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Anita Bhardwaj

Inspirational


5.0  

Anita Bhardwaj

Inspirational


शहीद की पत्नी

शहीद की पत्नी

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"जो अपने देश के लिए शहीद हो गया; ताकि उसके देश के लोग आबाद रहे! सुरक्षित रहकर अपने त्योहार, खुशियां मनाएं। उनके जीवन में खुशियों के रंग भरें रहें! फिर उसकी पत्नी के जीवन के रंग क्यों छीने जाए! ये मेरे बेटे की अमानत है; मैं नही मानती इस स्वार्थी दुनिया के रिवाजों को!" - राखी जी ने अपनी पडोसन को कहा।

राखी जी का इकलौता बेटा राहुल आर्मी में था। 25 साल की उम्र में ही शहीद हो गया।अभी पिछले बरस ही तो राहुल की शादी 23 वर्षीय मालती से हुई थी।दोनो साथ साथ शिमला घूमने गए।अभी दोनो खुद भी बच्चे ही तो थे।आते वक्त सबके लिए तोहफे लेकर आए।उनको देखकर राखी जी हमेशा यही कहती -"ईश्वर मेरे बच्चों को बुरी नजर से बचाए।तुम्हारे कारण तो इस घर में खुशियों के रंग खिले हैं।"शादी के बाद पहली होली आई।दोनों ने जमकर एक दूसरे को रंग लगाया।शाम को खूब पकवान बने।राखी जी ने अपने हाथों से बेटे के लिए गुझिया बनाई। बेटे को 2 दिन बाद फिर से ड्यूटी पर जाना था इसलिए सारी चीजें पैक करके रखी।

2 दिन बाद राहुल के जाने का वक्त भी आ ही गया।मां, बेटा, मालती सब बस ऊपरी मुस्कान लिए हुए थे।आंखों पर आंसू अटके हुए थे, गले में शब्द अटके हुए थे।दोनों सास बहू रास्ते में ले जाने के लिए खाना बना रही थी।और आज दोनो ही चुप रहकर एक दूसरे से अपने आंसू छुपा रही थी।राहुल तैयार हो चुका था कुछ देर बाद स्टेशन के लिए रवाना होना था।राहुल को मालती से आखिरी बार बात करनी थी पर किचन में मां भी तो उसे थोडा असहज लगा ।

इसलिए मालती को जुराबें न मिलने के बहाने से आवाज़ लगाई।

मालती अंदर गई तो उसे पीछे से बाहों में जकड़ लिया और कहा -"तुम तो बड़ी ही सख्त दिल हो ।पति जा रहा है और घर के कामों में लगी हो।मिल ही लो थोड़ी देर।क्या पता ये मुलाकात आखिरी हो।"

मालती ने ये सुनते ही गुस्से में राहुल के हाथों से छूटकर; अपने हाथों को राहुल के होठों पर रखा और कहा-"आइंदा ऐसी बात बोली तो तुमसे पहले मैं मर जाऊंगी! ये कहते हुए उसकी आंखों में आंसू आ गए।"

राहुल ने अपने कान पकड़कर कहा -" "अरे यार माफ कर दो।मस्ती कर रहा था।तुम्हे रोता हुआ नही देख सकता मैं।"

मालती क्या बताती की ये आंसू तो तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारी कमी महसूस होने के डर के आंसू है।वो उसके गले लग गई।राहुल ने उसे समझाया की एक सैनिक की पत्नी होना आसान नहीं है।सैनिक सरहद पर संघर्ष करता है और उसकी पत्नी घर पर तपस्या।तुम मेरा इंतजार करना।मां को भी कोई साथी मिल जाएगा वरना मेरे बाद वो भी यूंही अकेली होकर रोने लग जाती थी।अपनी आगे की पढ़ाई पर ध्यान देना ।3 महीने बाद फिर से आ जाऊंगा।ये कहकर उसने मालती के माथे को चूमा।


फिर मां से विदाई लेने का समय आया।मां तो अपने बेटे को गले लगा बच्चों सी बिलख कर रो पड़ी।राहुल ने मां को भी समझाया -" देखो।अब तो मां आप अकेली नहीं हो।मालती है।आप दोनो एक दूसरे का ध्यान रखना।मैं फोन करता रहूंगा।"


मालती ने भी मां जी को हौंसला दिया।फिर पिताजी से आशीर्वाद लिया!पिता को तो रोने का हक भी नही दिया इस दुनिया ने।इसलिए बस बेटे के सिर पर हाथ ही रखा और अपने आंसू छुपा लिए।राहुल को छोड़ने स्टेशन तक गए।दोनो सास बहू अब उसकी बातें करके ही वक्त बिताती। इसी बीच पता चला की मालती उम्मीद से है।राखी जी की तो खुशी का ठिकाना ही ना रहा।राहुल को फोन करके खुशखबरी सुनाई।राहुल ने भी कहा मां जल्दी ही आने की कोशिश करूंगा।


