स्वार्थी पत्नी भाग
स्वार्थी पत्नी भाग
"एक बार कह दिया सो कह दिया कान खोलकर सुन लो मेरी बात वो मेरे घर किसी कीमत पर नही आयेगी,अगर मरती है तो मर जाए, मुझे कोई फर्क नही पड़ने वाला, बोल देना अपनी बेशर्म बेहया बेटी से ये बात।"
"इस घर से उसका कोई नाता नही,वो हमसे कोई उम्मीद ना रखे हम उसकी कोई मदद नही करने वाले"
"राजेंद्र प्रताप सिंह नाम है मेरा"
मुछो पर ताव फेरते सरलाजी के पति ने जब ये बात कही तो सरलाजी बिफर पड़ी घुटनो के बल जमीन पर बैठ गयी।
पति के कहे तीखे वाक्य उनके दिल को छलनी कर गए।वो सोचने लगी कि अगर ये घर उनके पति का है इस पर उनका कोई अधिकार नहीं तो आखिर वो किस हक से इस घर मे रह रही है। आखिर क्या जगह है उनकी इस घर और राजेंद्र जी के जीवन मे।क्या उनका कोई अस्तित्व नही,कोई अधिकार नही फिर क्यों रह रही है वो यहाँ,किस लिए और किसके लिए।
क्या वो सिर्फ मेरी बेटी है, क्या उसे अकेले मैंने जन्म दिया है तो क्या वो राजेंद्र जी के लिए सिर्फ उनकी शारिरिक भूख मिटाने का जरिया मात्र थी आजतक, उनके बीच कभी प्रेम नहीं,सिर्फ और सिर्फ वासना के क्षण थे? और ना जाने कितनी ही बातें सोचकर आज उनका दिल सिहर उठा । वो अपना आँचल का टुकड़ा मुँह में ठुस कर सिसक सिसक कर रोने लगी।
वो आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही थी रोते रोते वो सोच रही थी कि वो आज तक झूठे भ्रम में थी कि ये घर परिवार पति बच्चे सब उनके है और सब पर उनका अधिकार है।
राजेंद्र जी शराब के नशे में तो पहले भी बहुत कुछ अपशब्द कहते और गालियां दे देते थे ।
लेकिन होश में आते उनको गले लगाकर कहते," अरे यार, नशे में मैं कुछ भी बोल गया ।तुम दिल पर मत लगाना।"
लेकिन आज तो उन्होंने सारी बाते अपने पूरे होशो हवास में बोली थी।बेटी ने अपनी पसन्द के लड़के से लव मैरिज शादी की तो उसमें वो दोषी कैसे हो गयी?
वो मन ही मन विचार करने लगी,यदि मैने बेटी को संस्कार नही दिये जैसा कि राजेन्द्र जी का कहना था। तो बेटे की सफलता का श्रेय किसे जाता है उसे आखिर किसने संस्कार दिए?
दअरसल उन्होंने अपनी बेटी रचना को बहुत समझाया की वो उस लड़के को भूल जाये उसका साथ छोड़ दे अभी ये उसके प्यार की नहीं पढ़ाई पूरी करने की उम्र है।
"अनुज ठीक लड़का नही है।"
"अपनी पढाई पर ध्यान दो।"
उस समय रचना बीए फाइनल ईयर में थी। लेकिन फाइनल ईयर की परीक्षा देते रचना एक दिन चुपचाप घर से भाग गई उस लड़के के साथ।
इस घटना के बाद तो सरलाजी की जिंदगी जैसे पहले से भी ज्यादा नर्क बन गयी। राजेंद्र जी से उनके रिश्ते में बहुत फासला बढ़ा गया जैसे मानो रचना ने नही सरलाजी ने ही कसूर किया हो।
लेकिन आज अचानक एक साल बाद उनके पास रचना का फोन आया, वो रो रही थी रोते रोते उसने कहा
"माँ ये लोग अच्छे नहीं हैं ।"
"अनुज उसकी माँ और यहाँ तक कि उसके पापा भी मुझे रोज मारते हैं।"
"मै घर आना चाहती हूँ ,आपके पास,जानती हूँ मेरी गलती माफी के लायक नही लेकिन फिर भी माँ हो सके तो मुझे माफ़ कर दो।"
बेटी को दर्द में देखकर आखिर माँ का दिल कैसे ना पिघलता लेकिन फोन पर माँ,बेटी की बाते सुनकर आज राजेन्द्र जी भड़क उठे । उन्होंने आव देखा ना ताव सीधा एक तमाचा सरलाजी के गाल पर दे मारा था। और कहा,जैसी माँ होगी वैसी ही तो बेटी भी होगी, औरतों का काम ही है तिरिया चरित्र फैलाना अगर अपनी पसन्द से शादी की है तो अंजाम भी भुगते लव मैरिज का यही अंजाम होता है।"
