शीर्षक: सवा लाख से एक लड़ाऊँ
शीर्षक: सवा लाख से एक लड़ाऊँ
शीर्षक: सवा लाख से एक लड़ाऊँ चमकौर के युद्ध का वह मंजर दुनिया के इतिहास में बेमिसाल है। एक तरफ मुगल बादशाह औरंगजेब की 10 लाख की विशाल फौज थी और दूसरी तरफ गुरु गोबिंद सिंह जी के साथ मात्र 40 भूखे-प्यासे सिख। दुनिया की कोई भी सेना ऐसी स्थिति में हार मान लेती, लेकिन गुरु साहिब ने अपने सिखों के भीतर वह जज्बा भरा कि मौत भी उनसे खौफ खाने लगी। गुरु जी ने ऊँची पहाड़ी से ललकार कर कहा था— "चिड़ियों से मैं बाज लड़ाऊँ, गीदड़ों को मैं शेर बनाऊँ, सवा लाख से एक लड़ाऊँ, तबै गोबिंद सिंह नाम कहाऊँ।" उस दिन चमकौर की कच्ची गढ़ी में गुरु साहिब ने अपने दो बड़े साहबजादों, बाबा अजीत सिंह और बाबा जुझार सिंह को अपने हाथों से शस्त्र सजाकर जंग के मैदान में भेजा। उन्होंने अपनी आँखों के सामने अपने जिगर के टुकड़ों को शहीद होते देखा, लेकिन उनके चेहरे पर एक शिकन तक नहीं थी। उन्होंने साबित कर दिया कि जब धर्म और हक की बात आती है, तो एक सच्चा गुरु अपने बच्चों का बलिदान देने में भी पीछे नहीं हटता। यही वह वीरता थी जिसने मुगलों के अहंकार को मिट्टी में मिला दिया और खालसा पंथ को अमर कर दिया
