तुम्हारा नूर...
तुम्हारा नूर...
इतना Modern ज़माना है,
पर वो चुप-छुप कर सादगी निहारता है,
कोहिनूर-सी चमकती है बेशक ये दुनिया मगर,
चमकती इस दुनिया के अंधकार से वो मुझे बचाता है,
चकाचौंध वाली जिंदगी बिताते हैं लोग,
वो मेरी मासूम सी बातों को आम कहफियत बता कर
मेरी शैतानियों पर जान बारता है,
जान गया है शायद कि मेरी चार दिन की जिंदगी है
और एक उदासी आज भी है मेरे चेहरे पर,
मगर..
हाॅं मगर...
वो मेरी जिंदगी के चिराग की जगमगाहट को
बरकरार रखने में अपनी जिंदगी गुजारता है,
धूप की गर्माहट को पसंद नहीं करते अक्सर लोग,
वो तो हर मौसम में सर्दी वाली धूप-सा मुझे भाता है,
चॉंद-तारे चाहिए ही क्यों मुझे जब वो,
हाॅं-हाॅं वो...
मेरी हर ख्वाहिशों को अपनी सरॉंखों पर रख
मुझे अपना सरताज़ कहकर..
हाय!!
इन्ने प्यार से मुझे पुकारता है,
दिल की बातें,और वो खट्टे-मीठे एहसास
अक्सर उससे छुपा जाती हूॅं मैं,
शैतान है वो..
बिन कुछ कहे मेरे मन के कोरे कागज को
चुपचाप पढ़कर हवा के झोंके-सा गुजर जाता है,
सादगी बेशक मेरे चरित्र-अस्तित्व में झलकती है..
मगर जो सबको भाता है मेरा वो नूर उसी से आता है,
वो नूर उसी से आता है।

