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Shalinee Pankaj

Drama Romance

3  

Shalinee Pankaj

Drama Romance

विवाह प्रेम

विवाह प्रेम

6 mins
298

रात 10 बज चुका था मोबाइल नम्बर डायल करते करते।कभी आउट ऑफ कवरेज एरिया बताता तो कभी स्विच ऑफ बताता।तेज बारिश हो रही थी।मन बेचैन था कमरे में तेज कदमो से इधर उधर चल रही थी।और फिर सोफे में जा निढाल हो बैठ गयी।आँख मुँद ली और प्रभु से उनकी सलामती की दुआ करने लगी।वो पल याद आने लगे जो साथ बिताए।बार बार उनकी याद आने लगी।कभी ऐसा नहीं हुआ कि बिना बताए इतनी देर बाहर रहे हो।अभी तो विवाह हुए एक वर्ष नहीं हुआ! मात्र 8 माह और अभी तबादले से एक महीना पहले ही तो यहाँ शिफ्ट हुए है।नई जगह,नए लोग न मैं किसी को जानती यहाँ।घर फोन लगाऊँ तो परेशान हो जायेंगे।कहीं कुछ हो तो नहीं गया नहीं नहीं ....अनिष्ट के भय से हृदय काँप गया।

दरवाजा खोल बाहर गयी किसके दरवाजा पर दस्तक दुँ।मिसेस सिंघानिया हाँ ये ठीक रहेगा।दरवाजा खटखटाते ही मिस्टर सिंघानिया निकले,और पूरी बात सुनकर बोले"भाभी जी चिंता न करिये किसी ट्रैफिक में फंस गए होंगे।" पर पर ..मोबाइल बन्द आ रहा।मेरी बात काटते हुए पुनः मिस्टर सिंघानियां बोले "ओहहो बैटरी डिस्चार्ज हो गयी होगी।" आप ऑफिस फोन लगाई है!"मैंने कहा हाँ ..पर रिंग जा रही कोई उठा नहीं रहा।हम्म लम्बी सांस ले सिंघानिया जी बोले "आप थोड़ा धीरज रखिये बारिश मे कहीं फंस गए होंगे एक दो घण्टे इंतजार करते है।अगर नहीं आये तो पुलिश स्टेशन चलेंगे।

मैं वापस अपने रूम में आ गयी।प्रेम वेम कुछ नहीं होता यही तो कहती थी न मैं।उनके हर अच्छाई को

नजरअंदाज करती।वो तरह तरह से जताते की मुझसे बेइंतहा मुहब्बत करते है पर मैं विवाह समझौता होता है।

