वराह अवतार (Prompt_10)
वराह अवतार (Prompt_10)
सिंहासन पर विराजमान हिरण्यकशिपु , सामने अपने सहोदर भ्राता का कटा सर देख मूर्छित होते होते बचा , पल भर के लिए उसकी चेतना जैसे उसके विकराल शरीर से निकल गई हो , वो मूर्छित होते होते बचा, अर्धमूर्छा से जैसे जागा , उसके होंठ गुस्से से फड़फड़ा रहे थे, आंखें लाल हो रही थीं, मानो उसमें खून उतर आया हो, नथुने क्रोध से फड़क रहे थे।
किसने मेरे त्रिलोक विजयी भ्राता की ये हालत की है?_वो जोरों से दहाड़ा , सर्वत्र सन्नाटा था , सबके मस्तक झुके हुए थे।
तभी प्रधानमंत्री आगे आए और उन्होंने कहा _भगवान, ये कार्य विष्णु का है।
हिरण्यकशिपु क्रोध से कांप उठा ( दांत पीसते हुए बोला )विष्णु विष्णु विष्णु.....वो हत्यारा , राक्षस कुल का धुर विरोधी।
सेना तैयार करो , देवलोक पर चढ़ाई के लिए , इस विष्णु का अब खेल खत्म होना चाहिए।
सेनापति ने कहा "महाराज आप बहुत क्रोधित हैं, पहले हिरण्याक्ष भ्राता के शोकाकुल परिवार को ढांढस बंधाए। बहुत अवसर हैं इस हत्या का बदला लेने को।
हिरण्यकशिपु को ये बात सही लगी, वो धम्म से सिंहासन पर बैठ गया । थोड़ी देर के बाद बिना कुछ बोले उठा और, महल की ओर प्रस्थान किया। दरबार की सारे कार्यकलाप ठप्प कर दिए गए।
राजमहल का दृश्य
होलिका उसकी छोटी बहन, पत्नी कयाधू सभी शोक संतप्त कक्ष में बैठे थे। इस समय हिरण्यकशिपु कुछ कहने सुनने को स्थिति में नहीं था। उसने एकांत का आदेश दिया । अपने कक्ष में वो अब अकेला था, व्यथित था ।
पूर्व जन्म का महान विष्णु भक्त , इस जन्म में भगवान विष्णु का धुर विरोधी कैसे बन गया !आज उसकी हर सांस में देवों, विशेषकर भगवान विष्णु के प्रति रोष था।
परंतु ये रोष उसके पूर्वजन्म से संबंधित था। जय और विजय भगवान विष्णु के द्वारपाल थे । भगवान की भक्ति और नित दर्शन से ही उनके दिन की शुरुआत होती थी, लेकिन धीरे धीरे उनमें अभिमान की कोंपलें प्रस्फुटित होने लगी।
ईश्वर प्राणी मात्र के मन में उपजे हर पाप , पुण्य को भांप लेते हैं और उसे सही राह दिखाते हैं। नारद भी इससे अछूते नहीं रहे।
एक दिन अचानक ब्रह्मा जी के पुत्र सनकादि बंधु(चार भाई) विष्णु भगवान के दर्शन को पधारे। द्वार पर उन्हें जय और विजय मिले । सनकादि बंधुओं ने उन्हें भगवान विष्णु के दर्शन की इच्छा बताई । तब उन्होंने ये कह कर उन ऋषि बंधुओं को रोक दिया कि भगवान विष्णु अभी निद्रा में हैं आपलोग बाद में आएं। उन्होंने कई बार अनुग्रह किया लेकिन दोनों भाइयों ने यही कहा कि भगवान विष्णु की निद्रा में खलल होगी।
अंततः चारों सनकादि बंधुओं ने उन दोनों को शाप दिया कि तुम दोनों अभी से स्वर्ग से नीचे पृथ्वी पर गिर जाओ, और राक्षस बन जाओ।
जय विजय हतप्रभ रह गए , और तुरंत उन ऋषियों के पांव पकड़ लिए। शोर सुन भगवान विष्णु द्वार पर आए । जय विजय ने शाप को वापस लेने की प्रार्थना की। उन्होंने कहा _"भगवन, हम आपके बिना नहीं रह सकते।
भगवान विष्णु ने उन्हें कहा " ऋषियों का शाप अटल है । तुमने मेरे और मेरे भक्त के बीच में बाधा बनने का अपराध किया है। मैं अपने भक्त का हूं जिस भी समय जिस भी रूप में जो मुझे याद करता है मैं अवश्य ही उसके समक्ष प्रस्तुत होता हूं।
" प्रभु कुछ तो उपाय कीजिए, दोनों लज्जा और दुख से थरथरा रहे थे।
भगवान विष्णु ने तब कहा_"हे जय विजय शांत हो जाओ। तुम तीन जन्म तक राक्षस योनि में रहोगे और मेरे ही हाथों तुम्हारा वध होगा। इसके बाद तुम्हें इस शाप से मुक्ति मिल जाएगी। "
