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अख़लाक़ अहमद ज़ई

Inspirational

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अख़लाक़ अहमद ज़ई

Inspirational

वक़्त

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            तेज़ बारिश ने पूरे मुंबई को जलमग्न कर दिया था। जो गाड़ियां जहाँ थीं, वहीं खड़ी हो गयी थीं। सब कुछ थम-सा गया था। लेकिन बारिश थी कि थमने का नाम ही नहीं ले रही थी। उसने सान्ताक्रुज से माहिम के लिए टैक्सी पकड़ी। वह कम्पनी की गाड़ी से ही आता-जाता था पर मौसम विभाग की घोषणा और एफ.एम. पर दी जा रही दीगर इलाक़ों में लगातार हो रहे जल भराव और ट्राफिक जाम की सूचनाओं ने हिम्मत पस्त कर दिया इसीलिए ड्राइवर को गाड़ी आॅफिस के गेराज में ही छोड़कर घर चले जाने को कहा और ख़ुद अपना एक्जीक्यूटिव बैग और छाता लेकर टैक्सी पकड़ निकल पड़ा। जिस समय वह टैक्सी पर बैठा, उस समय टैक्सी का टायर लगभग 8-10 इंच पानी में डूबा हुआ था लेकिन ज्यों-ज्यों टैक्सी आगे बढ़ाती गयी, पानी का स्तर बढ़ता गया और बांद्रा क्षेत्र में घुसते ही टैक्सी भुडभुडा कर खड़ी हो गयी। 

 "साहब, गाड़ी अब स्टार्ट नहीं होगी इसलिए मैं गाड़ी यहीं छोड़ कर जा रहा हूँ। चाहें तो आप हमारे साथ चलें या कोई दूसरी व्यवस्था कर सकते हों तो कर लें।" 

 "तुम जाओ, मैं अपने लिए कुछ करता हूँ।" 

 टैक्सी ड्राइवर चला गया। उसने इधर-उधर देखा। उसे जहाँ-तहाँ पानी में डूबी सिर्फ़ कारें ही दिख रही थीं या फिर इक्का-दुक्का लोग पानी को लांघते दिख रहे थे। उसने सोचा-- जब तक घर पहुंचने का कोई साधन नहीं मिलता, टैक्सी की छत पर ही समय गुज़ारा जाय। उसे यक़ीन था कि बीएसटी की बसें ज़रूर चल रही होंगी जो उसे मंज़िल तक पहुंचा ही देंगी। उसने फिर इधर-उधर नज़रें घुमायीं। उसे पास के ही एक सोसाइटी की बाउंड्री वाल पर दो कुत्ते बैठे दिखे। ऊपर पेड़ की अच्छी-ख़ासी छाया भी पड़ रही थी।। उसने सोचा--इंतज़ार करने की यह अच्छी जगह है। जल भराव से भी बचत होगी और बारिश से भी। वह जैसे-तैसे दीवार के किनारे पहुंचा और कुत्तों के बगल, उस पांच फुटी दीवार पर पेड़ के नीचे उचक कर बैठ गया। उसने मोबाईल से घर पर अपने सुरक्षित होने की सूचना भेज दी और यह भी बता दिया कि आने का साधन मिलते ही वह आ जायेगा। 

उसे आधे घंटे के इंतज़ार में ही भूख सताने लगी। वह बैग में रखे बिस्किट का पैकेट निकालकर कुटकने लगा। दो-एक बिस्किट उसने कुत्तों के सामने भी डाला। बैग में मिनरल वाटर की आधी बोतल भी मौजूद था। रात गहराती जा रही थी पर उधर से निकलने का कोई रास्ता ही नहीं सूझ रहा था। वापस लौटकर ऑफिस भी नहीं जा सकता था। वह दीवार पर पहलू बदलते बैठा रहा। बैग में रखे बिस्किट और पानी चुक गये थे लेकिन उसकी भूख और बढ़ गयी थी उसने शाम का नाश्ता भी नहीं किया था। सोचा था कि आज जल्दी घर पहुंच कर बच्चों के साथ पिज़्ज़ा-बरगर का लुत्फ़ उठायेगा या फिर पास के ही चायनीज़ कार्नर से नूडल्स-राइस मंगवा लेगा फिर रात को ऐसे ठंडे और सुहावने मौसम में डिनर रिजेंसी होटल में करेगा। बच्चे भी खुश हो जायेंगे, अपनी मनपसन्द डिशेज इडली-सांभर, मसाला डोसा पाकर। 