साथ जिंदगी बिताने के लिये प्रेम हो जरूरी नहीं यही तो कहती थी, और मानती भी थी।कारण भी था विवाह के नाम पर मजबूरी,समझौता,झगड़े और तलाक ही देखी थी।और यही मेरे दिमाग मे बसा हुआ था।पूर्वाग्रह से पीड़ित मैंने प्रेम को समझना ही नहीं चाहा।पर आज उन्हें खो देने के भय मात्र ने दिलो दिमाग को झकझोर दिया।तरह तरह के ख्याल आ रहे थे दिमाग मे।मैंने तो कभी जताया ही नहीं की मुझे उनका इंतजार रहता है। सच कहूँ तो मेरे इंतजार से पहले वह 8 बजे दरवाजे में दस्तक दे देते थे।इसलिए इन पलों को कभी संजीदगी से जिया ही नहीं की किसी के इंतजार में भी प्रेम होता है।इतना ज्यादा प्रेक्टिकल तो नहीं होना चाहिए।बुद्धि की वजह से दिल के दरवाजे बंद करना भी तो गलत है।आज वो थोड़ा लेट हुए तो अंदाजा हो रहा कि मेरी जिंदगी में वो क्या है।बेशक प्रेम विवाह नहीं है हमारा!पर जाने क्यों आज मन बेचैन हो रहा था।उनके किसी दोस्त सहकर्मी का नम्बर भी तो नहीं ओह्ह ये क्या हो रहा।तभी मेरी सहेली का काल आया।"जीजू घर आ गए क्या"नहीं पर तु क्यो पूछ रही? उधर से सहेली बोली "बस ऐसे ही"मुझे घबराहट होने लगी मैंने कहा सच बता क्या हुआ नीतू!"सुनो सिमरन जिस बस से मैं आ रही थी उसमें लोग एक एक्सीडेंट की बात कर रहे है।"जीजू के ऑफिस में कोई 32 साल का आदमी लगभग 6 बजे लोकल ट्रेन पकड़ते पैर स्लिप हुआ और "......नहीं वो ये नहीं हो सकते नीतू तु ऐसा कैसे सोच सकती है।"अरे नहीं सिमरन मुझे लगा जीजू को पता होगा कि उनके स्टाफ में से ही किसी के साथ ये हुआ होगा।पर मैंने गुस्से में फोन काट दिया कि ये पागल हो गयी कुछ भी बकवास कर रही हाँ 32 साल के लगभग ये भी है लोकल ट्रेन से आते जाते है पर ....वो कोई भी हो ये नहीं हो सकते कभी नहीं ।तभी बेल बजी रिसीवर रखते हुए दरवाजे की तरफ दौड़ी ये होंगे।पर सामने मिसेस सिंघानिया थी।"भाभी आप ये चाय पीलो खाना"नहीं नहीं मुझे नहीं खाना है अभी।मिसेस सिंघानिया बोली"पता है आप नहीं खाएँगी इसलिए ये चाय ले लीजिए।और आराम कीजिये अभी सिर्फ साढ़े 10 हुआ है बारिश थोड़ी बंद होगी तो बगल वाले गुप्ता जी देखने जाएंगे आस-पास"और सिंघानिया जी चली गयी।और अपने बेटी को छोड़ चली गयी कि आंटी का ध्यान रखना।पर मेरी उम्मीदे तो आज पड़ोसियों से ज्यादा थी।कितने स्वार्थी लोग बारिश हो रही तो क्या कार से तो जा सकते है।मेरा बस चले तो अभी चली जाऊँ पर पीछे से कहीं ये घर आये तो और ये बारिश इसे भी आज मौका मिला।उफ्फ!!मुझे तो याद भी नहीं की आज कौन सी रंग की शर्ट पहने है।सीढ़ियों में सिर पकड़ कर बैठ गयी।मां कहती है ऐसा बैठना अपशकुन माना जाता है पर न मैं किसी को देखना चाह रही थी,न सुनना।धीरे धीरे याद आने लगा कितने अलग स्वाभाव हम दोनों का पर पसंद एक होने लगी थी।उस दिन घर की सफाई करते स्टूल से गिरी पैर में मामूली मोच आई और कितना घबरा गए।पूरा दिन बिस्तर से उठने नहीं दिए।ऑफिस से भी छुट्टी ले ली।पर मैंने उन हर छोटी छोटी खुशी को नजरअंदाज कर दिया।और मेरे बर्थडे वाले दिन खुद तो शहर से बाहर चले गए जरूरी काम से पर पूरा दिन कभी बुके ,कार्ड्स,गिफ्ट भेजते रहे और,ससुराल से सभी रिश्तेदारों का काल आया जबकि एक वर्ष भी तो नहीं बीता था यहां।इन्होंने ने ही तो सबको बताया होगा न कि आज सिम्मी का बर्थडे है।फिर भी मैं उदास रही क्योकि मेरे मम्मी पापा जन्मदिन भूल गए थे,पर रात में खुद मम्मी पापा को साथ लाये और मेरा जन्मदिन ही यादगार बना दिया।तभी दरवाजे में नजर पड़ी हसबैंड जी आते दिखे।मैं दौड़कर लिपट गयी सुनो जी मैं आपसे बहुत प्यार करती हुँ।कहाँ चले गए थे आप।आपको पता है मुझे आज आपका इंतजार करना अच्छा नहीं लगा मैं तो मर ही जाती।वो लगातार मुझे छुड़ा रहे थे और कह रहे थे अंदर चलो पर मैं लगातार रोते जा रही थी और बोलते जा रही थी।आज मुझे कहने दीजिये हमारा प्रेम विवाह नहीं पर "विवाह प्रेम"हैजिसकी खुश्बू मैंने महसूस ही नहीं करना चाहती थी वो इश्क़ हो गया है मुझे हाँ प्रेम है आप से बेइंतहा,बेहद।"आंटी आंटी बेड में सो जाइये।"अरे ये क्या मैं ..मैं सपना देख रही थी!मैं फिर दरवाजे की तरफ देखी।और फिर मोबाइल अरे 3 missed कॉल किसका है सोचते हुए उस लैंडलाइन नम्बर पर कॉल की तो किसी हॉस्पिटल का था।दिल जोरो से धड़कने लगा।और रुआँसी भी हो गई।पता नोट कर रोने लगी।आवाज सुन सिंघानिया जी की फैमिली भी आ गई। उनकी बेटी ने हॉस्पिटल का पता जो डायरी में लिखी थी वो दिखाई और सब हॉस्पिटल पहुँच गए।सामने पतिदेव को देख उनसे लिपट गयी।जाने कितनी बाते कहनी थी पर जुबां बंद हो गए और आँसु बहने लगे।प्राथमिक उपचार के बाद उनकी छुट्टी हो गयी।आज वो अपनी बाईक से गये थे।पर इस बात का मुझे ध्यान ही नहीं रहा।पतिदेव कहने लगे "ऑफिस से निकलते ही बारिश शुरू हो गयी।घर लेट पहुंचने से तुम परेशान न हो ये सोच बारिश में भीगते निकल गया।पर सड़क पर गाड़ी स्लिप हो गयी मोबाइल कहीं फेंका गया।हल्की चोट लगी थोड़ी बेहोशी रही पर लोगो ने हॉस्पिटल पहुंचा दिया।और जब हॉस्पिटल से कॉल किया तो तुम रिसीव न कर पाई।"बस!.....अब कुछ न कहिये।आज मुझे मेरी जिंदगी मिली बस आँखें बंद कर

मैंने ऊपरवाले का शुक्रिया अदा किया।



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