कुछ रोज बाद राहुल के कैंप पर किसी हमले की खबर आई।दोनो सास बहू परेशान हुई।फोन किया तो कोई जवाब नही मिला।फिर तो दोनो के हाथ पैर ठंडे पड़ने लगे।बस भगवान के सामने हाथ जोड़कर बैठ गई की सब सही सलामत हो।फिर फोन की घंटी बजी, दोनो में से किसी की भी हिम्मत नही हो रही थी की फोन उठाए पर राहुल की भी तो खैरियत जाननी थी।फोन पर पता चला की राहुल शहीद हो गया ।!


राखी जी के हाथ से फोन छूटा तो मालती को सब अंदाजा हो गया।मां को संभालते हुई बोली -" मां जी क्या हुआ।"राखी जी के मुंह से बस चीख निकली।

" मेरा आंचल सुना कर गया।अपने आने का वादा तोड़ गया।"

बस ये सुनते ही मालती बेहोश हो गई।राखी जी बेटे को खो चुकी थी और बहु और आने वाले बच्चे को भी यूं देखा तो हिम्मत जुटाई।पड़ोस के लोगों को बुलाया, राहुल के पिता जी को फोन किया , मालती के घर फोन किया।कुछ लोग मिलकर उसे अस्पताल ले गए।अगले दिन राहुल का पार्थिव शरीर भी आ पहुंचा।पूरे शहर से लोग शामिल हुए।अंतिम दर्शन के लिए मालती को लाया गया, तो पति का मुस्कुराता चेहरा देखकर बच्चों सी बिलख पड़ी।


साथ खड़ी औरतों ने एक दूसरे को इशारा किया , इसका पल्लू ठीक करो ।घूंघट निकाल दो।शहर के बड़े बूढ़े भी हैं।संभालो इसको।इसकी चूड़ियां भी उतरवाने की रस्म अदा करो।अपनी कलाई को सुने होते देख वो और भी बिलख पड़ी और बेहोश हो गई।मालती की माता जी उसके साथ हॉस्पिटल गई।

हर तरफ रोने, बिलखने की आवाजें। 3 बिखरी हुई जिंदगियां और एक वो नन्ही जान जिसके दुनिया में आने से पहले ही बाप का साया उठ गया।


मालती की ऐसी हालत देख उसकी मां ने पिताजी से कहा -" इतनी सी उम्र में बेटी पर ये दुखों का पहाड़ देखा नही जा रहा।क्यों न हम अपनी बेटी की दोबारा शादी करवा दें।"मालती ये सब सुन रही थी; मालती ने कहा -" मां तुम ही मां हो क्या इस दुनिया में।जिसका बेटा गया वो भी तो मां है।अब उसकी बहू और उसके बेटे के बच्चे को भी अलग कर दोगी क्या तुम।इतनी स्वार्थी न बनो मां।राहुल का अंश है मेरे गर्भ में।और मैं कोई दूसरी शादी नही करूंगी।"


मां -" बेटा।जिंदगी बहुत बड़ी है।अभी तू दुखी है अभी नहीं समझेगी।कैस काटेगी ये जिंदगी।कैसे पालेगी बच्चे को।"मालती -" मां ।पाल लूंगी।इसके दादा दादी हैं। राहुल ने मुझे इस लायक बनाया है की नौकरी कर लूं।मां मुझे भी अपने बच्चे के पास रहने दो, ये जुल्म न करो!"

मालती की ज़िद्द के आगे उसके मां बाप भी कुछ न कर सके।राखी जी बहू को घर ले गईं अब बहू और आने वाला बच्चा ही तो आस थी उनके जीवन की।


राखी जी , मालती के पास ही सोने लगी उन्हें एहसास था की इस वक्त में यूं रोएगी और नींद भी पूरी नहीं लेगी तो बच्चे और मां दोनों पर असर पड़ेगा।

वो मालती को यही समझाती की मेरा बेटा कहीं नही गया है, तू उसे प्यार करती है तो अपनी नन्ही जान के लिए अपना ध्यान रख वो तेरे अंदर ही है।

