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kacha jagdish

Drama Romance

4  

kacha jagdish

Drama Romance

वक़्त

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6 mins
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गांव में प्रेम की दादी बीमार थी। और प्रेम इस बात से अंजान था। 

प्रेम आजकल ओफिस के कामों में इतना व्यस्त रहता था कि उसको थोड़ा फुरसत का समय नही मिलता। यह हाल उसका आजकल से नही बल्कि लगभग पीछले छह महीने से है। 

प्रेम के पास इतना भी समय नही था की गीत से एकाद घंटा बैठकर बात करे। उनकी शादी अभी तो साल भी नही हुआ। लेकिन गीत ने इस बात की शिकायत कभी भी प्रेम से नही की। प्रेम को कभी भी इस बात की भनक भी नही लगने दी की वह पूरा दिन कितना अकेले में गुजारती है। फ्लैट में वह दोनों के अलावा कोई नही। प्रेम का परिवार उसके भाई के साथ किसी ओर शहर में रहते थे। 

प्रेम देर सवेर घर आना, घर आ के भी ओफिस के कामों में लगे रहना। प्रेम का यह रोज का हो गया था। 

एक दिन प्रेम घर आता है, आते ही गीत को ढूंढने लगता है। वह उसे घर में नही मिलती। तो फोन करता है तो पता चलता है कि वह सामान लेने कही बहार गई है। 

प्रेम जट पट जाकर पास ही के होटेल में जाता है पार्टी का खाना लेकर आता है। वह जब घर पहुंचता है तो गीत घर पहुंच चुकी थी। गीत को सामने देखकर उससे रहा नही जाता और बोल पडता है, " पूछो, आज ओफिस क्या हुआ है।" गीत कुछ कहे उसे पहले ही सारी बाते बताने लगता है। 

" आज मेरे इतने महीने की महेनत रंग लाई है। मुझे एक बड़े प्रोजेक्ट का हिस्सा बनाया गया है। अगर इसमें मुझे कामयाबी मिली तो मुझे प्रमोशन भी मिलेगा। "

गीत इस बात से बिल्कुल खुश नही थी फिर भी मुंह पर झूठी खुशी दिखाते हुए पूरे मन से शुभकामनाएं दी। और मन ही मन सोच रही थी, यह सब आगे भी ऐसे ही चलता रहेगा। 

गीत उसके मन में उठ रहे दु:ख के बवंडर को दबाते हुए पूरे दिल से प्रेम की खुशी में शामिल हुई। 

प्रेम पूरे जोश के साथ काम में जुट जाता है। गीत पूरे मन से उसमें अपना सहयोग देती है। 

दो-तीन हफ्ते बाद घर से फोन आता है। पता चलता है की गाव में दादी बीमार है। जैसे ही प्रेम को पता चलता है। चिंतित होने लगता है। फोन में कहा जाता है की तुम दादी से बात करो और अपने बड़े भाई के घर पर रहने के लिए मना लो। तुम भी जानते हो दादी तुमसे कितना प्यार करती है। शायद वह मान जाये।

प्रेम भी मान जाता है। यह सब गीत के आखों के सामने हो रहा था। प्रेम अपनी दादी को फोन लगाता है और उससे यहां आकर रहने की बात करता है। लेकिन दादी नही मानती। वह बस एक बात कहती है। " मैं ठहरी गाव में रहने वाली मुझे कहा शहरों की हवा भाएगी।" कई मिन्नतें की वह टस से मस नही हुई। 

प्रेम दादी का लाडला था, और दादी प्रेम को सबसे प्यारी थी। मजाल है जो दादी के रहते प्रेम को कोई कुछ कह ले। 

सुबह होते ही प्रेम गीत को कहता है शाम को मेरा सामान तैयार रखना। 

गीत : कहाँ जाना है? 

प्रेम : मैं दादी के पास गाव जा रहा हूँ। वह आई तो ठीक वरना जब तक वह ठीक नही होती तब तक मैं गाव में रहूंगा। 

गीत यह सूनकर सोच पड जाती है। कुछ हफ्ते पहले जो कह रहे थे, वह सब एक बात होने से भुला दिया गया। सच ही कहते है परिवार वाले प्रेम के लिए दादी से बढ़कर कुछ नही। 

गीत का मन हो रहा था की जाकर प्रेम को गल्ले लगा ले। गीत के मन में प्रेम के लिए प्रेम उमड़ रहा था। गीत नही जानती कितने दिनों बाद प्रेम के लिए ऐसा महसूस किया था। 

