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Saroj Verma

Romance


4.5  

Saroj Verma

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तृप्ति भाग (६)

तृप्ति भाग (६)

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गौरीशंकर के निवास स्थान पर___

वर्षो हो गए,गौरीशंकर की माता जी को स्वर्ग सिधारे हुए और आज सौभाग्यवती का स्वास्थ्य बिल्कुल भी ठीक नहीं है,उसकी श्वास ऊपर नीचे हो रही है,उसकी नाड़ी भी शिथिल पड़ती जा रही है,उसके सिराहने बैठे गौरीशंकर को सौभाग्यवती ने मद्धम स्वर मे पुकारा......

 स्वामी...।

हाँ,सुभागी । कहो क्या बात है ? गौरीशंकर ने पूछा।

आप मेरे समीप आकर बैठिए, सौभाग्यवती बोली।

और सौभाग्यवती के कहने पर गौरीशंकर उसके समीप आकर बैठ गया।

एक अन्तिम इच्छा है स्वामी,सौभाग्यवती बोली।

हाँ, कहो,गौरीशंकर ने कहा।

मुझे धरती पर लिटा दीजिए और आप खड़े हो जाइए,मैं आपके चरणों की रज अपने माथे से लगाना चाहती हूँ,मै जबसे लकवाग्रस्त हुई हूँ, मैंने आपके चरण स्पर्श नहीं किए,पिछले बीस वर्षों से आप मेरी निरंतर सेवा कर रहे हैं,आपने मेरे लिए अपने प्रेम को भी त्याग दिया,उन्नीस वर्ष हो चुके हैं कमलनयनी को आपके जीवन से गए हुए, परन्तु आपने कभी भी उसकी खोज करने की आवश्यकता नहीं समझी और ना ही उसे एक क्षण के लिए बिसराया,

आप धन्य हैं स्वामी । आपने अपने प्रेम के कारण कभी भी अपने कर्तव्यों से मुँख नहीं मोड़ा,मैं तो धन्य हो गई,आपको पाकर, ईश्वर से यही कामना करती हूँ कि हर जन्म में आप ही मुझे मिलें, मेरे जाने के पश्चात्, कृपया कमलनयनी को खोजकर उससे विवाह कर लीजिएगा,मेरी अन्तिम इच्छा पूर्ण करेंगें ना आप। ,सौभाग्यवती बोली।

 सौभाग्यवती की बात सुनकर गौरीशंकर की आँखें छलक पड़ी और सौभाग्यवती से कहा....

नहीं,सुभागी। ऐसा मत कहो।

मेरे पास समय नहीं है स्वामी। आप कृपया शीघ्रता करें, मुझे वचन दीजिए कि आप कमलनयनी को ब्याहकर मेरा स्थान देगें,सौभाग्यवती बोली।

मैं वचन तो नहीं दे सकता किन्तु ऐसा करने का प्रयास अवश्य करूँगा,सौभाग्यवती से इतना कहकर गौरीशंकर ने अपने इक्कीस वर्षीय पुत्र देवव्रत को संकेत किया कि वो अपनी माँ को धरती पर लिटाने के लिए उसकी सहायता करें।

 गौरीशंकर और देवव्रत ने जैसे ही सौभाग्यवती को धरती पर लिटाया,गौरीशंकर के चरणों को स्पर्श करते ही सौभाग्यवती का शरीर निर्जीव हो गया।

  और उधर एक दिन गाँव के मुखिया ने जोगन से आकर कहा.....

भक्तिन। यदि आपको कोई आपत्ति ना हो तो किसी जाने माने पुरोहित के पुत्र हैं,वो बड़े पुरोहित बनने से पूर्व इस मन्दिर में आकर, मन्दिर का कार्यभार सम्भालकर पूजा-पाठ सीखना चाहते हैं,यदि आपका आदेश हो तो क्या वें यहाँ आ सकते हैं? क्योंकि आप यहाँ वर्षों से रहकर भजन कीर्तन कर रहीं हैं,इससे आपकी भक्ति में कोई बाँधा तो उत्पन्न नहीं होगी।

  ये आप कैसीं बातें कर रहे हैं मुखिया जी। इस गाँव के लोगों ने और उस समय जो गाँव के मुखिया जी थे, बड़ा उपकार किया था मुझ पर इस मन्दिर में शरण देकर,उस समय मेरे पास रहने का कोई साधन नहीं था,मैं श्याम और मयूरी के गृहस्थ जीवन में सम्मिलित नहीं होना चाहती थी, तब उनका नया नया विवाह हुआ था,मुझे भी सांसारिक जीवन से अरूचि एवं नीरसता हो गई थी,ऐसे में इन गाँववालों ने मुझे इस मन्दिर में शरण दी थी, मैं आपलोगों की उदारता भला कैसे भूल सकती हूँ?मुझे कोई आपत्ति नहीं है आप उन्हें मन्दिर में रख सकते हैं,मेरी जैसी नेत्रहीन के लिए एक आसरा हो जाएगा,जोगन बोली।

उधर कादम्बरी के घर पर.....

