उड़ान
उड़ान
सात समंदर पार अपनी उड़ान की थकान को भूल कर वह होटल के कमरे में नहा धोकर नाश्ता मँगाया। आँखें बंद कर बिस्तर पर ज्यों ही लेटने गया, घर के तकिये और गद्दे याद आ गये।
कैसे गलती से भी अगर उसके तकिये बदल जाते तो आधी रात में भी भाई को जगा कर तकिये बदल लेता।
आँखों नम होने लगी, ओहह; उड़ान की चाहत में कितनी दूर निकल आये ! तभी रुम सर्विस, कहते हुए एक ट्राली समेत खाना लेकर बैरा अंदर आया।
अररे वाह कितने करीने से भोजन आया है, पहला निवाला मुँह में डालते ही मुँह का स्वाद बिगड़ गया। माँ के हाथों की थाली याद आ गई, साथ ही माँ को हर बात में झल्लाकर जवाब देना भी।
“क्या माँ; आप हर बार भीगी थाली में रोटियां रख देती हैं, सब्जियों का और रोटियों का स्वाद बिगड़ जाता है।” नहीं समझ सका था माँ की व्यस्तता में भी माँ की ममता छूपी रहती है।
हाँ वह प्यार ही तो था जो साफ सुथरी थाली में गर्मागर्म भोजन।
वह झटपट तैयार हो कर ऑफिस की ओर निकल पड़ा। वर्षों की चाहत पूरी हुई, सात समंदर पार आने का मौका जरूर मिला पर घर परिवार और अपने संस्कृति एवं समाज से दूर होकर।
मन ही मन तय कर लिया अब स्वार्थी नहीं संस्कारी बनूँगा, माँ पापा के तपस्या का फल उन्हें भी तो मिले।
भले ही दो पैसे कम मिलेंगे पर परिवार का सुख और सबका साथ तो रहेगा अपनों को याद करते ही होठों पर मुस्कुराहट तैर गई।
बुद्धू; आकाश से ऊपर उठने की चाह में कितना अकेला हो जायेगा यह तो सोचा ही नहीं था।
अपने माथे पर हल्की सी चपत, बिल्कुल पापा के जैसे लगाया।
