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Vaishnavi Mohan Puranik

Inspirational

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Vaishnavi Mohan Puranik

Inspirational

नारी

नारी

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मेरे कितने ही रुप मेरे कितने ही रंग


सुबह से शाम तक करती हूं मैं काम 

एक पल भी नहीं करती आराम

अपनों का रखती हूं हरदम ख्याल 

भूलकर अपना ही होश और हाल

मजबूत जिसकी डोर ऐसी मैं पतंग 

मेरे कितने ही रुप मेरे कितने ही रंग


कितनी ही भूमिकाएँ मैंने अदा की

माँ, पत्नी, बहन, बेटी

पर मेरी जरूरत इतनी ही क्या

बनाऊँ मैं बस दो वक्त की रोटी

कब मिलेगी मुझे आजादी मेरे जीने का ढंग 

मेरे कितने ही रुप मेरे कितने ही रंग


जीजा बाई का मातृत्व मुझमें लक्ष्मी सी आग

राधा का समर्पण मुझमें सीता सा त्याग

गंगा की पवित्रता मुझमें दुर्गा सा शौर्य 

उर्वशी की चंचलता मुझमें धरती सा धैर्य

समुंदर भी सहम जाए ऐसी मैं तरंग 

मेरे कितने ही रुप मेरे कितने ही रंग



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