सर पर पल्लू
सर पर पल्लू
अरे बहुरिया .."
इधर बैठ ...तनिक.. दूर की नजर ठीक ना रही अब.. ""
जी तायी जी.. कहती हुई बहु ने पहले पैर छुए .."
आ इधर बैठ.. मेरे पास.. "
"अए हय्य.. ये का.. सर पर पल्लू"
मैने कितनी बार कहा तेरी सास को.. कि पढी लिखी बहु है इंजीनर.. इससे सर क्यूं ढकवाती है.. पर ना मानती.."
तो क्या हुआ.. तायी जी... सर पर पल्लू से बोझ ना लगता और फेर मैं जब शहर लौट जाती हूं.. आफिस जाती हूं.. तब तो नही लेती.. सर पर पल्लू.. "
"अब जैसा देस, वैसा भेस.. "तो आप ही कहो हो.. "
अए हय्य.. तू तो म्हारी भाषा में बोले बहु.. "
म्हारी बिंदिया तो कह री थी,नयी भाभी गिटर पिटर अंग्रेज़ी बोले है.. "
हां तायी जी.. वो तो मैं वही बोलूं ना, जहां काम करूं.."
तभी तो हम कहे तेरी सास से.. नयी बहु से क्या सिर ढकवाना.. "
तायी जी सर पर पल्लू लेने में तो कोई परेशानी ना.. लेकिन जो लम्बा लम्बा घूंघट लेके बहुएं पूरे दिन काम करती हैं, उनके लिए आप काम कीजिए.. "
अरे तो.. वे पुरानी बहुएं है.. पढी लिखी भी ना इतनी.. "
तो क्या तायी जी, उन्हे सुविधाएं ना मिले.. "
इससे तो उनमें ओर नाराजगी, होगी कि नयी बहुओं को सुविधा दी जा रही हैं.. और हमारी किसी को कोई कद्र ना.. "
आप देखो कितनी परेशानी होवै घूंघट में.. चोट चपेट लगने का भी डर.. गरमी में ओर ज्यादा गरमी ..ये ठीक ना.. "
अब हम इक्सवीं सदी में पहुंच गये हैं.. और इसलिए मुझे अपनी सास से कोई शिकायत ना, क्योंकि उन्होने मुझसे पहले मेरी जेठानी का घूंघट भी हटवाया हुआ था.. "
कहवै तो तू सही.. बहु.. "
मैं सबसे पहले अपनी बहुओं का परदा हटवाती हूं.. "
लेकिन हां सर तो ढकवाऊंगी.. "
सर ढक कर चलती.. बहुएं बडी सोणी लगै हैं.. "
जी तायी जी ...जरूर.. ""
"मैं तो पहले ही कहूं हूं.. सर पर पल्लू से बोझ ना लगै है।
