शीर्षक: शिकारी का उद्धार
शीर्षक: शिकारी का उद्धार
शीर्षक: शिकारी का उद्धार एक बार आनंदपुर साहिब के जंगलों में गुरु गोबिंद सिंह जी अपने सिखों के साथ शिकार पर निकले थे। तभी उनकी नज़र एक बहुत ही भयानक और डरावने भालू पर पड़ी। उस भालू के शरीर पर हज़ारों घाव थे और उस पर अनगिनत मक्खियाँ भिनभिना रही थीं। वह भालू दर्द से बुरी तरह कराह रहा था और तड़प रहा था। सिखों ने सोचा कि गुरु जी अपनी तीर से इसका अंत कर इसे दर्द से मुक्ति देंगे। लेकिन गुरु जी ने तीर नहीं चलाया। उन्होंने पास खड़े एक सिख भाई को बुलाया जो पिछले जन्मों का ज्ञान रखते थे। गुरु जी ने मुस्कुराकर कहा, "सिक्खों, क्या तुम जानते हो यह भालू कौन है? यह पिछले जन्म में इस इलाके का एक बहुत बड़ा मसांद (धार्मिक प्रचारक) था।" लोग हैरान रह गए। गुरु जी ने आगे बताया, "इसने धर्म के नाम पर लोगों को लूटा, उनके साथ धोखा किया और संगत के पैसे का दुरुपयोग किया। आज यह अपने कर्मों के कारण इस भालू की योनि में है और तड़प रहा है। मक्खियाँ वे लोग हैं जिनका इसने हक मारा था, जो अब इसे नोच रही हैं।" तभी गुरु जी ने उस भालू के पास जाकर उसके सिर पर अपना हाथ रखा। जैसे ही गुरु जी का स्पर्श हुआ, उस भालू की आँखों से आँसू बहने लगे। गुरु साहिब ने उसे अपनी दिव्य दृष्टि दी और उसे उसके पापों से मुक्त कर दिया। वह भालू शांति से गुरु जी के चरणों में प्राण त्याग गया। गुरु जी ने सिखों को समझाया कि "सिर्फ भक्ति काफी नहीं है, ईमानदारी और नेक कमाई ही इंसान को नर्क की अग्नि से बचाती है।" यह बात आज भी बहुत कम लोग जानते हैं कि गुरु साहिब ने केवल दुश्मनों का ही नहीं, बल्कि भटकते हुए गुनाहगारों का भी रूहानी उद्धार किया था। टैग्स:
