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Ajay Singla

Classics

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Ajay Singla

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माँ गंगा

माँ गंगा

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 गोमुख से जो आती गंगा, 

पर्वत चीरती जाती गंगा, 

ऋषिओं का मन मोहती गंगा, 

भक्तों का तन धोती गंगाI 


खेतों को तर करती गंगा, 

निर्धन का घर भरती गंगा, 

कल-कल छल-छल बहती गंगा, 

प्रदूषण को सहती गंगाI


चाहते हम सब निर्मल गंगा, 

साफ सुन्दर एक अविरल गंगा, 

अमृत है तेरा जल गंगा,

 अद्भुत है तेरा बल गंगाI 


शांत रहे न क्रुद्ध हो गंगा, 

सबके साथ से शुद्ध हो गंगा, 

जटा में शिव के रहती गंगा,

 जय माँ गंगा, जय माँ गंगाI 


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