विधना लेख मिटाईल ना जाई-2
विधना लेख मिटाईल ना जाई-2
"तो... छोटे तू सही सही घर पहुंच गया ना ....? अब मैं तुम्हें एक बात बताता हूं । तुझसे ही मैं हमेशा कहता था कि ... मेरे दोनों बेटे बिल्कुल नालायक हैं और इन्हें मुझसे अपनी मां से कोई मतलब नहीं है। मतलब अगर है तो सिर्फ पैसे से इससे अच्छा तो मैं बेऔलाद ही रहता ! "
दोनों बेटे अवाक होकर सुन रहे थे।
उधर से शायद आवाज आई थी कि ....
" आप शांत रहिए धीरज रखिए !"
इधर से अविनाश जी ने थोड़े गुस्से में कहा ,
" अरे अब और क्या और कितना धीरज रखें ....?"
इधर पुष्पा अलग उबल रही थी कि ....
आज ये बाबुजी को हो क्या गया है ? घर का सारा कच्चा चिट्ठा चाचाजी को सुनाने में क्यों लगे हुए हैं ?
उनकी पत्नी सोच रही थी कि पूरी जिंदगी तो चुप ही रहे .... ये आज क्या क्या बोले जा रहे हैं , शायद इनको होश नहीं है। अब बुढ़ापे में बेटों की बखिया उधेड़ने पर लगे हुए हैं।
सब अविनाश जी को रोकना चाह रहे थे ब, पर कैसे ... ?
यह समझ में नहीं आ रहा था ।
क्योंकि वह फोन पर अपने छोटे भाई से बात कर रहे थे और अगर कोई उन्हें रोकता तो आवाज़ चाचा जी तक़ भी जाती । इसलिए सब मन मसोसकर सिर्फ मूक दर्शक बने हुए थे ।
सबने गौर किया ... कि .... अब अविनाश जी की आवाज अचानक भर्रा गई थी । वह बड़े ही आद्र स्वर में कह रहे थे ।
" छोटे तू जल्दी आ जा... भाई , मैं थोड़ा परेशान हूं । इस घर में के बेटों को कुछ समझ में नहीं आता है कि माता-पिता से कैसे बात करते हैं।
एक तो हमें बेघर कर दिया ऊपर से हमारे साथ बदतमीजी से पेश आ रहे है! "
उधर से बच्चों के चाचा जी की आवाज आई,
" ठीक है भैया! हम वहां पर आते हैं। और उनसे बात करके उनका दिमाग ठिकाने लगाते हैं!"
अगले दिन...
कुछ खास नहीं हुआ सिर्फ यह हुआ कि अविनाश जी के छोटे भाई पुनीत जी सप्तनीक आए।
उनके आने से घर के दोनों बेटे और बहू कुछ ज्यादा ही अनुशासित व्यवहार करने लगे।
आने का उद्देश्य कुछ-कुछ तो सब समझ रहे थे लेकिन समझ पा रहे थे कि ....
ज़ब संपत्ति अविनाश जी की थी और उन्हें अपने बेटों में बंटवारा करना था तो ...
चाचा जी क्या ही उखाड़ लेंगे।
छोटी बहू को तो ज्यादा फिक्र नहीं थी उल्टा उसे मेहमान के आने से घर का माहौल थोड़ा बदल गया था क्योंकि उसकी सांस अपनी देवरानी से बड़ी हंसकर बात कर रही थी।
और... चुलबुली सी चचिया सास ने जैसे आकर घर का माहौल ही बदल दिया था।
धीरे-धीरे शाम हुई हर शाम की चाय के बाद ही अविनाश जी ने दोनों बेटों को बैठक में बुलाया।
हमेशा से स्पष्ट वादी अविनाश जी ने आज भी अपनी बात बिना किसी भूमिका के शुरू कर दी ।
"देखो...विजय और सुरेश...!
तुम दोनों कह रहे थे ना कि अब संपत्ति का बंटवारा हो जाना चाहिए। लेकिन क्या तुम्हें यह पता है कि यह संपत्ति है किसकी ....?"
हमारे पैतृक संपत्ति में हम दोनों भाइयों का हक था। लेकिन हम दोनों भाइयों ने कभी भी बंटवारा नहीं किया।
और... आप जब तुम्हें पटवारी की बात कर रहे हो तो तुम्हारे चाचा जी का तो सिर्फ एक ही बेटा है। उसका भी है संपत्ति अगर बराबर बराबर बंटेगी तो भले ही चाचा जी का एक ही बेटा है लेकिन सारी संपत्ति बराबर बराबर बंटेगी।
और... तुम्हें शायद पता नहीं है यह घर पहले से ही गिरवी रखा हुआ है। तुम दोनों भाइयों को इंजीनियर बनाते बनाते हमारा घर बिक चुका है।
और...रही बात तुम्हारी मां और मेरा खर्चा चलाने की....तो यह छोटे हर महीने एकमुश्त रकम भेजता है। तभी हम दोनों का गुजारा चल रहा है।
" पर... बाबुजी ! आपने यह सब हमें पहले क्यों नहीं बताया? हम तो यही जानते थे कि.... आपके पास बहुत पैसा है और आपलोग ऐशो आराम से जी रहे हैँ !"
