शीर्षक: अहंकार का त्याग और मानवता की
शीर्षक: अहंकार का त्याग और मानवता की
शीर्षक: अहंकार का त्याग और मानवता की सच्ची सीख मलिक भागो का अहंकार चूर करने के बाद पूरे नगर में श्री गुरु नानक देव जी की चर्चा बिजली की तरह फैल गई। लोग दूर-दूर से उस महान फकीर के दर्शन करने आने लगे जिसने एक गरीब बढ़ई की सूखी रोटी को शाही पकवानों से ऊपर का दर्जा दिया था। भाई लालो की उस छोटी सी कुटिया के बाहर लोगों का ताँता लग गया, जिनमें अमीर, गरीब, विद्वान और साधारण ग्रामीण सभी शामिल थे। गुरु जी ने वहां एकत्रित जनसमूह को देखकर जीवन की वह अनमोल अकल दी जो आज के आधुनिक समाज के लिए भी एक मार्गदर्शक मशाल की तरह है। गुरु जी ने बहुत ही कोमल किंतु प्रभावशाली स्वर में लोगों को समझाया कि बाहरी दिखावा और अहंकार भक्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर कोई व्यक्ति एक हाथ से दूसरों का हक मारता है या गरीबों का शोषण करता है और दूसरे हाथ से विशाल भंडारे या दान-पुण्य करता है, तो वह दान ईश्वर की नजर में पूरी तरह व्यर्थ है। परमात्मा केवल उसी भेंट को स्वीकार करता है जो शुद्ध हृदय और ईमानदारी की मेहनत से कमाई गई हो। उन्होंने समाज में व्याप्त जात-पात और ऊंच-नीच के भ्रम को जड़ से काटते हुए कहा कि ईश्वर के दरबार में किसी की जाति या कुल नहीं देखा जाता, बल्कि केवल उसके शुभ कर्मों और प्रेम को ही तौला जाता है। गुरु जी ने लोगों को यह भी सिखाया कि असली तीर्थ यात्रा किसी नदी में स्नान करना नहीं, बल्कि अपने मन के भीतर जमी क्रोध, लोभ और अहंकार की मैल को धोना है। यदि मन अपवित्र है और विचार बेईमानी से भरे हैं, तो बाहरी सफाई का कोई मूल्य नहीं रह जाता। उन्होंने लोगों को प्रेम और भाईचारे का संदेश देते हुए कहा कि ईश्वर किसी एक धर्म की जागीर नहीं है, वह तो कण-कण में व्याप्त है और हर उस हृदय में निवास करता है जहां दया का वास होता है। गुरु जी की इन बातों ने लोगों की सोच बदल दी और भाई लालो की वह कुटिया मानवता और समानता की पाठशाला बन गई, जहां से सच्चाई और नेक कमाई का नया युग आरंभ हुआ। अगला कदम: सुखविंदर, क्या आप चाहेंगे कि मैं इसी तरह 'हरिद्वार में सूर्य को जल देने' वाला प्रसंग भी लिख दूँ, जहाँ गुरु जी ने लोगों के अंधविश्वास को दूर करने की एक बहुत ही
