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उड़ान

उड़ान

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सरिता पचास साल पूरे कर चुकी थी, आज उसका जन्मदिन था। बालकनी में बैठी अपने जीवन का आँकलन कर रही थी ! क्या खोया-क्या पाया ! अब आगे क्या-क्या करना है, कितनी जल्दी दिन बीत जाते हैं, पता ही नहीं चलता। बचपन से लेकर आज तक की स्पष्ट छवि उसके आगे घूमने लगती है और वो छब्बीस साल पीछे चली जाती है जब उसकी शादी हुई थी।

उससे पहले उसके कितने पंख लगे थे, तब वह उड़ना चाहती थी पर पंख जैसे शादी के बाद वहीं ठहर गये थे और जीवन की गाड़ी इतनी तेज़ी से पटरी पर दौड़ रही थी कि उसे पंख फैलाने का अवसर ही नहीं मिल पा रहा था। घर की और बच्चों की ज़िम्मेदारी इतनी थी कि जिससे पीछे नहीं हटा जा सकता था, वो यह सब बख़ूबी जानती थी और निभा भी रही थी। कभी हार ना मानने वाली हमेशा अपने काम को अंजाम देने वाली, भला आज कैसे चुप बैठ सकती थी ? जबकि अभी तो उसकी उड़ान बाक़ी थी।

आज बच्चे अपने पैरों पर खड़े होने को तैयार थे। बस इसी उधेड़बुन में लगी थी कि अचानक द्वार की घंटी बजती है और वह दरवाज़ा खोलती है। बेटा, माँ के गले लग जाता है, "माँ, मुझे नौकरी मिल गई, अब आपकी जो उड़ान बाक़ी रह गई थी, जो भी सपने अधूरे रह गये थे, उन्हें पूरा करने का समय आ गया है। मुझे बताओ ? अब तक आप हमारी सहायता करती थीं आगे बढ़ने में, अब हमारी बारी है आपके सपने पूरे करने की।"

इतना सुनना था कि माँ की आँखों से ख़ुशी की अश्रुधारा बहने लगी मानों आज उसने अपनी आँखों के पीछे संजोये सारे सपने पूरे कर लिये हों !

आज दुबारा उसके पंख लग गये थे और वह पंख फड़फड़ा कर उड़ने को तैयार थी।


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