पृथ्वी पर कश्यप ऋषि संध्या वंदन की तैयारी कर रहे थे , और दिति काम की अग्नि से जलती हुई ऋषि कश्यप के सम्मुख प्रस्तुत हुई , और बार बार सहवास की जिद करने लगी । बार बार समझाने पर कि ये समय पुत्र प्राप्ति के लिए अनुकूल नहीं हैं, राक्षसी शक्तियां इस समय विचरण करती हैं और पूजा वंदन न होने से देवता रूष्ट हो जाएंगे ।
बार-बार समझाने के बाद भी दिती टस से मस नहीं हुई वह अपने प्रेम की मनुहार करती रही अंततः हार कर ऋषि कश्यप उसके साथ सहवास किया। कुछ दिनों के बाद कुछ समय के बाद दिती ने दो असामान्य बालकों को जन्म दिया। उनके जन्म लेते ही प्रकृति में असामान्य रूप से परिवर्तन होने लगे। आंधी तूफान आने लगे, समुद्र का जलस्तर अचानक बढ़ने लगा।
जन्म लेते ही उनका आकार बढ़ने लगा, और उनका शरीर विशाल और दैत्याकार हो गया।
उन दोनों भाईयों ने तप कर ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर उनसे वर ले लिया। अब वे अहंकार से चूर मनुष्य जाति को सताना शुरू कर दिया। यज्ञ , पूजा हवन जो ऋषियों द्वारा किए जाते थे , जिससे देवताओं की शक्तियां बढ़ती थीं उसे उन्होंने बंद करवाना शुरू कर दिया। ऋषियों , साधु, संतों को मौत के घाट उतारने लगे।
पृथ्वी लोक से लेकर स्वर्ग लोक तक सभी दोनों भाईयों के दुष्कृत्य से डरे हुए थे।
हिरण्याक्ष ने देवताओं की शक्तियां कम करने हेतु पृथ्वी को रसातल में छुपा दिया। भूदेवी कराह उठी । उसके अंदर के जीव नष्ट होने लगे । देवता अशक्त होकर शक्तिहीन होने लगे , तब सभी देवों और भू देवी ने भगवान विष्णु को पुकार लगाई "हे, जगत के पिता , परमेश्वर हम सब आपकी शरण में आए है। हमें बचाइए। "
भगवान विष्णु ने सागर से भूदेवी और उसमें बसे जीवों के उद्धार हेतु बराह का रूप धारण किया।
वराह की घ्राण शक्ति अत्यंत तीव्र होती है , वो हर जगह विचरण कर सकता है , इसीलिए भगवान विष्णु वराह रूप में पृथ्वी को ढूंढ कर पुनः स्थापित करने हेतु क्षीरसागर से निकल पड़े।
भूदेवी को छिपा, हिरण्याक्ष गर्व से फूला नहीं समा रहा था , वो देवराज इंद्र के पास पहुंचा और उन्हें युद्ध के लिए ललकारना शुरू किया । देवराज इंद्र ने दोनों हाथ जोड़ कर कहा "मैं आपसे युद्ध नहीं कर सकता आप अत्यंत शक्तिशाली हैं। भगवान विष्णु ही आपसे युद्ध कर सकते हैं। इस तरह हिरण्याक्ष वरुण , और अन्य देवों के पास गया लेकिन सभी ने उसे भगवान विष्णु के पास अपनी युद्ध की अभिलाषा को पूर्ण करने के लिए भेज दिया।
अब हिरण्याक्ष भगवान विष्णु को खोजने निकल पड़ा।
उसे पता चला कि भगवान विष्णु वराह अवतार ले , पृथ्वी को रसातल से निकालने गए हैं तो वो अत्यंत क्रोधित हो भगवान विष्णु के पीछे गया । उसने देखा कि भगवान विष्णु वराह रूप में पृथ्वी को अपने थूथनों में थामे तेजी से आ रहे हैं। वो पीछे पीछे से उन्हें ललकारने लगा , लेकिन भगवान विष्णु का प्रथम ध्येय पृथ्वी को अपनी जगह पर स्थापित करना था अतः वो उसकी बेतुकी बातों पर कोई ध्यान नहीं दे रहे थे। अंत में पृथ्वी को उसकी कक्षा में स्थापित करने के पश्चात उन्होंने हिरण्याक्ष का वध किया, और इस तरह राक्षस हिरण्याक्ष का वध हुआ।
हिरण्यकशिपु अब अकेला हो गया था। वो अपने पूर्वजन्म को भूल कर ईश्वर विरोधी बन गया था। भाई के वध के बाद उसने भी त्रिलोकी को सताना शुरू किया ।
अंत में भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लेकर उसका वध किया।
