वह खूबसूरत पल
वह खूबसूरत पल
आज जाहनवीं आँखे बंद कर उन खूबसूरत पलों को याद कर रही हैं,जब वह सवेरे सवेरे टहलने जाती थी,आज खिड़की पर बैठकर उन दिनों को याद कर रही है कितना मजा आता था तेज तेज रेस लगाने मे वाक करने में.या हरी हरी घास में नगें पाँव टहलने में या और पीछे से अंकल की आवाज आती थी गुनगुनाने कि धीरे धीरे नंगे पाव टहलना अरे वही गुलामअली की गजल वह भी गुनगुना उठती फिर वह दोनो खिलखिलाकर हँसते दिन भर Energyपूरी फिर किसी के साथ रोडसाइड.ढाबे पर चाय पीना ,कल फिर मिलेगें का वादा कितने सुंदर दिन थे फिर योगा करना फिर आँफिस जाना यह नियमित यही दिन भर की भागदौड पर लोग कहते कि Engery कैसे वह हँस कर कहती कि बस सब शिवाआशीष है .तब भी अकेली थी आज भी अकेली पर अकेली कहाँ,Lotes of friends है ,और अब वह सब कर सकती जो पहले करती थी बस कल से चालूँ वह पहले कि तरह फिर जियेगी बिंदास.