            जैसे-तैसे रात गुज़र गयी और दिन उजाले का एहसास कराने लगा लेकिन उसे दिन नहीं कहा जा सकता था। चारों तरफ़ बिल्डिंगें पानी में एक पैर पर खड़ी दिखने लगी थीं। सामने खड़ी टैक्सी आधे से ज़्यादा डूब चुकी थी। वह एकदम घबरा उठा। उसने घर पर फोन लगाया, आॅफिस में भी फोन किया पर सारे फोन डेड पड़े थे। उसने बेचैनी से इधर-उधर देखा। अचानक उसकी नज़र उसी बिल्डिंग की चौथी मंज़िल की एक बालकनी पर पड़ी, जिस बिल्डिंग के बाउंड्री वाल पर वह बैठा हुआ था। एक आदमी खड़ा, हाथ के इशारे से ऊपर आने को कह रहा था। उसे पहले भ्रम लगा फिर महसूस किया कि वह इशारा उसी के लिए था। उस आदमी ने फिर इशारा किया तो वह हिम्मत करके बाउंड्री के अन्दर कमर तक भरे पानी में उतर कर बिल्डिंग के मुख्य द्वार की तरफ बढ़ चला। 

 " मैं आपको कल शाम से ही देख रहा हूँ। फिर बाद में समझ में आया कि शायद आप बारिश की वजह से फंस गये हैं।" 

" हां, टैक्सी से घर जा रहा था कि टैक्सी यहीं सामने रोड पर बन्द हो गयी।" "कोई बात नहीं। आप कल से भीग रहे हैं। पहले कपड़े बदल लीजिए। मैं कुछ खाने का इंतज़ाम करता हूँ। आप कल से कुछ खाये भी न होंगे।"

 मेजबान ने उसे अपने कपड़े दिये और बाथरूम का दरवाज़ा दिखाकर खाने के इंतज़ाम में जुट गया। 

            वह बाथरूम से लौटा तब तक भूख अपने उत्कर्ष पर पहुंच चुका था। वह हाॅल में सोफ़े पर ढह गया। जिस्म का सारा सत निकाल लिया था जैसे किसी ने। इस वक़्त उसे जो कुछ भी मिल जाता, वह अपना पेट भर लेता। थोड़ी ही देर में मेजबान हाॅल में घुसते दिखा। उसके हाथों में सैंडविच और बिस्किट की प्लेटें थीं। उसका दिल हुआ कि वह बढ़कर प्लेटें थाम ले और बेतहाशा खाना शुरू कर दे। 

            उसके बिल्डिंग के सामने गुरूद्वारा है जहाँ अक्सर भंडारा होता रहता है। पकवान लेने के लिए लोग ऐसे टूट पड़ते हैं जैसे सदियों से भूखे हों। वह अक्सर बालकनी में खड़ा होकर अपनी पत्नी को बुलाता और कहता-- देखो, कैसा एक-दूसरे पर गिरे पड़ रहे हैं जैसे इनकी खाने से कभी मुलाक़ात ही न हुई हो। 

            मेजबान उसके सामने रखे टेबल पर ज्यों प्लेटें रखने के लिए झुका, त्यों उसने बेखुदी में प्लेटों को अधर में ही थाम लिया। उसे लगा--जैसे लंगर हासिल करने में वह भी शामिल है और हाथ बढ़ाकर दो प्लेटें हासिल कर ली है। 

 वह प्लेटें थामने के बाद चौंका फिर हंस पड़ा। मेजबान ने पूछा--

 "क्यों, कुछ ख़ास?" 

 " नहीं, कुछ ख़ास नहीं। लेकिन कुछ ऐसी भी बातें होती है जिसे वक़्त समझा देता है।" 

  वह फिर हंसा लेकिन इस बार अपने-आप पर। 

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