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Agrawal Shruti

Inspirational

5.0  

Agrawal Shruti

Inspirational

वो गीला चुम्बन स्वाद नमक

वो गीला चुम्बन स्वाद नमक

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प्रकृति तेरा विस्तार अजर

अद्भुत अलौकिक निखार अमर

यौवन अक्षुण्ण सौंदर्य असीमित

किस तप से तुम्हें ये मिला वरदान?

हौसले लिये मैं नापने चली हूँ

विस्तृत सागर पर्वत महान!


आँखों में भर मूँद लूँ पलकें

उल्लास के इस त्योहार को,

कोमल सुख कर सुन्दर शाश्वत

मनोहारी इस संसार को।


मैं समझी मन का किला अभेद

पर कैसे तुमने लगाई सेंध

वो जलधि विशाल प्रीति में मेरी

क्यों बाँवरा हुआ पड़ा था उस दिन?

खेलो कल्लोलों से बाँध लिया मन

आकर्षण से बचना बड़ा कठिन

फिर चूम लिया अकस्मात् हुमक

वो गीला चुम्बन स्वाद नमक

मैं नार नवेली गोरी निखरी

रँग लिया मुझे हो गई साँवरी।


जो बाँधने चली हूँ स्मृतिपाश में

मन चंचल है अदम्य उल्लास से

हिम आच्छादित गिरि की शान

ठंढी हवाओं की अद्भुत तान

वो कली वो फूल वो मौसम वो रंग

वो अनछुई धूप पंछियों की उड़ान


क्षणभंगुर छोटी उमर लिये मैं

उर में भर लूँगी तेरे प्यार को

युगों युगों से युगों युगों तक

फैले बिखरे तेरे विस्तार को।


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