शीर्षक: विजय का पत्र (ज़फ़रनामा)
शीर्षक: विजय का पत्र (ज़फ़रनामा)
शीर्षक: विजय का पत्र (ज़फ़रनामा) यह उस समय की बात है जब गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपना सब कुछ (सरबंस) वार दिया था। चमकौर के युद्ध के बाद, जब मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब को लगा कि उसने गुरु जी को हरा दिया है, तब गुरु साहिब ने उसे दीना कांगड़ की धरती से एक पत्र लिखा, जिसे 'ज़फ़रनामा' यानी 'विजय का पत्र' कहा जाता है। गुरु जी ने औरंगज़ेब को उसकी झूठी कसमें और उसके जुल्म याद दिलाते हुए लिखा— "जब सारे साधन समाप्त हो जाएं और बातचीत के सारे रास्ते बंद हो जाएं, तब हाथ में तलवार उठाना जायज़ है।" उन्होंने औरंगज़ेब को ललकारते हुए कहा कि 'क्या हुआ जो तूने मेरे चार बच्चे शहीद कर दिए, अभी मेरा कुंडली मारा हुआ सांप (खालसा पंथ) बाकी है।' हैरानी की बात यह है कि इस पत्र को पढ़कर औरंगज़ेब इतना डर गया और उसकी रूह इतनी कांप उठी कि वह बीमार पड़ गया। उसने महसूस किया कि वह युद्ध तो जीत गया, लेकिन गुरु गोबिंद सिंह जी के सिद्धांतों और जज्बे से हार गया है। वह पत्र पढ़ने के कुछ ही समय बाद औरंगज़ेब की मृत्यु हो गई। यह साखी सिखाती है कि सच की आवाज़ कागज़ पर भी तलवार से ज़्यादा तेज़ वार करती है। टैग्स:
