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शर्म का घुँघट

शर्म का घुँघट

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ममता अपने बेटे अजय के लिए रिश्ता ढूंढने के लिए कही जाती।पर शर्त रखती कि लड़की घूंघट करेगी। उसको एक साधारण परिवार की लड़की चाहिए थी बहू के लिए जहां पर कोई लड़की आधुनिक कपड़े या देखने में लगती ममता उस रिश्ते को तुरंत ना कर देती।

अजय और उसके पापा समझा कर थक गए थे कि अच्छे परिवार का रिश्ता होता है, लड़की समझदार भी होती है। पहनावे से सोच का कोई मतलब नहीं है, पर उसे तो जैसे धुन सवार थी। घुघंट तो करायेगी ही बहू से। ननद समझाकर थक गयी कि मैं भी नहीं करना चाहती अपनी ससुराल। पर उसको लोक लाज, समाज का डर था। बहू नहीं करेगी तो लोग क्या कहेगें..?

आज फिर किसी रिश्तेदार ने एक लड़की को रिश्ता बताया था, वहां जाकर देखा सुशील लगी उसे और कुर्ता पर लाल रंग का कुर्ता और सलवार और भारी सा दुपट्टा पहने थी।

नाम था सिया। ममता ने अच्छी तरह से प्रश्नों की बौछार कर दी थी। हमारे घर मे सिर ढकना जरूरी है, हम लोगों के यहाँँ कायदे है। सिया हर बात पर जी कर के जवाब देती। अजय ने उस सिया से सब बात कर ली थी उसने साफ-साफ बताया कि उसकी मम्मी को सिर ढकने वाली बहू चाहिए।

उन्हें यह लगता है कि सिर ढकने से बहुए कंट्रोल में रहती हैं। आप उनकी बात को महसूस नहीं करना, मुझे आप पसंद है, माँँ दिल की बुरी नहीं है बस यह डर है कि कोई ऐसी लड़की ऐसी ना आ जाये कि घर बिखर जाये। सिया और उसके परिवार को बातें समझ आ चुकी थी बस उनकी शर्त सिर ढकना थी, वैसे स्वभाव बहुत अच्छा था। बहुत रिश्ते नहीं हो पाये थे।

इस बार अजय और उसके पापा ने सिया के परिवार को समझा दिया कि हम उसे घुंघट नहीं करायेगे बस शादी की रस्मों के कुछ दिन मेहमानों का आना-जाना जब तक होगा, ममता को कुछ दिनों में समझा देंगे। जल्दी से जल्दी ममता को समझाने का वादा कर लिया था। करेंगे कैसै ? ये अंदाजा नहीं था पर सिया बेहद पसंद थी।

उसके परिवार के स्वभाव ने रिश्ते को हाँँ बोल दी थी। शादी करके सिया घर आ गई। भरी गर्मी में भी उसको सिर ढकना पड़ता था पर अजय उसका बहुत ध्यान रखे थे, जब कोई नहीं होता या तो उसका सिर से पल्ला उतार दिया करते थे। वह जल्दी से घबरा के इधर उधर देख कर और फिर पल्ले को सर पर रख लेती थी कि कहीं अजय मम्मी नाराज ना हो जाए पर अजय की प्यार भरी बरसात से वह इस बात को समझ रही थी कि उसे घर में कुछ दिन एडजस्ट करना है।

अजय ने विश्वास दिलाया था कि जल्दी वो सिर का घुंघट उतरवा देगें। ससुुर जी ने सिया को बता दिया था कि थोड़े दिन के बाद वह जहाँँ नौकरी पर जाएगा वहां उसे ले जाएगा ।रीति रिवाज खत्म होने के बाद ममता से बात करेंगे। सिया समझदार थी और घर का पूरा ध्यान रखती थी।

सिया के सिर ढँकने से पूरे चेहरे पर उसके दाने निकल आए थे जो कि हद से ज्यादा बढ़ गए थे। डॉक्टर ने उसको बताया कि उसकी गर्मी की वजह से उसके चेहरे में इंफेक्शन हो गया है डॉक्टर ने उसको एलर्जी की दवाई देकर और सिर ना ढकने की सलाह देकर घर भेज दिया था। सिया इन्फेकशन से भी खुश थी कि अब उसे गरमी में सिर नहीं ढकना पड़ेगा। ममता ने बहुत कोहराम मचाया और लेकिन सिया के साथ उसके ससुर और अजय और ननद तीनों का साथ था इसलिए सिर ढकना मना हो गया। सिया के दाने ठीक हो गए और पर ममता को उसका सिर ढकना पसंद था।

