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Bhawna Kukreti

Drama


4.8  

Bhawna Kukreti

Drama


शायद-6

शायद-6

6 mins 643 6 mins 643

तन्वी जानती थी की रुचिर जिद पर आ जाये तो वो आगा-पीछा कुछ नही सोचता। फोन पर उसने कहा था की वो साथ वाले रेसोर्ट मे ठहरा है।उस से मिलना चाहता है, अपने बर्ताव पर शर्मिंदा है। वो हर बार वह तन्वी को मना ले जाता था मगर इस बार तन्वी ने सोच लिया था अब और नही। बहुत बेदर्दी के साथ उसपर रुचिर के चार्मिँग व्यक्तिव का एक छिपा पहलू उजागर हुआ था।

तन्वी तुरंत अपनी कोट्टेज से बाहर निकल आई। घना अन्धेरा था रेसोर्ट के स्टाफ ने लगभग सारे लैम्प बन्द कर दिये थे । सिर्फ उसके कोट्टेज, पेवमेंट की इक्का दुक्का लाईट और बोन फायर मे कुछ सुलग रहा था। मयंक सो गया था। तन्वी ने प्रियम सर के कोट्टेज की ओर देखा। सर भी शायद सो गये थे। अब क्या करे वो, क्या ऐसे ही कोई भी कभी भी रेसोर्ट मे आ सकता है।उसे याद आया की एक बार सिर्फ दोस्तों की मामूली सी बात पर रुचिर ने प्रेस्टीज इश्यू बना लिया था और रात 2 बजे जब पूरे शहर मे कर्फ्यू लगा था, चप्पे चप्पे पर पोलिस थी , वो शहर की नामी बेकरी का ताला तोड़ कर केक ले आया था ।इस बात को और उसके मेसेजेस को याद कर वो सिहर गयी। वो कोई तमाशा नही चाहती थी।और रुचिर आया तो पक्का तमाशा ही होगा।क्या करे वो ?

सामने प्रियम सर के कोट्टेज की लाईट जली।देखते ही तन्वी उस ओर भागी।प्रियम सर ने दरवाजा खोला और किसी लड़की को अपने कोट्टेज की ओर भागता आते देख वो एक पल को ठहरे, कुछ देर मे उन्हे तन्वी का चेहरा दिखने लगा। वे बाहर निकल आये। तन्वी ने प्रियम शाह को एक साँस मे सब बताया। " ओके, तो क्या हुआ? वैसे पोस्सिब्ल नही है पर अगर रुचिर आ भी जाते हैं तो आराम से बात करना।"," आप साथ रहियेगा प्लीज" तन्वी ने विनती की ," तुम कमजोर नही हो तन्वी, अपनी लड़ाई खुद लड़ सकती हो और ये तुम दोनो का पर्सनल मैटर है।चलो जाओ अपने कोट्टेज मे जाओ।"," सर?!"," हाँ , चलो जाओ , रुचिर जब आयेगे तो पहले स्टाफ तुम्हे बताएगा। जाओ अपने कोट्टेज मे रिलैक्स रहो।" तन्वी हिली नही।तब प्रियम शाह ने उसका हाथ पकडा और उसे उसके कोट्टेज तक ले आये ।" जाओ अंदर " तन्वी उनको देखती रह गयी ।प्रियम शाह ने उसकी ओर एक बार भी नही देखा और तेज कदमो से अपने कोट्टेज की ओर चल दिये।

तन्वी के कोट्टेज का फोन बजा।" हेल्लो!!" तन्वी ने धीरे से कहा। रुचिर रसेपशन पर पहुंचा हुआ था।तन्वी ने घड़ी देखी 3:10 हो रहा था ।वो बहुत हिम्मत करके धीरे-धीरे रिसेपशन की ओर बढ़ गयी।

रिसेपशन पर रुचिर दोनो हाथ जेब मे डाले दीवार पर लगी पेन्टिंग्स देख रहा था।किसी के आने की आहत सुन वो पल्टा। "तन्वी!!" कह कर वो तन्वी की ओर तेजी से बढ़ा।तन्वी ने उसे हाथ से दूर रहने का ईशारा किया। रुचिर ठहर गया , उसने नाईकी के शू, हल्की नीली शर्ट और नेवी ब्लू डेनिम पहनी थी। आस्तीन कोहनी तक चढे हुए थे। शर्ट के बीच मे लॉकेट झलक रह था। लौकेट जो दोनो ने डिज़ाइन किया था 'आरटी' तन्वी ने देखा,उसका चेहरा ठण्ड से लाल था। " सॉरी यार... प्लीज .." रुचिर बोला।तन्वी ने कहा " अब कुछ बाकी नही है रुचिर।" ," प्लीज मुझसे गलती हो गयी , तुम जानती हो उन दिनो मैं बहुत परेशान था।", तन्वी खड़े खड़े सुन रही थी " मैं नाराज भी था तुमसे फिर भी मैं तुम्हारे पास आया ....क्यूँ? सोचा कभी... ? " तन्वी की आँखे भरने लगी थी।" फिर तुम्हारे घर उस..उस.. प्रियम शाह को देख मेरा दिल जल गया था..... "," चुप करो प्लीज....और कितना बेइज्जत करोगे मुझे "," तुम...तुम फिर गलत समझ रही हो मुझे.... क्या हो गया है तुम्हे? पहले बिना कहे मेरा मन पढ लेती थी, और अब...अब मेरी बातों को ही नही समझ पा रही।" कह कर रुचिर तन्वी

