थैंक यू टीचर!
थैंक यू टीचर!
रीमा एक प्राइवेट अंग्रेजी स्कूल में हिन्दी शिक्षिका थी.इस वजह से उसके पति राजेश उसे हर रोज ताने सुनाते। क्योंकि वो खुद एक मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर थे। राजेश और रीमा की अरेंज मैरिज शादी थी। रीमा से राजेश को अपने मातापिता और परिवार के दबाव में शादी करनी पड़ी। क्योंकि रीमा परिवार वालों को बहुत पसंद थी।
राजेश हर रोज बातों ही बातों में उसको ताने देते" सच सच बताओ यार, आज के जमाने में तुमको पूछता कौन है?"
सभ्य समाज में कोई नहीं। तुम को तो तुम्हारे स्कूल के बच्चें भी सीरियसली नही लेते।
"अरे!तुम्हारे पापा ने तुम्हे इंग्लिश मीडिया स्कूल में पढ़ाया होता.तो तुम अंग्रेजी और मेरी बातों की अहमियत को समझ पाती।"
"खैर"!
" जाने दो।"
" लेकिन प्लीज़! मेरे बच्चों को मत बिगाड़ो, उनसे हिंदी में बात कर के ।"
रीमा के दोनों बच्चें अदिति और आदित्य अपनी माँ के लिए रोज ही ऐसे शब्द सुनते।रीमा ने बहुत बार राजेश को समझाने की कोशिश की कम से कम बच्चों के सामने तो ऐसी बातें ना बोले ।जिससे उन पर कोई बुरा असर पड़े।लेकिन राजेश कुछ समझने के लिए तैयार नही था।इनसब टोका टाकी और तानों के बीच समय अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रहा था। बच्चें भी धीरे धीरे बड़े हो रहे थे। लेकिन कुछ नही बदला था ।
तो वो था राजेश का रीमा के प्रति व्यवहार।एक दिन खाने की टेबल पर राजेश ने अपनी15 वर्षीय बेटी से कहा"बेटा!अब तुम अपनी माँ को भी अंग्रेजी बोलना सीखा दो। वरना! ये कब अपनी घर की भाषा से तुम लोगों की समाज मे बेइज्जती करा दे ।कुछ कह नही सकते।"
तभी पास बैठे उसके 12वर्षीय बेटे आदित्य ने कहा " क्यों पापा?हिंदी बोलने से बेइज्जती क्यों होगी?वो तो हमारी राजभाषा है।"
"चुप माँ के चमचे!"
राजेश ने उसे जोर से डाँटते हुए कहा ,"राजभाषा है। पता चलता| जब किसी सरकारी स्कूल में तुमको पढाता तो। मैं तुम्हारी इतनी महंगी फीस हिंदी बोलने के लिए नही देता. समझे ।"
राजेश ने इतनी जोर से डांटते हुए ये बात कही की आदित्य डर से चुप हो गया।
अदिति बिलकुल अपने पापा के नक्से कदम पे थी पढ़ने में तेज तर्रार और फर्राटेदार अंग्रेजी,फ्रेंच दोनो भाषाओं का ज्ञान था दसवीं की परीक्षा में उसने पूरे जिले में टॉप किया। और मीडिया के सामने भी सारा श्रेय अपने पापा को दिया।
आदित्य शुरुआत से ही एक औसत छात्र था उसके अंक हमेशा सामान्य रहते |जिसका दोष रीमा के सिर पर जाता। कि तुमको देखकर बिगड़ रहा है।रीमा को इस तरह से अपमानित होता देखना आदित्य को बिलकुल भी पसंद नहीं था।
एक दिन आदित्य ने रीमा से पूछा"माँ!पापा आपके हिंदी बोलने से इतना चिढ़ते क्यों है? वो क्यों बार बार आपको हिंदी की टीचर होने पर इंंसल्ट करते है।"
रीमा कुछ बोलती उससे पहले ही राजेश ने कहा"बेटा यहाँ आओ मैं बताता हूँ ये हिंदी की गुरु माता तुम्हे नही बता और समझा पाएंगी।"
"क्योंकि बेटा आज के जमाने मे अच्छे घर का कोई भी बच्चा ना तो कोई हिंदी मीडियम से पढ़ता है.ना ही इसे बोलता है।"
"बेटा !मैं तुम पर इस लिये गुस्सा होता हूं.क्योंकि तुम्हारे हिंदी में नम्बर अधिक आते है.और बाकी में कम तो तुमको आगे चलकर नौकरी नही मिलेगी। इसलिये अपनी मम्मी के हिंदी साहित्य की किताबें पढ़ना बंद कर दो। उनके स्कूल में तो उनको पैरेंट और साथी टीचर तो छोड़ो बच्चा भी उनके सब्जेक्ट में इंटरेस्ट से नहीं पड़ता। हिंदी टीचर तो सिर्फ फॉर्ममलिटी के लिए अब स्कूलों में रखें जाते है। वो भी सबसे कम पेमेंट पर।जैसे तुम्हारी माँ है।"
" समझे!"
