Kishan Dutt Sharma

Inspirational Others


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स्वभाव और कार्य

स्वभाव और कार्य

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"अपने स्वभाव और क्षमता के अनुसार कार्य करें"

कहते हैं कि "यदि मुस्कान आपके स्वभाव में नहीं है तो आपको दुकानदारी के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए।"


लोकोक्ति (प्रोवर्ब) का अर्थ होता है कि ऐसा संज्ञान जिसके लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती है। ऐसा संज्ञान जो अनुभव से प्राप्त हुआ है और जो कि स्वत: प्रमाणित होता है। ऐसा संज्ञान जिसे प्रेक्टिकल व्यवहार की कसौटी पर खरा पाया गया है, जिसके बारे में कोई तर्क नहीं दिया जा सकता। उपरोक्त लोकोक्ति का भावार्थ है कि यदि कर्मक्षेत्र में सृजनात्मकता और उन्नति चाहते हैं तो आपका कर्म आपके स्वभाव के अनुसार ही होना चाहिए। हमारा स्वयं का स्वभाव कैसा है कौन सा है यह कैसे जानें? प्रत्येक व्यक्ति अपने प्रधान (मुख्य) स्वभाव को कई आयामों से समझ सकता है। आपके व्यक्तित्व में जो गुण आपके अन्दर प्राकृतिक रूप (जन्म से ही) से ही प्रधान रूप से है वह ही आपका निज स्वभाव समझिए। आपके व्यक्तित्व में वह गुण मुख्य रूप से है और जिसे आपने कर्म और अभ्यास के द्वारा अर्जित किया हुआ है, वह ही आपके व्यक्तिव का स्वभाव है। आपके व्यक्तित्व का वह गुण जो आपको प्रत्यक्ष रूप से तो कुछ विशेष नहीं दिखता लेकिन आपको स्वयं ही स्वयं पर उस गुण व कला के होने का आत्म विश्वास पैदा होता है तो यह जानिए कि वह आपके व्यक्तित्व का स्वभाव है जिसे आप कम समय और कम प्रयास से प्रत्यक्ष रूप में अनुभव कर सकते हैं। ऐसा समझिए कि आपका ऐसा स्वभाव आपके प्रारब्ध का हिस्सा होता है जिसको कम मेहनत से ही पूरा प्रत्यक्ष रूप से अनुभव किया जा सकता है।  


  अपने कार्य व्यवसाय को अपने गुण स्वभाव के अनुसार ही चुनना चाहिए। स्वभाव के अनुसार कार्य करने से निरन्तर प्रगति का अनुभव होता है। स्वभाव के अनुसार कार्य करने से कार्य में सहजता बनी रहती है। आप कम ऊर्जा और कम समय में ज्यादा कार्य कर पाते हैं। अपने स्वभाव के अनुसार जो भी कार्य आप करते हैं उस कार्य में आपकी एकाग्रता बढ़ती है। उस कार्य को करने में आप कुशल हो जाते हैं। एकाग्रता के साथ किया हुए कार्य की गुणवत्ता (यथार्थता) बढ़ती है। स्वभाव के अनुसार कार्य करने से आप उसे पूरी लगन के साथ कर पाते हैं। कर्म और कर्म के प्रभाव से मुक्त होने के लिए यह जरूरी होता है कि उस कर्म को पूरी एकाग्रता के साथ उसकी पूर्णता (totality) में होने दें।


  पूरी एकाग्रता से कार्य करने से ऊर्जा खर्च कम होती है और विधायक रूप से ऊर्जा का रूपांतरण होने लगता है। आप कार्य करते हुए भी अथकपन का अनुभव करते हैं। जिस कार्य को पूरी ऊर्जा (लगन) के साथ पूरा किया जाता है तो परिणाम यह होता है कि आप उस कार्य से मुक्त होते जाते हैं अर्थात आप कार्य की गुणवत्ता के नए नए सोपान चढ़ने लगते हैं। आपको कर्म करने के सुख व आत्म संतोष का अहसास बना रहता है। स्वाभाविक है कि आपके कार्यों से दूसरे लोग अच्छा महसूस करेंगे। ऐसा कर्म ही स्वतंत्र कर्म होता है। स्वतंत्र कर्म आपको स्वतंत्र होने का अहसास कराता है। स्वतंत्र कर्म में आपकी ऊर्जा की आभा पूर्ण रूप से प्रकट हो पाती है। कार्य (कर्म) यदि पूरी उत्कंठा और उन्मुक्त भाव से नहीं किया जाता है तो उस कार्य के साथ में मन की आसक्ति जुड़ जाती है। वह कर्म मुक्ताता का अहसास कराने की बजाय बंधता का अहसास कराता है। 


  इसके विपरित स्थिति भी है। बहुत से लोगों को बहुत समय तक यह ही पता नहीं चलता कि मेरे निज व्यक्तित्व का स्वभाव कैसा क्या है? मुख्य रूप से मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए? इसलिए ऐसे लोग प्राय: अपने स्वभाव के विपरीत आपका कार्य (क्षेत्र) चुन लेते हैं। कार्यों में विफलता होती है। स्वयं भी अपने कर्म के सुख आत्म संतोष का अनुभव नहीं कर पाते हैं। यदि गुण और स्वभाव के विपरीत कार्य चुनते हैं तो उसमें विफलता ही मिलेगी। उस कार्य को आप रूचिपुर्वक नहीं कर पाएंगे। उस कार्य को करने में आप अपनी पूरी ऊर्जा को नहीं लगा पाएंगे। स्वभाव के विपरीत कार्य करने से संतुष्ट होने और करने की बात तो कोसों दूर रह जाती है। स्वभाव से विपरीत कार्य का चुनाव करने से ऊर्जा कुंठित होती है। फिर ऊर्जा नए नए द्वार खोजती है।


