खिला खिला आसमाँ
खिला खिला आसमाँ
खिला खिला है आसमाँ
उजली है आज सूर्य किरण
ओढ़ लालिमा किरणो की
धरती भी बनी दुल्हन
चहचहाट से चिड़ियों की
गुंजायमान है सारी धरा
तितली बन उड़ती है
आज मन की तरंग
प्रकृति का यौवन
लांघ रहा सभी सीमाएँ
रंग बिखरे हज़ारों यहाँ
हर रंग की अपनी पहचान
सरसों लहलहाती करती
नवजीवन का अभिनंदन
सखी क्या ये संकेत है
कि आ गया बसंत
झूमता नाचता लहलहाता
लो आ गया बसंत।