माँ। आज मैं भोजन पकाऊँगी, कादम्बरी बोली।

परन्तु क्यों ? मयूरी ने पूछा।

आज बड़ी माँ से मिलने का मन कर रहा है,आज अपने हाथों से भोजन पकाकर उनके लिए ले जाऊँगी,कादम्बरी बोली।

तू अकेले कैसे जाएंगी,मार्ग में वन्यजीवों का भय है,तेरी बड़ी माँ पुनः मुझे डाँटेगीं कि कादम्बरी को अकेले भेज दिया,मयूरी बोली।

मैनें बाबा से पूछ लिया है,कादम्बरी बोली।

ठहर मैं अभी तेरे बाबा से पूछतीं हूँ और इतना कहकर मयूरी ने श्याम को पुकारा......

सुनते हो जी। क्या तुमने कादम्बरी को मन्दिर जाने की अनुमति दी है ?

तभी श्याम बाहर आकर बोला___

हाँ। मैने उसे अनुमति दे दी है।

देखो जी। अब बेटी सयानी हो गई,उसकी सारी इच्छाओं को पूरी करने का प्रयास मत किया करो,कल को उसका ब्याह होगा तो ससुराल में क्या करेगी? लोंग तो ये कहेगें ना । कि माँ ने कुछ नहीं सिखाया,मयूरी बोली।

चिंता मत करो,मयूरी। हमारी बेटी सब कुछ सीख जाएगी और जाने दो उसे अपनी बड़ी माँ से मिलने,हमारी बेटी बहुत बहादुर है,किसी से नहीं डरती,श्याम बोला।

ठीक है जब तुमने अनुमति दे ही दी है तो भला मैं क्या कर सकती हूँ? मयूरी बोली।

  दोपहर का समय, सूर्य का कड़ा ताप,आस पास घनी झाड़ियाँ और घने घने वृक्ष___

एक नवयुवक घोड़े पर सवार, किसी वृद्ध व्यक्ति से मन्दिर जाने का रास्ता पूछ रहा है।

 वृद्ध व्यक्ति ने कहा___

बेटा। सीधे इसी मार्ग पर चलते चले जाओं,एक पहाड़ी दिखेगी,बस उसी पर मन्दिर स्थित है,उसके बगल में एक कुटिया है,उसमें एक जोगन रहती है,उसके मधुर भजन तुम्हें दूर से ही सुनाई पड़ जाएंगें।

  नवयुवक ने वृद्ध व्यक्ति को धन्यवाद दिया और आगें बढ़ गया वृद्ध की बताई हुई दिशा की ओर किन्तु बहुत समय चलने के उपरांत भी उस नवयुवक को पहाड़ी नहीं दिखी,उसे बहुत जोर की प्यास भी लग रही थी,तभी मार्ग में उसे एक नवयुवती जाती हुई दिखी जिसके हाथ में बहुत सी वस्तुएँ थी।

  उस नवयुवक ने उस नवयुवती से पूछा___

ऐ लड़की। क्या पहाड़ी वाले मन्दिर का यही मार्ग है ?

उस लड़की ने अपनी बडी़ बड़ी आँखों से क्रोधित होकर उस नवयुवक की ओर देखा और बोली___

  किसी लड़की से ऐसे बात करते हैं, क्या यही तुम्हारा शिष्टाचार है? नहीं बताऊँगीं, ज्ञात भी होगा तब भी नहीं बताऊँगी,वो लड़की कोई और नहीं कादम्बरी थी जो अपनी बड़ी माँ से मिलने जा रही थी।

उस नवयुवक ने कादम्बरी का ऐसा उत्तर सुना तो हँस पडा़ और पुनः कादम्बरी से निवेदन करते हुए बोला____

 अच्छा। देवी जी। कृपया करके बताएंगी कि पहाड़ी वाले मन्दिर का मार्ग कौन सा है?

