शबाब रहे...
शबाब रहे...
हुस्न -ओ-इश्क की जोड़ी कामयाब रहे
एक मयक़श हो और दूजा शराब रहे।
किसने पी कितनी किसने पिलाई कितनी
न कहीं इस का कोई हिसाब किताब रहे।
एक वो भी ज़माना था जब तुम थी बेग़म
हम भोपाल के नवाबों के नवाब रहे।
वो दिन अब तो फ़ाख़्ता हो गये हमारे
जब हम ख़ाते फ़क़त क़बाब ही क़बाब रहे।
लग न जाए नज़र ज़माने की हमें कभी
मैं बेमिसाल और तू लाज़वाब रहे।
दीदार अधूरा रहता उस वक्त जानम
रुख़सार पर हुस्न के गर हिज़ाब रहे।
ग़र मौत भी मिले तो आशिकाना ज़ख़्मी
हाथ में जाम औ पहलू में शबाब रहे।

