प्रेम में सराबोर
प्रेम में सराबोर
प्रेम का इस्तकबाल करती
और प्रेमी का इंतिखाब करके
वह प्रेमी संग भागने वाली लड़कियाँ
पता नहीं हमें क्यों नही भाती है?
उसका खुद अपना प्रेमी चुनना
जैसे समाज को चैलेन्ज लगता है
वही समाज जिसे आदमी ने बनाया है
अपनी सहूलियत के नियम कायदों से
जहाँ एक से ज्यादा बीवियाँ होना आम है
और औरतों का सती होना परंपरा है
क्या ये समाज का दोगलापन नही है?
इसी दोगलेपन से यह समाज
आकंठ प्रेम में डूबी उस लड़की को
ताउम्र चरित्रहीन होने के ताने देता है
उसको नश्तर चुभोते रहता है
गुनहगार करार देता रहता है
प्रेम प्यार इश्क़ कुछ अलग नही है
वह समय के साथ ढलते जाते है
समाज का हिस्सा वह प्रेमिल प्रेमी
जब तब कटघरे में खड़ा करता है
बार बार सवाल करता है
आकंठ प्रेम में डूबी उस लड़की को
जो भागी होती है घर से उसके साथ
जो माँ बाप की नहीं हुई वो मेरी क्या होगी?
वह प्रेमिल लड़की बस सिसकती रहती है
प्रेम में और प्रेम में ही.....
