंने किसी भी परिस्थिति के घुटने नहीं टेके।


मां के यहां रह कर बड़े होने के फ़र्ज़ निभाया। उनका शादी से विश्वास उठ चुका था। इसलिए दूसरी शादी नहीं की। उन्होंने भाई के बच्चों को अपने बच्चों का प्यार दिया। हमेशा इसी रूप में ममता उड़ेलती रही।उन्हें लगता था कि दर्द के साथ कितना गहरा रिश्ता हैं।  ऐसे ही बूढ़ी काकी ने अपनी औलाद के बिना ही दुनिया को अलविदा कह दिया।


दोस्तों- अकेलेपन का एहसास ही जीवन में नीरसता लाता हैं। पर जिंदगी से कभी भी हार नहीं मानना चाहिए।पर खुद के परिवार की कमी कभी न कभी खलती ही है। जैसे कभी सुहागिनों वाले त्योहार आते तो जख्म ताजा हो ही जाते हैं। इसलिए कहा गया कि पति ही हमसफ़र होता हैं। अगर अकेलापन हो तो इससे बड़ा कोई दर्द नहीं होता हैं।



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