Moumita Bagchi

Drama Romance Thriller


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Moumita Bagchi

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उस एक रात के अतिथि- भाग -2

उस एक रात के अतिथि- भाग -2

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आपादमस्तक स्नोसूट में ढके हुए उस शख्स का चेहरा केरोलीन तब नहीं देख पाई थी जब उसने उसके घर में कदम रखा था। हालांकि चेहरा देखने का उसे कोई खास कौतुहूल नहीं था क्योंकि ऐसी हालत में चोर, गुंडा, खूनी, उचक्का चाहे जो कोई भी उसके द्वार पर आता है, मुसीबत में फंसे हुए को, शरण देना उसका मनुष्य धर्म था।

परंतु आश्चर्य की बात यह थी कि आगंतुक जब उसके पास से होकर गुजरा तो न जाने क्यों उसकी चाल उसे कुछ जानी पहचानी सी लगी। परंतु ऐसा कैसे हो सकता है? शायद वह आजकल कुछ ज्यादा ही सोचने लगी थी।अकेली घर में बैठी -बैठी उसके दीमाग के शायद घोड़े दौड़ने लगे थे। परंतु वह खुशबू ? वही ? --- जो इस समय पूरे घर में पसरा हुआ है --- वह भी किसी की यादों की फरियाद लेकर आया हुआ सा लगता है। पर ऐसा कैसे हो सकता है ? वह जिसके बारे में सोच रही है उसके तो मरे हुए कई वर्ष हो गए हैं। वह कहीं कोई दिवास्वप्न तो नहीं देख रही है फिर से ? उसकी कल्पना वाकई कुछ ज्यादा ही उर्वर हो गई है, शायद !

बहरहाल, अपनी कल्पनाशक्ति को विराम देकर, केरोलीन काम पर लग गई। पहले आगंतुक को उसके कमरे तक पहुंचाया। गीजर चलाकर बाथरूम में साफ तौलिए रख दिए और नीचे कीचन में उसके लिए गरम काॅफी तैयार करने चली गई।

कैरोलीन को आजकल मानसिक तनाव बहुत होने लगे हैं। रात को नींद भी ठीक से नहीं आती है ।अकेले रहना कभी कभी बहुत कष्टदायी हो जाता है आजकल। इससमय अभिजीत को वह बहुत मिस करती है। हालांकि अभीजित की उम्र साठ वर्ष से कुछ ज्यादा ही है और वह चालीस की होने वाली है, इसलिए उससे सारी बातें वह शेयर नहीं कर पाती है ।फिर भी उसकी उपस्थिति दिल को बहुत सुकुन देता है। उन डिप्रेसन के दौर में उसका उसे बाहों में थामे रखना बहुत कारगर साबित होता है।

काॅफी बनाते-बनाते उसे यह ख्याल आया कि यह शख्स उसीकी तरह बहुत कम बोलनेवाला है। अगर अभीजित इस समय यहाॅ होता तो इतनी देर में बक-बक कर उसकी जान खा गया होता। परंतु इसने तो मानों खामोशी की चादर ओढ़ रखी हो अपने ऊपर।जरूरत से कुछ ज्यादा ही चुपचाप लगता है। घर के अंदर आने के बाद उसने एकबार भी नहीं बोला। और उसके सारे प्रश्नों का उत्तर जहाॅ तक हो सका, हाॅ या ना में सिर हिलाकर दिया है। कुछ अजीब सा अहसास हो रहा था केरोलीन को। खैर, वह काॅफी बनाने में ध्यान देने लगी।

काॅफी के साथ ट्रे में कुछ कूकीस, मफीन्स, और भारतीय दुकान से मंगवाया हुआ समोसा एवं कुछ नमकीन रखकर केरोलीन मेहमान को देने उसके कमरे की ओर चली। कमरे के दरवाजे पर पहुंचकर जब उसके हाथ दस्तक देने के लिए उठे तो उसने पाया कि दरवाजा खुला हुआ है। उसकी नजर बरबस अंदर कमरे की ओर चली गई तो उसने देखा कि आगंतुक उघरे वदन सिर्फ एक तौलिया लपेटकर दरवाजे की तरफ पीठ करके बैठा हुआ है। अपनी जांघ पर कोहनी रखकर हथेली में सिर टिकाकर किसी गहरी चिंता में डूबा हुआ है! फिर केरोलीन की नजर उसकी खुली हुई पीठ पर गई। लेकिन यह क्या ? वहाॅ पर उस काले तिल को देखकर वह बुरी तरह काॅप उठी। हाथ में पकड़े ट्रे सशब्द जमीन पर गिर पड़े। और उसके लगभग सफेद पड़ चुके चेहरे के आगे आगंतुक ने अपना जलवा दिखाया। 

वह स्टिव ही था !

स्टिव, उसका पहला पति, जिससे उसका डाइवोर्स होने वाला था और जिसके मरने की खबर दस वर्ष पहले अखबार में छप चुका था।

( क्रमशः)


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