शीर्षक: अनमोल पारस
शीर्षक: अनमोल पारस
शीर्षक: अनमोल पारस एक बार एक धनी व्यापारी श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के दरबार में पहुँचा। वह अपने साथ एक अत्यंत दुर्लभ 'पारस पत्थर' लेकर आया था, जिसके बारे में विख्यात था कि उसके स्पर्श मात्र से साधारण लोहा भी कुंदन बन जाता है। व्यापारी के मन में इस बात का सूक्ष्म अहंकार था कि वह गुरु चरणों में दुनिया की सबसे कीमती वस्तु भेंट कर रहा है। उसने बड़े गर्व से वह पत्थर गुरु जी को अर्पित किया। गुरु साहिब उस समय यमुना नदी के किनारे विराजमान थे। उन्होंने उस पत्थर को हाथ में लिया और बिना किसी मोह के उसे उफनती हुई नदी की लहरों में फेंक दिया। व्यापारी यह देख कर सन्न रह गया। वह व्याकुल होकर चिल्लाया, "महाराज! आपने यह क्या किया? वह पत्थर बेशकीमती था, उसे पाना अब असंभव है!" गुरु जी ने शांत भाव से कहा, "अगर तुम्हें उस पत्थर से इतना ही मोह है, तो जाकर उसे निकाल लो।" व्यापारी तुरंत नदी में कूद गया। उसने घंटों गोते लगाए, सैकड़ों पत्थर टटोले, पर वह विशेष पत्थर उसे कहीं नहीं मिला। वह हताश होकर बाहर आया और रोते हुए बोला, "महाराज, नदी की गहराइयों में हज़ारों पत्थर एक जैसे दिख रहे हैं, मैं उसे कैसे पहचानूँ?" तब दशमेश पिता मुस्कुराए और उन्होंने स्वयं अपना हाथ नदी के जल में डाला। जब उन्होंने मुट्ठी बाहर निकाली, तो उसमें एक पत्थर था। गुरु जी ने उसे व्यापारी की ओर फेंकते हुए कहा, "क्या यही था तुम्हारा पत्थर?" व्यापारी ने उसे छुआ तो वह सचमुच पारस था। लेकिन जैसे ही उसने नदी के किनारे नज़र डाली, वह फटी आँखों से देखता रह गया। गुरु जी के स्पर्श से नदी के किनारे पड़े हज़ारों साधारण पत्थर पारस बन चुके थे। गुरु जी ने बड़े धीमे और गहरे स्वर में समझाया, "सिक्ख, तू पत्थर के टुकड़े को कीमती समझ रहा था, जबकि असली पारस तो 'गुरु की दृष्टि' और 'परमात्मा का नाम' है। जो पत्थर को सोना बना दे वह पारस छोटा है, जो इंसान के मन को कंचन बना दे और उसे अहंकार से मुक्त कर दे, वही सच्चा पारस है।" व्यापारी का मस्तक गुरु चरणों में झुक गया; उसकी अक्ल के साथ-साथ उसका जीवन भी सोना बन चुका था। टैग्स:
