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Priyanka Gupta

Drama Inspirational Others

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Priyanka Gupta

Drama Inspirational Others

सम्मान कर सकती हूँ; लेकिन गुलामी नहीं

सम्मान कर सकती हूँ; लेकिन गुलामी नहीं

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"मम्मी जी ,आपको आपके बेटे की शादी एक लड़की से नहीं करनी चाहिए थी। ", स्निग्धा ने तेजेश्वरी जी की तरफ देखते हुए कहा। 

अपने नाम के अनुरूप तेज -तर्रार तेजेश्वरी जी को अपनी जुम्मा -जुम्मा आयी सीधी -सादी,मितभाषी और विनम्र बहू से ऐसे ज़वाब की अपेक्षा कतई नहीं थी। स्निग्धा की शादी तेजेश्वरी जी के इकलौते बेटे अंबरीष के साथ 6 माह पूर्व ही हुई थी। रिश्तेदारी में किसी एक शादी में तेजेश्वरीजी ने स्निग्धा को देखा था और स्निग्धा उन्हें देखते ही अपने बेटे अंबरीष के लिए पसंद आ गयी थी। स्निग्धा की सादगी और शान्त स्वभाव उन्हें भा गया था। स्निग्धा ने सलवार सूट पहना हुआ था और मेक -अप के नाम पर सिर्फ काजल लगा रखा था। स्निग्धा पूरी शादी में सबसे अलग नज़र आ रही थी। वह अपनी दादी माँ के लिए अलग-अलग स्टॉल पर जाकर खाने -पीने की चीज़ें ला रही थी और जिस धैर्य के साथ वह अपनी दादी की चेयर के पास खड़ी थी ;उसी के आधार पर अपने अनुभव से तेजेश्वरी जी को उनके तेज़ -तर्रार स्वभाव के साथ एडजस्ट करने के लिए स्निग्धा एकदम परफेक्ट लगी थी। 

तेजेश्वरी जी के पति मोहन जी बैंक की नौकरी से सेवानिवृत हो चुके थे और उन्हें एक अच्छी खासी पेंशन मिल रही थी। अंबरीष से बड़ी बहिन काया की शादी हो चुकी थी। तेजेश्वरी जी ने शहर में अच्छा-खासा बड़ा सा घर ;घर क्या कोठी बनवा रखी थी। अंबरीष भी बैंक में अधिकारी था। अच्छा खाता -पीता परिवार था और अंबरीश पर किसी प्रकार की कोई जिम्मेदारी नहीं थी। कुल मिलाकर अंबरीष एक परफेक्ट मैरिज मटेरियल था। इसीलिए इतने काबिल लड़के के लिए रिश्तों की लाइन लगी हुई थी। लेकिन तेजेश्वरीजी ऐसी लड़की की तलाश में थी ;जिसके आने से उनकी सत्ता में कोई परिवर्तन न हो। 

शादी होते ही तेजेश्वरीजी ने ससुराल में अपनी धाक जमा ली थी और उनकी सास एक धर्मपरायण सीधी -सादी महिला अपनी बहू के अनुसार ढल गयी थी। तेजेश्वरी जी इसका पूरा श्रेय अपनी योग्यता को देती थी ;उनका मानना था कि उनके जैसा बढ़िया घर -परिवार कोई चला नहीं सकता ;इसीलिए उनकी सास ने उनके काम में कभी कोई दखल नहीं दिया। सास बनने के बाद भी वह अपनी सत्ता नहीं छोड़ना चाहती थी। 

पति मोहनजी माँ और पत्नी दोनों के ही पचड़ों से दूर रहते थे या यह कहें कि उदासीन थे। फिर उनकी माँ अपने बेटे से बहू की कभी कोई शिकायत भी नहीं करती थी। 

तेजेश्वरी जी की पसंद पर मोहन जी और अंबरीष दोनों ने ही मुहर लगा दी थी। स्निग्धा के माता -पिता को इस रिश्ते में कोई कमी नज़र नहीं आयी। दोनों पक्षों की सहमति से स्निग्धा और अंबरीष की शादी हो गयी तथा स्निग्धा तेजेश्वरीजी की बहू बनकर ा आ गयी। 