हाँ। अब ठीक है,अब तुम शिष्टतापूर्वक बात कर रहे हो,तुम ठीक मार्ग पर जा रहे हो, मैं भी वहीं तक जा रही हूँ,मेरे पीछे पीछे चले आओ,कादम्बरी बोली।

अगर आपको कष्ट ना हो तो आप अपने हाथों की वस्तुएं मुझे दे सकतीं हैं,मैं घोड़े पर रख लेता हूँ,उस नवयुवक न कहा।

ठीक है, यदि तुम्हें आपत्ति नहीं है तो ये लो,रख लो अपने घोड़े पर,कादम्बरी बोली।

 यदि तुम्हें कोई आपत्ति ना हो तो तुम्हें भी मैं घोड़े पर बिठा सकता हूँ,उस नवयुवक ने हँसते हुए कहा।

ऐ,सुनो। अत्यधिक परोपकार करने की कोई आवश्यकता नहीं है, लाओं मेरी वस्तुएं मुझे दे दो,मैं चली जाऊँगी, कादम्बरी बोली।

अरे,मैं तो परिहास कर रहा था,तुम तो बुरा मान गईं,नवयुवक बोला।

मुझे ऐसा परिहास अच्छा नहीं लगता, कादम्बरी बोली।

वैसे तुम बहुत सुन्दर हो और साथ में नकचढ़ी भी,नवयुवक बोला।

कादम्बरी लजाते हुए इधर-उधर देखने लगी।

अच्छा,ये बताओ तुम इतनी सामग्री इतनी दोपहर में मन्दिर लेकर क्यों जा रही हो?नवयुवक ने पूछा।

वहाँ मेरीं बड़ी माँ रहतीं हैं,वो वहाँ भजन गातीं हैं,कादम्बरी बोली।

तो क्या तुम्हारी बड़ी माँ,तुम्हारे घर में नहीं रहतीं ? नवयुवक ने पूछा।

वो मेरी माँ की सखीं है,हमलोगों के सिवाय उनका और कोई नहीं है और वो नेत्रहीन भी हैं,वो सांसारिक जीवन से ऊब चुकीं हैं इसलिए मन्दिर में रहती हैं,कादम्बरी बोली।

और बातों ही बातों में मन्दिर आ गया, कादम्बरी बोली वो रहा मन्दिर।

 दोनों मन्दिर पहुँचे, कादम्बरी की बड़ी माँ वहीं बैंठीं थीं,गाँव के मुखिया जी के साथ और मुखिया जी नये पंडित की प्रतीक्षा कर रहे थे,,

 उस नवयुवक ने अपना परिचय मुखिया जी को दिया___

मेरा नाम देवव्रत है,मुझे इस मन्दिर में नए पंडित जी के लिए नियुक्त किया गया है।

जी । आपकी ही प्रतीक्षा हो रही थी,मैं इस गाँव का मुखिया और ये हमारे मन्दिर की भक्तिन हैं,वर्षों से यहाँ रहती हैं और भजन गातीं हैं,मुखिया जी बोले।

देवव्रत ने कमल के चरण स्पर्श किए तो कमल ने रोकते हुए कहा___

अरे। ये क्या कर रहे हैं आप ? आप तो देवी देवताओं के चरण स्पर्श कीजिए,उनके चरण स्पर्श करने से आपका भला होगा,मेरे चरण स्पर्श करने से भला आपको क्या मिलेगा?

आप मेरी माँ समान हैं और हर पुत्र का कर्तव्य होता है अपनी माँ के चरण स्पर्श करना,देवव्रत बोला।

बहुत भाग्यशालीं हैं वो माता पिता जिनकी तुम सन्तान हो,कमल बोली।

देवव्रत की प्रशंसा सुनकर कादम्बरी को अच्छा नहीं लगा और वो भी बोल पड़ी।

बड़ी माँ। मैं भी यहाँ हूँ।

तू कब आई? कादम्बरी बिटिया। कमल ने पूछा।

इन्हीं के संग आई हूँ,आपके लिए भोजन ला रही थी तो ये मार्ग में मिल गए,कादम्बरी बोली।

अच्छा। तो कुछ जलपान देवव्रत को भी कराओ,कमल बोली।

ठीक है बड़ी माँ। कादम्बरी बोली।

तभी मुखिया जी बोले__

अच्छा पंडित जी। चलता हूँ। अब आपसे परिचय हो चुका है,मैं आपके आने की सूचना गाँव वालों को भी दे दूँ और आपकी आवश्यकता की वस्तुएं साँझ के समय गाँववालें आपके लिए ला देंगें और इतना कहकर मुखिया जी चले गए।

और कादम्बरी ने देवव्रत से कहा कि पहले कुएँ पर चलकर हाथ मुँह धो लो, मैं भी हाथ मुँह धोकर भोजन लगाती हूँ।

और सबने मिलकर भोजन किया।

क्रमशः___


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