सिंदूर!!
सिंदूर!!
सिन्दूर से भरी मांग, हाथों में भरी भरी लाल चूड़ियां, पैरों में महावर का चटक लाल रंग, पायल, बिछुआ साड़ी पहने हुए जब रूपा ने अपनी सहेली रश्मि को देखा तो ठहाके लगा के हँसने लगी।
और कहा,"रश्मि तू और ऐसे .....। तू तो बिल्कुल गांव की कोई गंवार दुल्हन या एकता कूपर के सास बहू सीरियल की नायिका लग रही है।"
"आजकल कौन करता है ये सब?"ये भेष क्यों बना रखा है? वो भी मुंबई जैसे मेट्रो सिटी में,तू तो पढ़ी लिखी गंवार निकली....एमबी ए करना तो तेरा बिल्कुल बेकार रहा" एक लगातार रूपा बोले और हँसे जा रही थी।
तभी रश्मि ने कहा,"अब बस भी कर आ कमरे में चलकर बात करते है।"
कॉलेज में साथ पढ़ी रूपा और रश्मि दोनो मुम्बई में रहती थी। लेकिन ये बात दोनो को पता नहीं थी अभी महीनों पहले ही फेसबुक से रूपा को रश्मि के बारे में पता चला तो उसने मिलने का प्रोग्राम बनाया।रूपा आज पहली बार रश्मि से मिलने उसके ससुराल आयी थी। क्योंकि रूपा को ऑफिस और घर से छुट्टी बहुत मुश्किल से ही मिल पाती थी और रविवार शनिवार दिन घर के काम और बच्चों में व्यस्त रहती थी।
वही रश्मि अपने पति के साथ उनके व्यवसाय को संभालती थी। क्योंकि उसके ससुराल वाले फर्नीचर और गारमेंट्स का व्यवसाय करते थे।रश्मि रूपा को लेकर कमरे में आ गयी। लेकिन उसने वापिस वही सवाल किया,"अरे तू बता तो की ये बहनजी टाइप सिंदूर लगाकर क्यों है तू?"
तब रश्मि ने कहा," पहले आराम से बैठ यहाँ फिर बात करते है....अब बोल क्या बोल रही थी?"
रूपा ने कहा,"मैं यही बोल रही थी कि ये सब इतना कुछ पहनकर तू काम कैसे कर पाती है? मैं तो दस कदम भी ना चल पाऊँ.... साड़ी पहनकर और इस तरह से सोलह श्रृंगार करके बड़े मुश्किल से तो तीज और करवाचौथ पर करती हूँ वो भी पूजा खत्म होते तुरंत उतार देती हुँ।
कही तुझे तेरी सासूमां के डर से तो ये सब नहीं करना होता। अगर हाँ तो साफ साफ लफ्जो में बोल दे, की आपको करना है करो मुझसे कोई उम्मीद मत रखना क्योंकि मुझसे नहीं होगा ये सब। ये सास नाम की महिला होती ही ऐसी है। खुद भले ना बहू रहकर सारे नियम कायदे निभाये हो लेकिन अपनी बहू को सब काबू में रखना चाहती है।
तभी रश्मि की सास सुधा जी हाथो में चाय नाश्ते की ट्रे लेकर अपनी बहू रश्मि के कमरे में प्रवेश किया।
रश्मि से मिलने आयी उसकी सहेली रूपा उसकी सासू माँ को देखते ही रह गयी।वो भी बिल्कुल रश्मि की तरह एकदम सोलह श्रृंगार में सजी धजी हुई थी जिसे देखकर रूपा का मुँह खुला का खुला रह गया।
तभी सुधा जी ने कहा," बहु ये लो चाय नाश्ता रूपा और तुम्हारे लिए ,"
आवाज सुनकर रश्मि ने पलटकर देखा तो उसकी सास दरवाजे पर खड़ी थी और उसने ने खड़े होकर सास के हाथ से ट्रे पकड़ते हुए कहा
"माँजी आप क्यों परेशान हुई?मुझे बुला लिया होता। या नौकर के हांथो भिजवा देती"
"अरे!तो इसमें क्या हुआ? मैंने सोचा तुम बहुत दिनों बाद अपनी सहेली से मिली हो तो मिलकर बातें करो, मैं ही ले जाकर दे देती हूँ,अब दोनो आराम से बातें करो"। कहते हुए रश्मि की सास नाश्ते की ट्रे दे कर कमरे से चली गयी।
"ऐसे क्या देख रही हो ,रूपा?"
" मेरी सासूमां बहुत अच्छी है। मुझे बेटी की तरह प्यार करती है। सिर्फ जुबान से नहीं दिल से भी"रश्मि ने रूपा को चाय पकड़ाते हुए कहा
"अरे!तेरी सासूमाँ तो "बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम है"। उनके श्रृंगार में भी कोई कमी नहीं, क्या बात है वाह! ...तुझे तो पूरा बराबरी का टक्कर दे रही है। कही तुम दोनो ज्यादा टीवी सीरियल्स तो नही देखते। जिससे सीरियल तुम दोनो पर उसका का असर हो गया ।तुम दोनो तो टीवी सीरियल की सास बहू जैसे हमेशा फुल मेकअप में टिप टॉप, क्या बात है?"रूपा ने हँसते हुए कहा
तो रश्मि ने मुस्कुराते हुए कहा," अच्छा तब तो तुम हमें ऐसे ही देखने की आदत डाल लो। और ये सीरियल का नही हमारी सामाजिक संस्कृति का असर है।"
"लेकिन मुझे तेरी एक बात समझ नहीं आयी रूपा, इसमें बुरा क्या है?"