अच्छा अब मैं चलता हूँ मुझे देर हो रही है लेकिन अगर कुछ सीखना ही है तो अपनी बहन को और मुझे देखकर सीखो । मां को देखना और सुनना बंद करो।यदि अपना भविष्य सुधारना चाहते हो तो। आगे तुम्हारी मर्जी फिर ये मत कहना कि किसी ने तुम्हें समझाया नही ।
राजेश के जाने के बाद रीमा ने उदास आदित्य को अपने पास बिठा के प्यार से समझाया ।
बेटा! "तुम क्यों निराश होते हो पापा की बातों से? कोई भाषा छोटी बड़ी नही होती। और हिंदी तो बिलकुल भी नही। कोई भी भाषा हमारी भावनाओं को व्यक्त करने का सिर्फ माध्यम मात्र है।और हर बार हर बात बोल के नही बताया जा सकता। कई बार हमे वो करके दिखाना पड़ता है। जैसे साइंस में प्रैक्टिकल जरूरी है। वैसे ही व्यवहारिक जीवन मे भी प्रैक्टिकल कर के दिखाना होता है।
"तो फिर ठीक है माँ!"
आपसे आज मैं वादा करता हूं कि मैं अपनी राजभाषा से ही अपनी सफलता का मुकाम हासिल करूँगा।समय बीतता गया अदिति मैनेजर हो गयी। आदित्य कॉलेज में चला गया। उसके लिखे हिंदी लेख और कविताएं भी विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में छपने लगे।साथ ही आदित्य प्रशासनिक परीक्षा की तैयारी भी करने लगा। और उसका माध्यम उसने हिंदी ही चुना। जिस बात से राजेश बहुत नाराज हुए। उनका मानना था कि इस परीक्षा में अंग्रेजी मीडिया को पहले वरीयता दी जाती है। लेकिन आदित्य ने साफ मना कर दिया अंग्रेजी माध्यम के लिए।
प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा में पास होने के बाद अब बारी साक्षात्कार की थी।साक्षात्कार लेने वाले पैनल ने बहुत सारे सवालों के बाद आदित्य से आखिरी सवाल पूछा" आप एक अंग्रेजी माध्यम स्कूल से पढ़े लिखे छात्र है|आपकी प्रारंभिक शिक्षा अंग्रेजी माध्यम से हुई है। तो आपने हिंदी भाषा का चुनाव क्यों किया? आज जहाँ लोग अंग्रेजी बोलने को अपनी प्रतिष्ठा समझते है|आप हिंदी को वरीयता दे रहे है इसकी वजह "
आदित्य ने उत्तर दिया"महोदय!मेरी माँ एक हिंदी अध्यपिका है। तो मुझे बचपन से ही हिंदी से लगाव रहा। साहित्यिक हिंदी की मेरी गुरु मेरी मां ही है। हिंदी हमारी राजभाषा के साथ साथ मेरी मातृभाषा होने के कारण भी मुझे जो सहज लगाव हिन्दी से हुआ वो अंग्रेजी से कभी नही हो पाया।
पैनल ने अगला सवाल किया "तो क्या हिंदी बोलने के कारण आप को कभी शर्मिदगी महसूस नही हुई।"
आदित्य ने उत्तर दिया"महोदय!मुझे तो इसमें शर्मिदगी जैसी कोई बात नही लगती। अंग्रेजी एक भाषा है। और कभी भी सीखी जा सकती है। अमरीका में भी सभी अंग्रेजी बोलते हैं। क्योंकि वो उनकी मातृभाषा हैं। वैसे ही हिंदी हमारी राजभाषा है। जिसे मुझे बोलने ,लिखने और जिसमें रूचि रखने में मुझे तो गर्व महसूस होता है।"
एकदिन राजेश और अदिति सुबह खुशी से झूमते हुए आदित्य के कमरे में आये।आदित्य ने कहा"क्या हुआ दीदी?"