के करीब आया और फिर खुद को काबू करते धीमी आवाज मे बोला "हम कहीं और बात करें ,यहां....!! " उसने स्टाफ की ओर इशारा किया।" तुम्हारे कोट्टेज मे चले प्लीज , बहुत सी बाते हैं।", तन्वी ने उसको देखा। " नहीं , यहीं बोलो जो बोलना है।"," ओके...ओके...कोई फोर्स नही , यहीं बैठते हैं" स्टाफ उन दोनो को वहाँ अकेला छोड़ कर चला गया।

रसेपशन मे बडी देर तक रुचिर कहता रहा, समझाता रहा , उसके और अपने बीच की कई उलझनो को, खट्टी मीठी यादों को दोहराता रहा, बार-बार कहता रहा की वो अपने पिछले बर्ताव के लिये बहुत शर्मिंदा है वगैरह,वगैरह। तन्वी चुपचाप सुनती रही।

सुबह के 5 बज गये थे।रिसेपशन के पास किसी के चलने की आवाज आई। प्रियम सर स्टाफ को सबके लिये चाय के लिये बोलने आये थे । रसेपशन के अंदर रुचिर-तन्वी को बैठा देखा तो वापस जाने लगे ।रुचिर ने उन्हे देखा और खडा हो गया। " गुड मॉर्निंग सर" , तन्वी ने देखा प्रियम सर रुक गये और मुस्कान के साथ बोले " गुड मॉर्निंग रुचिर जी ऐण्ड ....गुड मॉर्निंग तन्वी"," बाय रुचिर" कह कर तन्वी तेजी से अपने कोट्टेज की ओर निकल गयी।

प्रियम ने रुचिर की ओर देखा। रुचिर ने अपना बैक पैक उठाया और उसमे से एक पेकेट निकाला और प्रियम को देते हुए कहा।" सर इसे तन्वी को दे दिजीयेगा।" और वो चला गया।

प्रियम ने पैकेट को देखा उसमे एक डायरी थी। ये डायरी कुछ जानी पहचानी सी लगी।प्रियम ने दीमाग पर जोर लगाया तो उसे याद आया की ये तन्वी की डायरी थी जो उसने फोटो फ्रेम को अल्मिरा मे रखते हुए एक झलक मे कपड़ों के बीच दिखी थी। प्रियम ने कहा " सॉरी तन्वी बट ...." कह्ते हुए उसे खोला , दो चार पन्ने ही पढे फिर आँखें बन्द कर लीं और गहरी साँस ली फिर उन्होने उसे वापस पैकेट मे डाल दिया।

स्टाफ से सबके लिये चाय नाश्ते के लिये सारी डिटेल समझा कर प्रियम थोडी देर बाद ट्रे मे दो कप चाय और पैकेट ले कर तन्वी के कोट्टेज की ओर चल दिये।

तन्वी ने प्रियम के नॉक करने के कुछ देर बाद दरवाजा खोला।" आज सुबह की चाय साथ-साथ पियें डीयर ?" प्रियम सर ने कहा । तन्वी ने चुपचाप उनके हाथ से ट्रे ले ली और रुम मे टेबल पर रख दी।

चाय पीते-पीते तन्वी ने कुछ नही कहा।" पूछोगी नही की ये पैकेट मे क्या है ?" प्रियम सर ने चाय खत्म करते हुए कहा।" जी, क्या है?" " देखना तुम्हारा ही कुछ समान है, रुचिर तुम्हे देने को कह गये हैं।"," क्या है?" ," तुम देखो फिर मन करे तो तैयार हो जाना आज सबको झरने के पास ले चलूंगा, अच्छी जगह है।"," ओके सर"

प्रियम सर के जाने के बाद तन्वी ने पैकेट खोला।अपनी डायरी देख कर हैरान रह गयी।उसे याद आया की उसके रुम की एक चाभी उसने कभी रुचिर को दी थी।

" और मैडम... कैसी कटी रात?" मयंक चहकता हुआ दरवाजे पर था।तन्वी ने डायरी अपने पीछे छिपा ली।" अरे तेरी...अकेले अकेले चाय भी पी डाली , और ये दूसरा कप? "," प्लीज मयंक अभी जाओ तुम"," क्या हुआ मैडम? कल से मुझे भगा रही हो?! " कह कर वो तन्वी के पास बैड पर बैठ गया। तन्वी उठ गयी।" सर ने कहा है की आज वो सबको झरने पर ले चलेंगे, जाओ रेडी हो जाओ"," वाव, ओके जी" कह कर वह सीधा रुम से बाहर चला गया।

तन्वी ने डायरी को कबबर्ड मे रखा और रेडी होने चली गयी।

सब रेडी थे सिर्फ तन्वी नही पहुँची थी।प्रियम सर ने घड़ी देखी और कहा " शायद तन्वी नही चलेंगी, लेट्स मूव" और सब रेसोर्ट के गाइड के साथ जंगल मे चले गये।

तन्वी हल्के बादामी सूट में बाहर आई ..कोई नही दिखा ।उसने स्टाफ से पूछा पता चला सब जंगल के बीच झरने को चले गये हैं। उसने झरने का रस्ता पूछा और चल दी।


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