गीत : मैं भी तुम्हारे साथ चलती हूँ। और मैं हमम दोनों की टिकट करवा लेती हूँ। 

प्रेम भी अपने ओफिस में छूटी के लिए बोल देता है। 

प्रेम घर पहुंचे ही दादी को हॉस्पिटल ले जाने की बात करता है। दादी अपने रिपोर्ट दिखाते हुए कहती है सब ठीक है। बस दो चार महीने काम करने से मना किया है।

प्रेम गीत से कहता है दादी मानी तो ठीक वरना मैं यहीं रहूंगा। 

गीत : तुमने मुझे इस घर तक पहुंचा दिया इतना काफी है। अब तुम्हें जाना है तो जाओ। दादी के ठीक होने तक मैं यहीं रुकूंगी। 

प्रेम यह सूनकर अचरज में पड जाता है। 


प्रेम : गाव की धूल मिट्टी से तुम्हें कोई परहेज नही। कही तुम्हारा रंग सावला न हो जाये। 

गीत : अच्छा, तुम्हें पता है कि मैं कैसी दिखती हूँ। मुझे लगा तुमने कभी देखा ही नही होगा। 

प्रेम मन ही मन बोला, " पहले जितनी सुंदर लगती थी आज उस से ज्यादा ही लग रही हो।" वहाँ से चला जाता है। 

शाम को गीत दादी के पास बैठती है। प्रेम के काम और इतने दिनों से कर रहे महेनत के बारे में बताती है। और साथ में प्रेम की कही बात भी। 

दादी भी कहती है वो घर छोटा है। प्रेम का भाई का भी परिवार वहाँ रहता है। जगह ही कहाँ है वहाँ। 

गीत तुरंत उन्हें अपने साथ रहने को कहती है। दादी थोड़ा सोचती है, और फिर हा बोल देती है। दादी भी गीत को परखना चाहती थी। 

तीनों प्रेम के फ्लैट में पहुंचते है। 

दूसरे दीन ही दादी गीत को कहती है अगर तुमसे काम नही हो रहा तो मैं तेरी सास को बुला लूं। 

गीत : क्या काम करना है बोलिए। मैं कर देती हूँ। 

दादी का मकसद गीत को परेशान करना नही था बल्कि परखना था। 

गीत बड़े दिल लगा कर दादी की सेवा करती 

दादी थोड़े दिनो में गीत के अकेलेपन को जान जाती है। 

एक दिन मौका देखकर दादी प्रेम से इस बारे में बात करती है। सब लोग खाना साथ में बैठ कर खा रहे होते है। 

प्रेम : जब से गीत जिंदगी में आई है तब से सब आसान हो गया। पहले घर से दूर था सब हाथों से देखना पडता था। लेकिन जब से गीत आई है। तब से हर चीज समय से होती है। तो मैं भी जितना हो सकता है उतना फोकस अपने काम करता हूँ। 

दादी : इतना ख्याल रखती है तेरा। 

प्रेम : पूछो ही मत। मुझे किसी भी चीज की कमी नही होने देती। 

गीत सोच रही थी, "चलो ओर नही तो कुछ नही मेरे काम की तो कदर की। ओर प्यार भरी नजरों से प्रेम को देख रही थी। 

दादी के आने से गीत को अकेलेपन में सहारा भी मिला। 

दिन कैसे बीत गये पता ही चला। 

प्रेम का भी काम खत्म हो गया था। 

दादी ने वापिस घर जाने का मन बना लिया था। फिर भी दादी गीत से कहती है। बहुत खटकी होगी ना इतने महिने मैं तुझे। 

गीत : नही तो, बिलकुल नही। 

गीत के मन की बात उसके होठों पर आ जाती है। 

गीत : जिसने हम प्यार करते है उनसे जुड़ी हर चीज हमें अपनी लगने लगती है। 

अचानक गीत को क्या बोल गई समझ आता है और शर्माकर चली जाती है। 

दादी प्रेम को छूटी लेकर घूमाने को कहती है। प्रेम भी मान जाता है। 

तीनों एक हफ्ते के लिए तीर्थ यात्रा पर जाते है। बड़े मजे करते है। 

फिर दादी को अपने गाव को छोड़ ने जाते है।

जब वहाँ से जाने के लिए निकलते है तब दादी गीत से कहती है। 

" जब इतना प्यार करती हो तो जताया भी करो"

गीत : कहने से प्यार हो तो प्यार कैसा। 


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