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anu rajput

Classics Fantasy Others

4.5  

anu rajput

Classics Fantasy Others

वो…कहानी से कहीं ज़्यादा थी।

वो…कहानी से कहीं ज़्यादा थी।

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मैंने जब उसके बारे में लिखना शुरू किया,

तो जल्दी समझ गया

कुछ लोग कहानी नहीं होते,

वो उस कहानी की वजह होते हैं।

वजहें अक्सर शब्दों से डरती हैं।

पहला वाक्य काग़ज़ पर उतरा,
फिर दूसरा

और वहीं सब रुक गया।

नाम लेना आसान था,
मगर नाम के बाद
वो हमेशा फिसल जाती थी,

जैसे सच
लफ़्ज़ों में आने से छोटा हो जाए।

मैंने उसे ख़ुदा नहीं कहा,

क्योंकि ख़ुदा मांगने से मिलता है।

और वो…
बिना माँगे
दिल में उतर आती थी,

बिलकुल उस रोशनी की तरह

जिसकी ज़रूरत
अंधेरा होने से पहले नहीं समझ आती।

वो इस दुनिया में थी,
फिर भी अलग।

भीड़ में खड़ी होकर भी

भीड़ की तरह नहीं लगती थी।

जैसे हक़ीक़त ने
कुछ पल के लिए
खुद को और गहरा बना लिया हो।

उसकी आँखें
किसी बातचीत की मोहताज नहीं थीं।
वो चुप रहकर भी
इतना कुछ छोड़ जाती थीं
कि शब्द
शर्म से सिर झुकाते थे।

कभी सुकून,

कभी सवाल,

और कभी ऐसा भार
जिसे सिर्फ़ महसूस किया जा सकता था।

उसकी सादगी
वो एक जादू की तरह है

रूहानी,

निशब्द,

हल्की, जैसे सुबह की पहली हवा

जो धीरे से चुपचाप छू जाती है।

हर बार महसूस होती है,

जैसे कह रही हो

“मैं यहीं हूँ, हमेशा के लिए।”

उसका लहजा
कहानी का सबसे नाज़ुक हिस्सा था।

कभी शब्दों को सहला देता,

कभी बिना आहट
दिल में गहरी खुरचन छोड़ जाता।

वो अपने ख़्वाबों के बारे में
बहुत कम बात करती थी।
शायद इसलिए
क्योंकि बड़े ख़्वाब
धीरे-धीरे टूटते हैं।

वो ज़मीन पर चलती थी,
मगर भीतर
आसमान उठाए चलती थी।

जब कहानी को
अंत की तरफ़ ले जाना चाहा,

तो हाथ ठंडे हो गए।

क्योंकि कुछ कहानियाँ
पूरा होने के लिए नहीं होतीं।

वो बस
ज़िंदगी में
ठहर जाने के लिए आती हैं।

मैंने लिखना रोक दिया।

क्योंकि अगर मैं आगे लिखुं,

तो वो कहानी बन जाती।

और वो…

कहानी से कहीं ज़्यादा थी।

©अनु राजपूत


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