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खुशी का कारण

खुशी का कारण

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विमला के मन में कौतुहल था, आज उसकी देवरानी सीमा सुबह से ही बहुत प्रफुल्लित थी। उसके गुनगुनाने की आवाज़ आ रही थी। विमला जानना चाहती थी कि इस प्रसन्नता का कारण क्या है।

वैसे तो दोनों की रसोई अलग थी किंतु आपस में मेल मिलाप था पर कल दोपहर ही दोनों में किसी बात को लेकर झड़प हो गई थी। अतः चाह कर भी विमला कुछ पूछ नहीं पा रही थी। वह बस मन ही मन कयास लगा रही थी और खुद ही उन्हें खंडित कर रही थी। बहुत देर तक यूँ ही उलझे रहने के बाद थक कर उसने दूसरी ओर ध्यान लगाने के लिए टीवी खोल लिया लेकिन मन की जिज्ञासा कम नहीं हुई।

सीमा की रसोई से मीठी खुशबू आ रही थी। विमला सोचने लगी जरूर कुछ खास है पर मन ने प्रतिरोध किया 'होगा कुछ तुम्हें क्या। रिश्ते में छोटी है पर इतना गुरूर है कि बताया भी नहीं।' वह फिर टीवी देखने लगी।

लंच का समय हो रहा था तभी सीमा उसके कमरे में आई।

"दीदी आज आप मेरे साथ लंच कीजिए।"

विमला ने कुछ अकड़ से कहा- "मैंने खाना बना लिया है।"

"पता है, उसे हम लोग शाम को खा लेंगे।" सीमा ने अधिकार से हाथ पकड़ा और अपने कमरे में ले गई।

मेज़ पर खाना लगा था। विमला की मनपसंद मखाने की खीर भी थी। विमला ने प्रश्न भरी दृष्टि से सीमा की ओर देखा। सीमा ने उसे गले लगा लिया- "जन्मदिन की बधाई हो दीदी।"

"अरे हाँ ! आज तो.." विमला ने खुशी से गदगद होकर कहा। फिर स्नेह से सीमा के सिर पर हाथ फेर कर बोली- "सदा खुश रहो।"


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