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Anita Sharma

Drama


5.0  

Anita Sharma

Drama


सड़क किनारे बैठा वो संगीतज्ञ

सड़क किनारे बैठा वो संगीतज्ञ

10 mins 443 10 mins 443

जब भी उस रास्ते से गुज़रती अक्सर नज़रें उस बुज़ुर्ग पर ठहर जाती थी। देखने मैं तो अच्छे खासे किसी संभ्रांत परिवार के लगते थे लेकिन जाने किन हालातों के मारे थे जो किसी बंद पड़े एक रेस्तरां के आगे डेरा जमाये हुए थे।कद काठी भी अच्छी थी कपडे पुराने ज़रूर थे लेकिन महंगे लगते थे, हाथ मैं गिटार पकडे और हाँ अक्सर वहीं एक धुन बजाते मैं उनको पाती थी। पास ही बिस्तरकस जैसा कुछ था।एक छोटी सी बाल्टी और पानी की एक बोतल 'बस यही कुछ सामान उनके आसपास दिखता था।

अब आप ये सोच रहे होंगे की आखिर मेरा क्या लेना देना,'लेकिन शुरू से ही मेरी जिज्ञासु प्रवृत्ति रही है, और हर अलग सी बात मुझे बरबस अपनी ओर खींचती है।बस यही वजह थी मैं अक्सर सोचती थी की कभी ज़रूर उनसे बात करुँगी हमेशा मैं मैं कोतुहल पैदा होता रहता था,आखिर क्या है इस धुन का राज ?

बड़ा दर्द था उन तरंगो मैं, कुछ तो ख़ास था।एक दिन रोज़ की तरह सैर पर निकली तो चलते चलते उसी बाज़ार की तरफ पहुँच गयी थी। अचानक वहीं धुन मेरे कानों मैं पड़ी तो ध्यान उधर की तरफ ही खींचा चला गया।अब तो मैं रुक नहीं पायी और सीधे उसी तरफ चल पड़ी।मैंने ठान लिया था आज कुछ भी हो जानकर ही रहूंगी।कुछ तो दर्द भरा है इनके जीवन मैं। कुछ हिम्मत करके मैं उधर की ओर बढ़ गयी।

बस फिर क्या था ठीक सामने पहुँच कर मैंने उनको पुकारा बाबाजी...ओ बाबाजी लेकिन कोई हलचल नहीं हुई वो आँखें मूँदे जाने किन ख़यालों मैं ग़ुम अपनी धुन बजाते रहे, जैसे उनको कुछ सुनाई ही नहीं दिया हो, अब तो मुझसे रहा नहीं गया मैं आगे बढ़ कर उनके पास पहुँच गयी मैंने उनके कंधे पर हाथ रख कर उनको हिला दिया। एक दम से मुझे लगा जैसे वो बुरी तरह चौंक गए थे। उनकी खुली आँखें ऐसे लग रही थी मानो कितनी लम्बी नींद से जागा हो कोई !

सच कहूं तो पथरा गयी थी आँखें,धीरे धीरे पलके उठाते हुए अपनी गर्दन मेरी तरफ घुमाई बस एक शब्द मुँह से निकला भारी सी आवाज़ मैं 'हम्म्म्म' इससे पहले की वो मग्न होते मैंने उन्हें टोका बाबाजी आपसे कुछ पूछ सकती हूँ। उन्होंने अपनी भौहों की ऊपर उठाया ।

कुछ पल लिए रुके और बोले,"हाँ बोलो बेटी " उनके मुँह से बेटी सुनते ही बस मेरी तो हिम्मत बढ़ गयी थी।बस फिर क्या था मैंने जो भी सवाल मेरे मन थे उनको बोल दिए,"यूँ कहिये सवाल की झड़ी लगा दी थी। हाँ एक और बात ख़ास थी उनका बिस्तरकस,जानते है अंग्रेजी मैं कुछ लिखा था बड़ा अजीब सा कुछ। ख़ैर मैंने सोचा पहले वो जान लूँ जो मुझे जानना है।पहले तो बड़ी ज़ोर से हँस पड़े। लेकिन दो पल मैं ही उनकी आँखें भीग गईं, रुँधी हुई आवाज़ मैं बोले इंतज़ार !बस इंतज़ार !मरते दम तक। मेरी खामोशी टूट गयी मैंने तुरंत पूछा,"आखिर किसका,और क्यूँ, मेरी तरफ देखकर बाबाजी बे जवाब दिया।क्या करेगी जानकर ? फिर क्या था मैं पीछे ही पड़ गयी थी उनके। नहीं आप बताओ में उनसे बोली बहुत दर्द है आपकी धुन में। बहुत यादें छुपी है शायद। मेरे ऐसा कहते ही ना जाने उनको क्या लगा आखिर उनकी चुप्पी टूट ही गयी। मैं वहीं बैठ कर सुनने लगी। बाबाजी ने बताना शुरू किया : बात उन दिनों की है जब मैं कॉलेज मैं पड़ता था बहुत संभ्रांत परिवार से नाता है मेरा।पिताजी इस शहर में जाने माने व्यापारी रहे हैं।