इन कुछ दिनों में सिया को अब उसको आदत हो चुकी थी बिना ढकने की। उसमें बहुत अच्छा महसूस भी कर रही थी तो उसने कोशिश भी नहीं की सिर ढकने की। अजय के पापा का बहू सिर ढके नहीं पसंद था।

अपनी बेटी भी दूसरे के घर जानी थी तो वो वो तो चाहते थे कि बहू सिर ना ढके। ममता को यह बिल्कुल बर्दाश्त नहीं था, लोक समाज क्या सोचेगा ? या कहीं सिया जवाब ना देने लगे, ज्यादा खुल जायेगी सबसे तो।

ममता बातों से हमेशा कुछ न कुछ उसको ताने सुनाती रहती। सिया बहुत समझदार और घर संभालने वाली थी इसलिए वह कोई ऐसा मौका कभी नहीं छोड़ दी थी जिससे उसकी सास कोई और शिकायत का मौका मिले।

ननद के साथ घर के काम अच्छे से संभाल रही थी। सिया को ममता बराबर में पड़ोसी जी की बहू की हमेशा तारीफ करती। एक तुम हो एक वह है उसका सिर हमेशा से ढका रहता है। उसका कभी नहीं होता की कभी नीचे किया हो पल्ला। बहुत इज्जत करती है सबकी हमारे आते ही उसका सर से पल्लू सरकता नहीं। ऐसी है उनकी बहू।

सबको उनकी ममता की बोलने की आदत का पता था इसलिए कोई भी उनकी बातों पर ध्यान नहीं देता था।सिया को बुरा लगता तो समझाने के लिए उसके ससुर और अजय और ननद हमेशा उसके साथ होते थे।

शुरु शुरु में तो सिया की आंखों में पानी भर जाता था पर धीरे-धीरे अजय और उसके ससुर और ननद का साथ मिलते ही उसको अपनी सास की बातों की आदत पड़ गई।

एक दिन बराबर में बहुत जोर जोर से झगड़े की आवाज सुनाई थी मोहल्ले वाले सभी इक्कठा हो गए। अजय ,अजय के पापा ममता, ननद सभी लोग पड़ोस में देखने चले गए कि हो क्या रहा है ? पर पड़ोसी के घर में किसी को दूसरे को देखने की सुध नही थी, आपस मे लड़ने के अलावा।

पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो गया है। लोग भी खूब बोल रहे थे कि कैसा व्यवहार की बहू सिर पर पल्ला करें। आंखों तक ढके और अपने सास-ससुर को खूब गाली दे रही थी। बुरा भला सुना रही थी। जब ममता जाकर देखा तो उसकी आंखें आश्चर्य में हो गई। जिसे वह सुशील समझदार सिर ढकने वाली बहू समझ रही थी।

सभी लोग आपस में बातें कर रहे थे ऐसा भी क्या घुंघट जिसमे शर्म ना हो, शर्म तो आँखो की होती है, कितना लम्बा घुंघट कर लो अगर बड़ों की इज्जत नहीं तो बेकार है घुँघट। ममता को पता चल गया था झुकी आँँखें सब कुछ बयां कर रही थी। खुद पर शर्म आ रही थी।

आज ममता का चेहरा शर्म से झुका हुआ था और बाहर आकर सब आस पड़ोस वाले सिया की तारीफ कर रहे थे। किसी ने जवाब देते या अपने घर का अनादर करते नहीं देखा था। आज ममता भी अपमानित महसूस कर रही थी और आज ये भी जान गई थी की घूँँघट सिर से ढकने से नहीं, आंखों की शर्म होती है, जहां बड़ों की इज्जत की जाती है।

जाते ही सिया को गले लगा लिया कहकर हमारी बहू तो लाखों में एक है।

सब एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे। सिया अजय को एक दूसरे को देखकर। आज के बाद सिया को कोई घूघँट का ताना नहीं देगा।


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