बोलते हुए विजय की आवाज़ एकदम लड़खड़ा गई थी।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि अचानक पासा पलट कैसे गया?
अविनाश जी को पता था कि उनके दोनों बेटे उनकी किसी बात पर विश्वास नहीं करेंगे। इसलिए उन्होंने मकान और संपत्ति के सारे कागजात सामने लाकर रख दिए।
सारे कागजात बिल्कुल सही थे और इन दोनों बच्चों को पढ़ाते हुए उन्होंने काफी मूल भी लिया था और आखिरकार मकान भी गिरवी रख दिया था।
लेकिन....
उस कागज़ में जो एक नाम था। उसे पढ़ते ही दोनों बेटे का दिमाग घूम गया...
उस पर स्पष्ट अक्षरों में चाचा जी का नाम लिखा हुआ था ...
पुनीत श्रीवास्तव
मतलब मकान भी चाचा जी के नाम पर गिरवी रखा था एक तरह से सब कुछ तो उन्हीं का हुआ।
सारे कागजात देखने के बाद दोनों भाइयों का सिर शर्म से नीचे झुक गया।
बड़ी मुश्किल से विजय के मुंह से निकला..
" हमें माफ कर दीजिए बाबू जी और चाचा जी!"
अब छोटा भाई भी क्यों पीछे रहता...?
वह भी बोल पड़ा....
" हम अपने किए पर शर्मिंदा हैँ। हमने दौलत को इतना महत्व दिया और रिश्ते को पीछे रख दिया!"
"खैर... तुम लोगों के कठोर शब्दों के लिए तो तुम्हें माफी नहीं मिलेगी । लेकिन.... आगे से सोच - समझकर बुजुर्ग से बात करना। याद रखना हमने तुम्हें मना किया है हमने तुम्हें जल्दी दी है इस बात का तो मेहसाना मानो लेकिन यह बात है कि हमने तुम्हें बड़ा करने के पीछे अपनी जिंदगी के बहुत महत्वपूर्ण साल लगाए हैं !"
पुनीत जी ने बहुत ही गंभीर शब्दों में कहा।
और अब उनकी मां ने कहा....
"तुमदोनों देख रहे हो ना...? दोनों भाइयों में कितना प्यार है । काश .....आगे जाकर तुम दोनों भाइयों में भी इतना ही प्यार हो...!"
दोनों भाई ने एक स्वर में कहा...
"माँ! हम पूरी कोशिश करेंगे कि...
हम दोनों भाइयों का प्यार बना रहे। पर उसके पहले हम यह कोशिश करेंगे कि अब आपका और पापा का दिल ना दुखे!"
बड़े ही खुशनुमा माहौल में धीरे-धीरे अब चाय के बाद समोसे और जलेबी का दौर भी शुरू हो गया था।
पिछली पीढ़ी के दो भाइयों ने नई पीढ़ी के भाइयों को सबक सिखाया था। और यह भी दिखाया था कि... प्यार का एक रूप यह भी होता है।
सिर्फ स्वार्थ से रिश्ते बनते नहीं बिगड़ते हैं और जब शरीर गिरता है तब कोई साथ नहीं देता है, बल्कि रिश्ता ही काम आता है।
तभी अविनाशी के मुंह से निकला...
"तुम लोग चाहे कुछ भी कह लो।
लेकिन यह सच है कि हम दोनों भाइयों ने अपना प्यार इसलिए बनाए रखा कि हमारे माता-पिता ने एक बात खास रूप से सिखाया था कि...
विधना लेख मिटाईल ना जाई ;
कभी ना बांटिहौं अपना मन भाई भाई!
जबहूँ अंत काल ज़ब इह शरीर कै आई ;
तभैं और कौनो ना कांधा देवन के आई!
" इन चंद पंक्तियों में पूरी जिंदगी का सार समाया हुआ था। और हम दोनों भाइयों ने उन पंक्तियों में ही अपने रिश्ते को ढूंढ लिया था!"
अविनाश जी के ऐसा बोलते हुए उनका गला भर आया था और तभी पुनीत जी ने अपने दद्दा के आंसू पोछे और उनके गले लग गए और बोले,कि...
"दद्दा! आप मत रोना।आप रोते हुए कभी अच्छे नहीं लगते!"
इधर...
नई पीढ़ी के आधुनिक दोनों भाई उन दोनों को देख रहे थे जो इस उमर में भी निः स्वार्थ भाव से एक दूसरे के प्रति प्यार और आदर की भावना रखे हुए थे। और दौलत और शोहरत से परे दो भाई गले मिल रहे थे।
प्रत्यक्षम प्रमाणम
को दर्शाती उन दोनों भाइयों की जोड़ी ने आज विजय और सुरेश की आंखें खोल दी थी।
अंततः दौलत और शोहरत तो यहीं रह जाता है। रिश्ते ही हैँ जो साथ निभाते हैं।
यह बात सबके मन में गूंज रही थी।
