STORYMIRROR

Agrawal Shruti

Classics

4  

Agrawal Shruti

Classics

सतरंगा आसमान

सतरंगा आसमान

1 min
293

खिले खिले हैं मन, जागी ऐसी उमंग 

सतरंगा हो गया आसमान 

वो तान छेड़ी उस बंसरी ने श्याम की

मदमाती राधा भूली लोकलाज 


मुट्ठी भरी गुलाल या वो हथेली ही लाल

भरमाए कृष्ण औचक निहार रहे

मादक बयार चली होली में इस साल 

भँवरों के झुंड भी गाते मल्हार रहे


भरी पिचकारी भिगो दी फिजा सारी

जाने क्यों देखो सखी पिया बौराए हैं 

टेसू के रंगों से रँग गईं दसों दिशाएँ

खेलने को होरी आज कान्हा जी आए हैं।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Classics