"आई एम सो प्राउड ऑफ यू माई सन " राजेश ने आज पहली बार आदित्य के लिए ये शब्द इस्तेमाल किये थे। ये देखो आज का न्यूज पेपर।
आदित्य ने देखा"तो उसमें लिखा था हिंदी माध्यम वाले प्रतियोगी छात्र ने प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में सबसे अधिक अंक प्राप्त करके प्रथम स्थान प्राप्त किया है जो छात्र कोई और नही आदित्य था।"
आदित्य ने दौड़ कर अपनी मां को गले लगा लिया। और कहा "माँ ! हमारा प्रैक्टिकल सफल हुआ।"
थोड़ी देर में फोन की घण्टी बजी राजेश ने फोन उठाया तो पता चला कि अखबार और समाचार चैनल वाले आदित्य का इंटरव्यू लेने आ रहे है। बधाई देने वालों का तांता लग गया। सभी तैयार हो गए। तभी राजेश ने कहा"रीमा!तुम अंदर ही रहना। मीडिया के सामने सिर्फ हम तीनों ही जायेंगे।" समझी।
आदित्य ने ये बात सुन ली। उसे वो बीते हुए दिन याद आ गए जब उसके पिता ने उसकी बहन के टॉप करने पर उसकी मां को कमरे से बाहर नहीं निकलने दिया था।
मीडियाकर्मी घर पर आए।
उन्होंने पुछा" मिस्टर राजेश आदित्य कहाँ है?"
"जी आप लोग बैठिए । मैं बुलाता हुँ।"
तभी राजेश को आदित्य अपनी मां का हाथ पकड़े हुए हॉल में आता दिखा। जहाँ मीडिया कर्मी पहले से मौजूद थे। रीमा को देख के राजेश का मुँह बनने लगा।तभी पत्रकारो ने कहा-"आदित्य जी बहुत बहुत बधाई ! आपको "
"जी धन्यवाद" आदित्य ने कहा
"आदित्य !आप अपनी सफलता का श्रेय किसे देना चाहेंगे?"
"जी सबसे पहले तो अपनी "माँ " को और उसके बाद मेरे पूरे परिवार के साथ साथ सभी शिक्षकों और मित्रों को।"
बहुत सारे सवालों के बाद पत्रकारों ने कहा- आखिरी सवाल सर"आपकी शिक्षा अंग्रेजी माध्यम से हुई हैं.और आप ने परीक्षा के लिये हिंदी माध्यम चुना क्यों और किससे प्रेरणा मिली और हिंदी के बारे में क्या कहना चाहेंगे।"
"जी मेरी प्रेरणा और हिंदी भाषा की गुरु दोनो मेरी मां ही है। हिंदी भाषा के बारे मे.... मै सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगा ,कि भारतीय होने के नाते हमें अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व करना सीखना चाहिए। उसका आदर करना चाहिए। ना कि उसे अपनी शर्मिंदगी समझनी चाहिए। और ना ही इसे अपनाने और जानने वाले को शर्मिंदा करना चाहिए। हिंदी भाषा बोलने वाले व्यक्ति का अपमान करना या बोलने में शर्म करना वैसे ही है जैसे हम अपनी जड़ों को काट दे। जरूरी नही की सफलता सिर्फ अंग्रेजी जानकारों को मिलती है या सफलता का परियाय अंग्रेजी ही है। सफलता सिर्फ आपकी मेहनत ,लगन और काबिलियत से मिलती है।"
रीमा जी बहुत बहुत बधाई आपको आप सचमुच एक आदर्श माँ है.और शिक्षिका है। आपने अपने बेटे को ना सिर्फ संस्कार दिए बल्कि साथ मे अपनी संस्कृति और भाषा का भी मान रखना सिखाया।
रीमा की आंखों में आज खुशी के आंसू थे जो छुपाने से भी नही छुप रहे थे।अगले दिन सुबह हाथ मे चाय का कप लिए राजेश ने अखबार में रीमा और आदित्य की तस्वीर छपी देखी ।
तभी पीछे से आदित्य ने कहा "माँ मेरे साथ तुम्हारा भी इंटरव्यू है। तैयार हो जाना। अब आपको कमरे में बंद होने की जरूरत नही। आज आपको पूरी दुनिया पूछ रही है। आज मेरी हिंदी टीचर को पूरी दुनिया सुनेगी भी और पूछेगी वो भी आपकी अपनी भाषा मे तालियों के साथ। "
हमे अपनी राजभाषा,संस्कृति और सभ्यता का सम्मान करना चाहिए। और गर्व के साथ इसे अपनाना चाहिए। कभी भी भाषा को लेकर किसी का भी अपमान नही करना चाहिए। खास कर के हिंदी विषय के शिक्षकों का। हिंदी विषय के शिक्षक का भी आपके जीवन मे वही स्थान होना चाहिए। जो अन्य विषयों के शिक्षकों को आप देते है।
