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anu rajput

Children Stories Fantasy Inspirational

4.5  

anu rajput

Children Stories Fantasy Inspirational

लकड़ी का घोड़ा

लकड़ी का घोड़ा

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बचपन के दिनों में, मेरे कमरे के एक कोने में एक घोड़ा खड़ा रहता था। वह सजीव तो नहीं था, पर निर्जीव भी नहीं लगता था। मैं घंटों उसे निहारता और अक्सर यही सोचता कि यह यहाँ से भाग क्यों नहीं जाता? क्या इसे बाकी घोड़ों की तरह खुले मैदान, नीले आसमान और हरी घास की तलाश नहीं है?


एक शाम, जब कमरे में ढलते सूरज की रोशनी फैल रही थी, मैंने दादी का पल्लू पकड़कर पूछ ही लिया, "दादी, यह घोड़ा कहीं जाता क्यों नहीं? क्या इसे कैद पसंद है?"


दादी ने मुस्कुराते हुए मेरे सिर पर हाथ रखा और बड़े धीमे स्वर में कहा, "यह कहीं आ-जा नहीं सकता। इसके पैर लकड़ी के हैं, जिनमें दौड़ने की ताकत नहीं है। इसकी आँखें काँच की हैं जिन्हें तुम तो देख सकते हो, पर इन आँखों से इसे कुछ दिखाई नहीं देता। यह तब तक यहीं खड़ा रहेगा, जब तक तुम खुद इसे सहारा देकर कहीं ले न जाओ।"


मैंने पूछा, "दादी, अगर मैं इसे बाहर ले जाऊँ और इसे ताजी हरी घास दिखाऊँ, तो क्या यह उसे खाने की कोशिश करेगा?"


दादी की आँखों में एक अजीब सी गहराई उतर आई, "शायद हाँ... या शायद नहीं भी।"


"पर क्यों दादी? सभी घोड़े तो घास खाते हैं, फिर यह क्यों नहीं?"


"क्योंकि," दादी ने मुझे अपने पास बिठाते हुए कहा, "यह बहुत वक्त से इसी तरह से इसी आदत में है। इसने न कभी बाहर की दुनिया देखी, न अपने जैसे दूसरे घोड़ों को दौड़ते देखा। इसे पता ही नहीं कि घास का स्वाद क्या है या उसका करना क्या है। अगर तुम इसे आज बाहर ले भी जाओगे, तो मुमकिन है कि यह वहाँ भी वैसे ही जड़ खड़ा रहे, जैसे सालों से इस बंद कमरे में खड़ा है।"


मैं चुप हो गया। दादी की बातों ने जैसे मन में एक धुंध पैदा कर दी थी। मैंने धीमी आवाज में कहा, "मतलब की..."


दादी ने बात पूरी की, "मतलब यह कि तुम दुनिया देखना। हर दिन कुछ नया सीखना, कुछ पाने की जिद रखना और कुछ खोने की हिम्मत भी। और सुनो, जब तुम बाहर की दुनिया से थककर इस कमरे में वापस आओ, तो अपने इस घोड़े को बताना कि तुमने बाहर क्या देखा। उसे बताना कि फूलों के रंग कैसे होते हैं, पहाड़ों से आती हवा की महक कैसी होती है और बहती नदी का शोर कैसा लगता है। उसे अपना हर अहसास सुनाना... ताकि तुम कभी 'लकड़ी' के न बनो।"


उन्होंने मेरी आँखों में झाँकते हुए कहा, "और जिस दिन तुम्हारी कहानियों में इतनी जान होगी कि वह इस लकड़ी के घोड़े को महसूस होने लगें, तो शायद उस दिन यह भी बाकी घोड़ों की तरह तुम्हारे साथ बाहर जाकर हरी घास खाना चाहेगा।"


मैंने हैरानी और उम्मीद से पूछा, "सच में दादी?"


दादी ने माथा चूमते हुए कहा, "हाँ, बिल्कुल सच।"


© अनु राजपूत


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