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SHREYA BADGE

Children Stories Inspirational

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SHREYA BADGE

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सम्मान की इच्छा

सम्मान की इच्छा

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एक बार की बात है कि श्री कृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे ।

रास्ते में अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा कि प्रभु, एक जिज्ञासा है मेरे मन में, अगर आज्ञा हो तो पूछूँ ?


श्री कृष्ण ने कहा अर्जुन, तुम मुझसे बिना किसी हिचक, कुछ भी पूछ सकते हो ।


तब अर्जुन ने कहा कि मुझे आज तक यह बात समझ नहीं आई है कि दान तो मै भी बहुत करता हूँ परंतु सभी लोग कर्ण को ही सबसे बड़ा दानी क्यों कहते हैं ?


यह प्रश्न सुन श्री कृष्ण मुस्कुराये और पास में ही स्थित दो पहाड़ियों को उन्हीने सोने का बना दिया और बोले कि हे अर्जुन इन दोनों सोने की पहाड़ियों को तुम आस पास के गाँव वालों में बांट दो ।


अर्जुन प्रभु से आज्ञा ले कर तुरंत ही यह काम करने के लिए चल दिया ।

उसने सभी गाँव वालों को बुलाया और सोना बांटना शुरू कर दिया।


गाँव वालों ने अर्जुन की खूब जय जयकार करनी शुरू कर दी ।

अर्जुन, सोना पहाड़ी में से तोड़ते गए और गाँव वालों को देते गए ।

लगातार दो दिन और दो रातों तक अर्जुन सोना बांटते रहे।


गाँव के लोग वापस आ कर दोबारा से लाइन में लगने लगे थे । इतने समय पश्चात अर्जुन काफी थक चुके थे ।


जिन सोने की पहाड़ियों से अर्जुन सोना तोड़ रहे थे, उन दोनों पहाड़ियों के आकार में जरा भी कमी नहीं आई थी ।


उन्होंने श्री कृष्ण से कहा कि अब मुझसे यह काम और न हो सकेगा। मुझे थोड़ा विश्राम चाहिए।


प्रभु ने कहा कि ठीक है तुम अब विश्राम करो और उन्होंने कर्ण को बुला लिया और उससे कहा कि इन दोनों पहाड़ियों का सोना इन गांव वालों में बांट दो ।


कर्ण ने पहाड़ की तरफ देखा। गाँव वालों को बुलाया और उनसे कहा, यह सोना आप लोगों का है, जिसको जितना सोना चाहिए वह यहां से ले जाये । ऐसा कह कर कर्ण वहां से चले गए ।


यह देख कर अर्जुन ने कहा कि ऐसा करने का विचार मेरे मन में क्यों नहीं आया ?


इस पर श्री कृष्ण ने जवाब दिया कि,"तुम्हें सम्मान प्राप्त करने की इच्छा के कारण, तुम स्वयं पहाड़ी में से खोद कर उन्हें दे रहे थे। तुम में दाता होने का भाव आ गया था।


दूसरी तरफ कर्ण ने ऐसा नहीं किया। वह सारा सोना गाँव वालों को देकर वहां से चले गए ।

वह नहीं चाहते थे कि उनके मन में यह इच्छा नहीं थी कि कोई उनकी जय जयकार करे या प्रशंसा करे।


उनके पीठ पीछे लोग क्या कहते हैं उस से उनको कोई फर्क नहीं पड़ता।


सार :-

दान देने के बदले में धन्यवाद या बधाई की उम्मीद करना भी उपहार नहीं सौदा कहलाता है ।

यदि हम किसी को कुछ दान या सहयोग करना चाहते हैं तो हमें यह बिना किसी उम्मीद या आशा के साथ करना चाहिए।


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