शीर्षक: प्रेम का जूठा भोजन
शीर्षक: प्रेम का जूठा भोजन
शीर्षक: प्रेम का जूठा भोजन एक बार श्री गुरु गोबिंद सिंह जी शिकार से लौट रहे थे। रास्ते में उन्हें एक बहुत ही गरीब और पिछड़ी जाति का सिख मिला। वह गुरु जी का बहुत बड़ा प्रेमी था। जैसे ही उसने गुरु जी को देखा, वह खुशी से झूम उठा। उसके पास गुरु जी को खिलाने के लिए कुछ खास नहीं था, बस एक मक्की की रोटी और थोड़ा सा साग था, जो वह खुद खा रहा था। प्रेम के वश में होकर, उसने अपनी आधी खाई हुई रोटी का टुकड़ा बड़े चाव से गुरु जी की ओर बढ़ा दिया। गुरु साहिब, जो शहंशाहों के शहंशाह थे, उन्होंने बिना किसी संकोच के उस गरीब सिख के हाथ से वह जूठी रोटी ले ली और बड़े स्वाद से खाई। पास खड़े ऊँची जाति के कुछ सिखों को यह अच्छा नहीं लगा। उन्होंने कहा, "महाराज, आप तो गुरु हैं, आपने एक छोटी जाति के सिख का जूठा भोजन क्यों खाया?" गुरु जी ने मुस्कुराकर जवाब दिया, "सिक्खों, तुमने सिर्फ 'जूठ' देखी है, लेकिन मैंने इसमें भरा हुआ 'प्रेम' देखा है। जो स्वाद मुझे इस प्रेम भरी सूखी रोटी में आया है, वह राजसी पकवानों में भी नहीं है। मेरे दरबार में कोई छोटा या बड़ा नहीं है, यहाँ सिर्फ प्रेम की कद्र है।" यह घटना बताती है कि गुरु साहिब ने कैसे समाज की रूढ़ियों को तोड़कर सबको गले लगाया था।