शुरू-शुरू में स्निग्धा तेजेश्वरी जी की हर बात मानती ;उनके कहे अनुसार सारा काम करती । स्निग्धा की ख़ामोशी को तेजेश्वरीजी उसकी मूर्खता समझने लगी । स्निग्धा मितभाषी थी ;लेकिन वह बेवकूफ नहीं थी ;उसमें समझ थी ;वह निर्णय भी ले सकती थी । धीरे -धीरे स्निग्धा को तेजेश्वरीजी का प्रभुत्वववादी व्यक्तित्व समझ में आने लगा । घर की हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी बात से संबंधित निर्णय सिर्फ और सिर्फ तेजेश्वरी जी ही ले सकती थीं । वह किसी और की सलाह तक सुनना पसंद नहीं करती थी ।

स्निग्धा के खाने -पीने से लेकर कपड़े पहनने तक के निर्णय तेजेश्वरीजी लेने लगी थी । स्निग्धा को नाश्ते में पराँठा खाना पसंद था ;लेकिन तेजेश्वरीजी दूध -दलिया ,कॉर्नफ्लेक्स,पोहा ,उपमा आदि ही बनवाती और अगर वह पराँठा बनाना भी चाहती तो तुरंत मना कर देती कि ,"इस घर में सुबह पराँठा कोई नहीं खाता । "

स्निग्धा ने अंबरीष को बड़े प्यार से एक शर्ट गिफ्ट करी थी ;अंबरीष एक दिन ऑफिस में जब वह शर्ट पहनकर जाने लगा तो तेजेश्वरी जी ने उसे टोक दिया और कहा कि ,"ऐसे ब्राइट कलर पहनकर ऑफिस जाओगे क्या ?"

अंबरीष ने दबे लफ्जों में कहा भी कि ,"यह शर्ट उसे स्निग्धा ने उपहार में दी है। "

"उससे क्या फर्क पड़ता है। स्निग्धा को इस बात की समझ कहाँ कि ऑफिस में क्या पहनकर जाना है और क्या नहीं। ",तेजेश्वरी जी ने कहा। 

अंबरीष शर्ट बदलकर ऑफिस चला गया था और स्निग्धा चुपचाप सब देखते रह गयी थी। लेकिन आज स्निग्धा से और चुप नहीं रह गया। 

"क्या मतलब ? लड़की से नहीं तो किससे करनी थी ? और शादी के 6 महीने बाद तुम यह क्या कह रही हो ?",तेजेश्वरी जी ने डाँटते हुए कहा। 

"मम्मी जी तेज़ बोलने से कोई समझदार नहीं हो जाता और कम बोलने वाले बेवकूफ नहीं होते । आपको अपने बेटे की शादी चाबी भरने वाली गुड़िया से करनी चाहिए थी या जादुई चिराग से करनी चाहिए थी और सबका नियंत्रण आपको अपने हाथ में रखना चाहिए था । जीती -जागती लड़की में दिल और दिमाग दोनों होता है। आप चाहती हैं कि आपके घर में किसी और का दिमाग कभी इस्तेमाल ही नहीं हो । मैं आपका सम्मान कर सकती हूँ ;लेकिन गुलामी मुझसे नहीं होगी । ",स्निग्धा ने आत्मविश्वास से सधे हुए शब्दों में कहा और वहाँ से चली गयी।

"तेजेश्वरी ,सत्ता परिवर्तन का समय आ गया है। मेरी माँ इस मामले में तुमसे ज्यादा समझदार थीं। उन्होंने घर की सुःख और शान्ति बनाए रखने के लिए ख़ामोशी को चुना था। अब तुम भी अपनी बहू को उसका घर -संसार सम्हालने दो। ",मोहन जी ने अवाक तेजेश्वरी जी को समझाते हुए कहा। 

आज पहली बार तेजेश्वरी जी की खामोशी भी बहुत कुछ कह रही थी।


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