क्या सच्च क्या झूठ
क्या सच्च क्या झूठ
ज़िन्दगी एक राह है, बस,
कोई मंज़िल नहीं,
यहाँ सच क्या और झूठ क्या,
किसी ने जाना नहीं,
वक्ती पड़ाव को, मंज़िल समझ कर,
जो चल रहे, वो हम नहीं,
अपनी चाह को, उलझनों में बांध, मगर,
हकीकत से दूर नहीं,
बिन पानी, समुंदर में जैसे कश्ती निकाल,
निकल पड़ें, जो है नहीं,
किस तलाश में, खुद को समेटे,
जहां पहुँचे, कभी हम नहीं,
एतबार, खुद पे, या किस्मत पे करें,
ये अभी सोचा नहीं,
क्या सच्च, क्या झूठ,
ये कभी सोचा नहीं,
क्या अब भी यह सोचा नहीं??