बहू को यूं समझा बुझाकर खाना खिलाती फिर खुद किसी कोने में रोकर मन हल्का करती।


कुछ महीनो बाद मालती के प्रसव का वक्त आ ही गया।दर्द से कराहते हुए भी उसके मुंह से निकला -" राहुल मुझे बचाओ।"और वो नन्ही सी जान दुनिया में आई, उसको देखकर मालती रोने लगी ।डॉक्टर ने मालती को कहा की अभी तुम्हारी हालत ठीक नहीं, खुद को संभालो वर्ना बच्चे को तुम्हारे साथ वार्ड में शिफ्ट नही कर पाएंगे।मालती ने अपने आंसू पोंछे, बच्चे को चूमा।


फिर राखी जी को वार्ड में बुलाया, बेटे की संतान को देख सीने से लगा रोने लगी।अपना छोटा राहुल उसे मिल गया था, जिसके लिए 9 महीने से दिन रात दुआ कर रही थी।फिर बच्चे को मालती के पास लिटाकर उन दोनो की नजर उतारने लगी।


बच्चे को घर लाया गया।पड़ोस के लोग बधाई देने तो आए साथ ही साथ अपनी कड़वी बातों का घूंट भी पिला गए -" जीजी बहू की उम्र ही क्या है।पोता ले लो।और ब्याह दो इसे।भरी जवानी सफेद लिबास में कैसे निकालेगी।"राखी जी को उनके ये शब्द दिल पर खंजर से लगे।


उनके सामने से मिठाई हटाकर बोली -"कौन कह रहा है की मेरी बहु सफेद लिबास में ही रहेगी।मेरा बेटा देश के लिए शहीद हुआ है। जिंदा है वो अपनी मिट्टी की हवाओं में, अपनी मां के दिल में, अपनी पत्नी के प्यार में।तुम्हारे जैसे लोग अपने त्योहार मना पाएं इसलिए शहीद हुआ, तो क्या उसके बीवी बच्चों को त्योहार मानने का हक नही।नही पहनेगी मेरी बहू सफेद लिबास।उसका बच्चा नए रंग साथ लाया है।इस होली मेरे पोते का मुंडन है, और होली के रंग भी खेलूंगी अपनी बहू और पोते के साथ।जिसको हमारी खुशी में शामिल होना है वो आ जाना, वर्ना अपनी ये कड़वी बातें अपने साथ ले जाओ।

ये कहकर राखी जी मिठाई की प्लेट अंदर ले गई।


कुछ औरतें तो मुंह सिकोड़ कर चली गई, कुछ ने हाथ जोड़कर माफी मांगी ।मालती भी सब सुन रही थी, उसे गर्व हुआ की राहुल की मां भी उसके लिए राहुल के समान सहारा है, उसकी हिम्मत है।राखी जी ने कहा माफी "मुझसे क्या मांग रही हो बहन।जिसे तुम बच्ची कह रही हो, फिर उसी बच्ची का दिल तोड़ रही हो उससे मांगो माफी तो।"

मालती ने कहा -" नही मां जी कोई बात नही।अपनी अपनी समझ है।मेरे पास जब तक आप हो मुझे क्या फिक्र है।"

सबने बेटे बहू को आशीर्वाद दिया और चली गई , 3 महिने बाद होली भी आई।राखी जी ने पोते का मुंडन करवाया, नामकरण संस्कार पर सब रिश्तदारों को बुलाया।सब बहू को रंगीन कपड़ों में देख हैरान थे पर कोई कुछ बोल नहीं पाया।विदाई के वक्त राखी जी ने आवाज़ लगाई - ला बहू जरा गुलाल तो लाना! सबके साथ ये रस्म भी हो जाए।

राखी जी ने पहले गुलाल बहु को लगाया , फिर रिश्तेदारों को।मालती की मां उनकी ये समझदारी और अपनी बेटी के लिए उनके प्रेम को देख रो पड़ी, और बेटी से माफी मांगी।बेटा।मुझे नहीं पता था की तेरी सासू मां यूं ढाल बनकर खड़ी हो जाएंगी दुनिया के सामने, वर्ना मैं दूसरी शादी की बात तक नहीं करती।मुझे माफ कर दे।


इतने में राखी जी ने आवाज लगाई, आइए समधन जी आप क्यों दूर खड़ी हैं ।फिर सबने एक दूसरे को रंग लगाया, और मालती की जिंदगी के रंग भी उसे मिल गए।दूर कहीं आसमान में राहुल की आत्मा को भी शांति मिली होगी कि मेरी शहादत के कारण मेरी पत्नी के जीवन के रंग नही ख़त्म हुए। उसको यूंही हंसती खिलखिलाती ही तो देखना चाहता था मैं।


दोस्तों।ये रंग किसी भी शहीद की पत्नी के जीवन से न छूटे।जिन्होंने देश की खुशियों के लिए जान दे दी उनके घर की खुशियां उनसे क्यों छीनी जाएं।



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