शीर्षक: नियम और मर्यादा
शीर्षक: नियम और मर्यादा
शीर्षक: नियम और मर्यादा एक बार श्री गुरु गोबिंद सिंह जी अपने सिखों के साथ कहीं जा रहे थे। रास्ते में एक बहुत ही प्रसिद्ध संत की समाधि (कब्र) आई। गुरु साहिब ने वहाँ से गुज़रते हुए अपनी तीर से उस समाधि को हल्का सा सलाम (नमन) किया। पास खड़े सिखों ने यह देखते ही गुरु जी को टोक दिया। सिखों ने कहा, "महाराज! आपने ही हमें सिखाया है कि 'मढ़ी-मसाण' (कब्रों या समाधियों) को नहीं पूजना चाहिए और न ही नमन करना चाहिए। फिर आपने आज नियम क्यों तोड़ा? मर्यादा के अनुसार आपको सज़ा (तनख्वाह) लगनी चाहिए।" गुरु साहिब यह सुनकर बहुत खुश हुए। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "सिक्खों, मैं तुम्हारी परीक्षा ले रहा था कि क्या तुम मेरे शब्दों को याद रखते हो या आँख बंद करके मेरा पीछा करते हो। तुमने मुझे सही पकड़ा है।" गुरु जी ने तुरंत अपनी गलती स्वीकार की और सिखों से कहा कि वे उन्हें मर्यादा के अनुसार सज़ा दें। सिखों ने गुरु जी को 500 रुपये का जुर्माना (तनख्वाह) लगाया। गुरु जी ने खुशी-खुशी वह जुर्माना भरा और सिखों की तारीफ की कि उन्होंने अपने गुरु को भी नियम की याद दिलाने में संकोच नहीं किया। यह साखी सिखाती है कि धर्म में कोई भी नियम से ऊपर नहीं होता, यहाँ तक कि खुद गुरु भी नहीं।
