विवाह की पहली रात
विवाह की पहली रात
विवाह की पहली रात.
🌧️ बादल गरजते हैं, बूंदें टपकती हैं, और मोर नृत्य करता है।
सिटी सिविल हॉस्पिटल में आज की रात धीमे-धीमे धड़क रही थी… धीरज के बेड के पास स्टैंड पर लटकती सलाइन की टपक और धृति की धड़कन निरंतर थी, फिर भी दो आत्माओं के बीच एक अजीब सी हलचल थी।
धृति ने धीरज को करवट दिलाई और अपने मेंहदी से सजे हाथों से उसके बाँह पर "नाइसिल" लगाया… जैसे तपते रेगिस्तान में कोई ठंडी छाँव उतर आई हो। उसके स्पर्श में एक मोहक कंपन था… धीरज को लगा जैसे वह स्पर्श कह रहा हो —
"मैं तेरी धड़कनों के बीच हूँ।"
धीरज ने करवट लेते हुए धृति के मेंहदी रचे हाथ को चूमा — उस चुम्बन में कोई वासना नहीं थी, बल्कि एक नम्र संकेत था कि —
"मेरा दिल, तेरे दिल की आँख बनकर ताउम्र तुझे पढ़ता रहेगा।"
उन नवविवाहित होंठों ने अभी दीर्घ चुम्बन का स्वाद नहीं चखा था… लेकिन उनकी आँखें आत्मा के द्वार खोल रही थीं। ऐसा लगता था जैसे किसी संयोगवश दोनों जीवों की सदियों की तन्हाई… पिघलकर एक हो गई हो।
🌙 मधुरिमा की रात में घायल पाँवों के साथ, सिटी हॉस्पिटल के कमरे की छत के नीचे अभी बहुत कुछ अनजाना है… लेकिन दिल के भीतर, उस नवविवाहित जोड़े को एक शांति है, एक पुकार है —
"हाथ नहीं छोड़ेंगे… क्योंकि तेरा स्पर्श मेरी साँस है, यही जीवन का निष्कर्ष है।"
"मैं मोर हूँ, तो तू मेरी टपकती बूंद है।"
यह उनकी नजरों के पहले मिलन की हल्की सी थरथराहट थी।
धृति और धीरज — विवाह की पहली रात की कामुक संवेदना की पहली प्लेटोनिक प्रेम की सम्मोहिनी में मौन रहकर, केवल नजरों के पुल से संवाद कर रहे थे।
