STORYMIRROR

Vaishnavi Mohan Puranik

Inspirational

4  

Vaishnavi Mohan Puranik

Inspirational

नारी

नारी

1 min
460

मेरे कितने ही रुप मेरे कितने ही रंग


सुबह से शाम तक करती हूं मैं काम 

एक पल भी नहीं करती आराम

अपनों का रखती हूं हरदम ख्याल 

भूलकर अपना ही होश और हाल

मजबूत जिसकी डोर ऐसी मैं पतंग 

मेरे कितने ही रुप मेरे कितने ही रंग


कितनी ही भूमिकाएँ मैंने अदा की

माँ, पत्नी, बहन, बेटी

पर मेरी जरूरत इतनी ही क्या

बनाऊँ मैं बस दो वक्त की रोटी

कब मिलेगी मुझे आजादी मेरे जीने का ढंग 

मेरे कितने ही रुप मेरे कितने ही रंग


जीजा बाई का मातृत्व मुझमें लक्ष्मी सी आग

राधा का समर्पण मुझमें सीता सा त्याग

गंगा की पवित्रता मुझमें दुर्गा सा शौर्य 

उर्वशी की चंचलता मुझमें धरती सा धैर्य

समुंदर भी सहम जाए ऐसी मैं तरंग 

मेरे कितने ही रुप मेरे कितने ही रंग



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Inspirational