#सिर्फ माँ ही विधवा क्यों
#सिर्फ माँ ही विधवा क्यों
" दद्दा उर्मिया से कह दो । सुबह सुबह फूल फले लाकर रख दिया करे। मेरे उठने के बाद अपना मुंह ना दिखाए। मुझे उसका मुंह देखने का मन नहीं करता है। यही तो है जो मेरे छोटे भैया को खा गई। अपशकुनी कहीं की।
गिरधारी दादा पूजा कर रहे थे उन्हें अपनी बेटी का ऐसा कहना पसंद नहीं आया क्योंकि वह बेटी और बहू में कोई अंतर नहीं समझते थे।
घर की लाडली बेटी के लिए रागिनी की हरकत बहुत बड़ी थी एक तरह से पाप था एक विधवा अगर सामने आ जाए तो एक सधवा को उसकी सूरत देखना पसंद नहीं होता है ऐसा ही कुछ हो रहा था घर की लाडली बेटी रागिनी के साथ थे। कि सुबह सुबह विधवा का मुंह देखना अशुभ होता है।
रागिनी जैसी औरतें या मानती है कि वैधव्य में औरतों की गलती होती है अगर कोई विधवा है तो इसमें उसके पूर्व जन्म के बुरे कर्म है इसीलिए वह विधवा है।
उर्मिला के पति फौज में थे और एक फौजी की मौत बहुत सम्मानजनक होती है एक फौजी की विधवा को बहुत सम्मान मिलता है लेकिन घर में उसका हर पल हर दिन अपमान होता था।
विवाह के टाइम में इतना रोए कि उसे गिरधारी जी ने ससुराल नहीं जाने दिया और अपनी बेटी को और बहन को और बहन के पति दोनों को अपने ही घर में रख लिया और कुछ खेत जमीन दे दी ताकि बोलो वहां पर अपना जीविका बसर कर सके।
फौजी की विधवा हुई थी उर्मिला अपने आप को एक सम्मानित स्त्री के रूप में वह पहचान चुकी थी अब अगर कोई उसका अपमान करता था तो उसे कोई खास फर्क नहीं पड़ता था उसे सिर्फ अपनी बेटी को बड़ा करना था उसकी बेटी राधा अभी सातवीं कक्षा में पढ़ती थी।
जब रागिनी उर्मिला को इतनी सारी गालियां दे रही थी और उसके सामने से गुजर जाने की वजह से नाराज हो रही थी तब राधा को बहुत बुरा लगा और राधा ने कहा
"वह मेरी मां है अशुभ नहीं है। कोई भी श्री अशोक नहीं होती और एक फौजी की विधि द्वारा इस दुनिया में सबसे ज्यादा पूजनीय होती है आगे से अपनी मां के लिए मैसेज शब्द बर्दाश्त नहीं करूंगी सुनकर रागिनी।
और घर के लोग बहुत खुश हैं वह लोग जो बोलना चाहते थे वह आज राधा ने कह दिया था और रागिनी ने कभी भी उर्मिला को अब शकुनी आभारी कहना छोड़ दिया था उर्मिला अपनी बेटी की पढ़ाई लिखाई में पूरा ध्यान देने लगी थी उसे अपनी बेटी पर गर्व था।
आज उर्मिला की बेटी ने उसे उसके हिस्से की खुशी और उसका आत्मसम्मान वापस लाकर दिया था। एक मां का हृदय एकदम गदगद था।
क्रमश :
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