अभी तूने ही कहा कि तीज और करवाचौथ पर तु सोलह श्रृंगार करती है। मतलब सिंदूर चूड़ी बिंदी सब लगाती है। तो रोज लगाने में क्या समस्या है।
रही बात मेरी सासुमां की तो देख हर सुहागन स्त्री को पूरा श्रृंगार करने का पूरा अधिकार है। फिर उम्र चाहे जो भी हो क्या फर्क पड़ता है?
"और एक बात बता दुनिया की किस किताब में लिखा है कि सिंदूर लगाने वाली और सोलह श्रृंगार करने वाली औरतें गंवार होती है। तेरी सामान्य जानकारी के लिए बता दूँ की सिंदूर लगाना गंवार होने की निशानी तो बिल्कुल भी नहीं" रूपा की बात को काटते हुए रश्मि अब बोलना शुरू किया। "और रही बात सीरियल वाली सास बहू की तो उनके फैशन को तो लोग कॉपी करते हैं। जैसे अक्षरा, कोकिलाबेन तुलसी जैसे श्रृंगार वाले मेकअप तो लोग पार्लर जाकर पैसे खर्च कर के वैसे मेकअप कराते है। पार्टी और शादी समारोह के लिए।
वैसे हर किसी को अपने ढंग से कपड़े पहन के सज संवर के रहना ही चाहिए। और मुझे ये चीज शुरू से पसंद है। तू तो जानती है। इसलिए जब मैं अपने ससुराल आयी तो सासूमां ने मुझे एक सुहागन औरत के लिए श्रृंगार सिंदूर और सज संवर कर रहने की क्या अहमियत होती है सब कुछ अच्छे से समझाया। और साथ ही ये भी बोला कि जैसा तुम्हारा मन करे तुम वैसा कर सकती हो और रह सकती हो।
लेकिन मुझे ये नियम अच्छे लगे इसीलिए मैं भी सासूमाँ के बनाएं नियमों का पालन करती हूँ। सुबह उठकर सबसे पहले नहा धोकर तैयार हो कर ही रसोई में जाती हूं।
सुन मेरी मान तू भी शुरू कर दे,सिर्फ तीज और करवाचौथ पर नही हमेशा के लिए ... किसी और को दिखाने के लिए नहीं खुद के लिए.....। खुद को भी बहुत अच्छा महसूस होता है।आईने के सामने खुद को सजा सँवरा रूप देखकर।
श्रृंगार से लेकर कपड़े और खाने पीने तक पर मुझ पर किसी ने कोई पाबंदी या नियम नहीं लगाए। मैं अपनी ससुराल में सब कुछ खुशी खुशी अपनी मर्जी से करती हूं। मेरे ऊपर किसी का कोई दबाव नहीं। समझी तू...."वैसे भी जैसे हर किसी के अपने कोई ना कोई शौक और पसन्द होती हैं। वैसे ही मेरा भी हैं। खुद को सजे संवरे रूप में देखना और सिंदूर लगाना और चूड़ी पहनना तो मैं अपना सौभाग्य समझती हूं"
और तूने भी तो मेकअप किया ही है ना सिर्फ अंतर तुझमें और मुझमें इतना है कि मैंने चूड़ी ,बिंदी,सिंदूर,महावर लगाए है। और तू ने इन सब को छोड़कर बाकी सब कुछ लगाया है। क्यों सही कह रही हूँ ना? लिपिस्टिक से लेकर काजल मस्करा तक सब कुछ लगा रखा है तो चूड़ी सिंदूर और बिंदी क्यों नहीं?
रूपा पढ़े लिखे होने का मतलब ये बिल्कुल नही की हम अपनी सभ्यता और संस्कृति भूल जाए। तू बता मुझे क्या खराबी है सिंदूर लगाने में?
और रही बात कहने वालों की तो बातें बनाने और कमियां निकालने वालो का हम मुँह कभी बंद नही कर सकते। जिनकी आदत ही हो गयी हो कमियां ढूंढ कर किसी को नीचा दिखाने की वो तो हर चीज में कमी निकाल ही लेते है। तो क्या हम औरतें अपनी पसन्द को भूल जाएं।
जबकि कायदे से होना तो ये चाहिए कि हमे अपने श्रृंगार करने ना करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। हम औरतों को कभी भी एक दूसरे के पहनावे श्रृंगार को लेकर एक दूसरे का मजाक नही बनाना चाहिए।
रूपा निरुत्तर रश्मि का मुँह देखने लगी। फिर उसने बात टालते हुए कहा,"अच्छा बाबा तू जीती मैं हारी। अब ठीक है। वैसे भी बातों में तुझे कोई कहाँ जीत सकता है।"
चल और बता किसी और से मिलना हुआ कॉलेज के बाद या नहीं। कहकर रूपा रश्मि से कालेज से जुड़ी अन्य बातें करने लगी।