माँ,बेटी को एक पलड़े पर तौल कर राजेंद्र जी मन की भड़ास निकालकर घर से बाहर निकल चुके थे। लेकिन तीस सालों तक दबे अपमान के समंदर की लहरें आज उत्पात मचाने के मूड में थी।आज वो अपने साथ सब कुछ बहा ले जाना चाहती थी। अपना बदला लेने के लिए बार बार ऊंची ऊंची लहरें मन के अंदर हिचकोले खा रही थी।
तभी दरवाजे की घंटी बजी .......सरलाजी में आंसुओ को पोछते हुए उठकर दरवाजा खोला तो देखा सामने उनकी बेटी रचना अपनी गोद मे एक माह की बेटी को लिए खड़ी है। उसकी हालत देखकर जैसे उनका कलेजा मुह को आ गया ।जगह जगह चोट के निशान पूरा शरीर नीला पड़ा हुआ था बिखरे बाल, बालो में लटे आपस मे उलझी हुई थी जैसे महीनों हो गए बालो में न तेल पड़े ना कंघी हुई ना ही साफ किये गए।
तभी रचना ने उनके पैरों पर गिर कर अपनी बेटी को उनके पैरों के पास रखते हुए हाथ जोड़कर कहा
,"मां प्लीज!मुझे और मेरी बेटी को बचा लो मां वरना वो लोग हम दोनो को मार देंगे । बडी मुश्किल से उनके चंगुल से भागकर आ पायी हुँ मां वो लोग मुझे कमरे मे बंद रखते है।किसी से मिलने नही देते।अगर आज आपने साथ नही दिया तो आपकी बेटी मर जाएगी माँ ।आप और पापा मुझे माफ कर दो।पापा से कहो मुझे बचा लें, " रचना रोते रोते अपनी बात कहे जा रही थी।
सरलाजी का मन रचना के लिये बेचैन हो गया।तभी वहाँ राजेंद्र जी भी आ गए ।सरलाजी की उम्मीद के मुताबिक उन्होंने रचना को हाथ पकड़कर घर से बाहर निकलने की कोशिश की
तो सरलाजी ने कहा,"रुक जाइए,आपको इतनी मेहनत करने की कोई जरूरत नही हम लोग खुद ही चले जायेंगे।"
सरलाजी के अंदर पीड़ा का समन्दर ठांठे मारने लगा।
"क्या कहा तुमने हम दोनों?हाँ बहुत अच्छी बात है ये तो अभी निकलो दोनो माँ बेटी मेरे घर से"राजेन्द्र जी ने सरलाजी को घूरते हुए उनको बाहर की तरफ धक्का मार दिया
हाँ हम दोनो माँ बेटी आपके घर से चले जायेंगे । शायद आपको मालूम नही की संतान रूपी फसल की बीज एक पिता ही माँ के गर्भ में बोता है जिसे माँ अपनी कोख में नौ महिने रखकर अपने खून और मांस देकर सीचती है।और फिर उसे नौ महीने बाद अपार दर्द सहकर जन्म देती है। आप ये बात भूल सकते है पर मैं नही भूल सकती।
किसी ने शादी चाहें लव मैरिज हो या अरेंज मैरिज की हो। उसकी सफलता की कोई गारंटी नही ले सकता जब तक की अगर पति पत्नी के रिश्ते में एक दूसरे के प्रति प्यार ,विश्वास और सम्मान ही ना हो तो, वो रिश्ता कभी भी नही चल सकता। फिर वो विवाह चाहे लव मैरिज हो या अरेंज मैरिज उसकी सदैव नींव कमजोर ही रहती है।
जैसे मेरी और आपकी।क्योंकि हमारी शादी तो अरेंज मैरिज ही थी फिर क्यों आप मुझे शादी के तीस सालों तक मारते, पीटते और गाली देकर अपमानित करते रहे, क्या मैं जान सकती हूं।
मैं मजबूर थी क्योंकि मेरा साथ देने वाला कोई नही था इसलिए मैंने अपने अपमान को भी आपका मजाक समझकर हवा में उड़ाती रही लेकिन आज सच से सामना हो गया कि ये घर मेरा नही सिर्फ और सिर्फ आपका ही है।
उन्होंने अपने बेटी का हाथ थामा और निकल।गयी घर से बाहर।जाते जाते कहा,"आप पिता होने का फर्ज भूल सकते है लेकिन मैं माँ होने का फर्ज नही भूल सकती।"
और हाँ आप ने मेरी परवरिश पर उंगली उठाई तो आपको शायद भूल गया तो याद दिला दूँ कि विदेश में उच्च पद पर बैठे हमारे बेटे रोशन में भी मेरी ही दी हुई परवरिश है। बेशक रचना से गलती हुई हैं। इसका मतलब ये नही की हम उसे मरने के लिए छोड़ दे। और अगर ध्यान से देखा जाए तो कही ना कही आपका बेटा बेटी की परवरिश में भेदभाव और रचना पर आवश्यकता से अधिक शासन ही रचना के इस गलती का जिम्मेदार है।