  कई बार कईयों के जीवन में ऐसा भी होता है कि उनकी ऊर्जा सृजनात्मक की बजाय विध्वंशात्मक रूप ले लेती है। किसी को भी उसके गुण स्वभाव के अनुसार कार्य करने में व्यवधान नहीं डालें। यदि आप किसी के स्वाभाविक कार्यों के चुनाव में व्यवधान डालते हैं तो यह निश्चित जानिए कि आप बहुत बड़ी गलती करते हैं। गीता के गोड (परमात्मा शिव) ने तो स्वभाव के अनुसार कर्म करने की बात को सर्वाधिक महत्वपूर्ण बताया है। उन्होंने इसके बराबर और इसके इलावा दूसरी किसी चीज पर इतना ज्यादा जोर नहीं दिया। पूरा का पूरा गीता का उपदेश दिया ही इसलिए गया था कि यह रहा पूरे के पूरे ज्ञान का दर्पण। पूरा दर्पण आपके सामने प्रस्तुत है। अब इस ज्ञान के दर्पण में आप अपना गुण स्वभाव (रियल फेस/रियल नेचर/डमिनेंट क्वालिटी) देख लीजिए और अपना स्वभाव पहचानिए। अपना स्वभाव पहचान कर निश्चय बुद्धि बन ध्यान पूर्वक कार्य क्षेत्र में उतर जाइए।


  कार्यक्षेत्र में भिन्न भिन्न प्रकार के लोगों के साथ भिन्न भिन्न प्रकार के अनुभव होते हैं। कई लोग तो ऐसे होते हैं जो ऐसे ऐसे कार्यों को भी अपने हाथ में ले लेते हैं जिनके साथ उनका स्वभाव कोसों दूर तक भी नहीं मिलता। वे कर्म की आसक्ति वश और अनेक कामनाओं वश इसे भी कर देना चाहते हैं और उसे भी कर देना चाहते हैं। उनके कार्य का पेंडुलम बिना किसी स्वभाव की अनुकूलता के, बिना कार्य के बारे में शिक्षण - प्रशिक्षण और अनिवार्यता के इधर से उधर, यह से वह के दोनों छोरों पर निरन्तर डोलता रहता है। ऐसा कभी नहीं लगता कि वे कार्यक्षेत्र में एकाग्र हैं। ऐसा भी कभी नहीं लगता कि ऐसे लोग कार्य को कुशलता से कर पा रहे हैं। इसका मूल कारण एक ही होता है। वह है कि लोग अपने स्वभाव के विपरीत कार्य का चुनाव कर लेते हैं और अपनी क्षमता से ज्यादा कार्य करने का हौसला रखते हैं जबकि वैसा प्रेक्टिकल हो नहीं पाता। होना यह चाहिए कि हम अपने स्वभाव को और अपनी क्षमताओं को ठीक ठीक यथार्थ रूप से समझें। जैसा गुण स्वभाव हो वैसा ही कार्य करें। जैसी जितनी मानसिक, शारीरिक, बौद्घिक और अन्य प्रकार की क्षमता हो उतना ही वैसा ही कार्य करें। ऐसे मनुष्य जो कोई कार्य करना तो चाहते हैं पर वैसी उनकी क्षमता और स्वभाव नहीं होता है। इसलिए नहीं कर पाते हैं और उनके मन में कुंठा पैदा होती है। इसलिए ऐसे व्यक्तियों को भी यह अपना आत्मावलोकन कर लेना चाहिए कि जो हम जो कार्य करना चाहते हैं क्या वैसी ही क्षमता हममें है भी या नहीं है। या हम यह प्रतीक्षा करते हैं कि कोई हमें करने को कहे और हम यह वह कार्य करें। यदि कार्य करने की क्षमता ही नहीं है तो कहने पर भी वह कैसे हो सकती है। यदि क्षमता होती है तो कार्य जरा सी उत्कंठा के साथ पूरा हो जाता है।


हम अपने स्वभाव को जानें और उस अनुरूप अपना कार्य करने के कृत्य संकल्प हो जाएं। इतना अवश्य ध्यान रहे कि अकर्ता का (निमित्त) भाव बना रहे। बाकी दुनिया क्या कहती है, लोग क्या अपेक्षा रखते हैं, लोग अनुमान लगाते हैं, उसके चक्कर में ना पड़ें। यह दुनिया है कुछ ना कुछ तो कहेगी ही। जब आप अपने स्वभाव के अनुसार कार्य करते हैं और जब आप अपने स्वभाव के अनुसार कार्य नहीं करते, दुनिया दोनों स्थितियों में कुछ ना कुछ तो कहती ही है। लोक कल्याण अर्थ भी वे ही कार्य होते हैं जो आपकी स्वयं की प्रकृति के अनुकूल किए गए हों। 


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