हालांकि अब सब यहाँ से जा चुके हैं, आगे बढ़ते हुए थोड़ा सा मुस्कुराये, अच्छा तो लगा लेकिन मैं कुछ बोली नहीं,बस उस वक़्त सुनने का मन था . वो आगे बोलने लगे यहाँ में सबसे बढ़िया कॉलेज मैं शिक्षा ली है मैंने।वहीं एक लड़की भी मेरे साथ पढ़ती थी बला की सुन्दर थी वो।मेरी गायिकी की दीवानी हुआ करती थी हम दोनों में गहरी मित्रता थी।और ये जो धुन में बजाता रहता हूँ ना वो उसको बेहद पसंद थी।वो बाबाजी बोले, मैं खो सी गयी थी।दिल अंदर से रोने को कर रहा था लेकिन मैंने खुद को रोके रखा था। मैंने हामी भरते हुए सर हिला दिया और कहा आप बहुत सुँदर बजाते हो। सुनकर बाबाजी थोड़ा मुस्कुराने लगे और फिर आगे बोलने लगे,ये वही रेस्तराँ है बेटी जहाँ हम अक्सर मिलते थे।

उन्होंने ऊपर लगे एक पुराने से तख्ते की ओर इशारा किया।लेकिन शायद वो जगह बंद हो चुकी थी। मैं कुछ पूछती इससे पहले ही वो आगे बढ़ गए और बोले कि एक हादसे के बाद से ये बंद हो गया था वो मेरी हंसती खेलती ज़िन्दगी का भी आखिर दिन था, बार बार उनका गुमसुम हो जाना बहुत दुखदायी लग रहा था। ख़ैर फिर मैंने पूछा आपकी कॉलेज कि पढ़ाई के बाद क्या हुआ आपकी ज़िन्दगी में ऐसा ?

जब में पूछ रही थी ऐसा लगा मानो वो कुछ नहीं कहना चाहते लेकिन फिर एक लम्बी सांस खींचते हुए बोले,कॉलेज कि पढ़ाई के बाद पिताजी के काम में भी हाथ बटाना शुरू कर दिया था।और मेरी दोस्त भी किसी विद्यालय में शिक्षिका के तौर पर लग गयी थी। जानती हो फिर भी हम मिलते रहते थे, बस कुछ समय बीता घर में विवाह की बात चलने लगी थी, लेकिन में उसकी तरफ से ध्यान नहीं हटा पा रहा था, तो मेरे दिल में आया कि कुछ भी हो मुझे अपने दिल की बात उसको बता देनी चाहिए, बस फिर क्या था मैंने मन ही मन विचार बना डाला और यहीं इस जगह पर मिलने का सोचा जहाँ हम पहली बार आए थे साथ ही उसके लिए कुछ ऐसा करने का विचार आया जो सो अक्सर मुझसे बोलती रहती थी।अंदाज़न कहूँ तो शायद हम हर बात एक दूसरे को बताते थे तो मुझे उसकी हर ख्वाइश पता थी, मैंने तय तारीख पर उससे मिलने को कहा,वो बार बार पूछती रही फिर भी मैंने उसको नहीं बताया क्यूंकि सच पूछो तो मैं उसके लिए सो सब कुछ करना चाहता था उसके चेहरे कि वो ख़ुशी देखना चाहता था। कहते हुए उनका गला फिर से रुंध गया, मैंने उससे कुछ नहीं कहा बस मिलने को कह दिया। बहुत हँसी थी मेरे ऊपर वो,जानती हो वो आखरी पल था जब उसके हँसते खिलखिलाते चेहरे को मैंने देखा था सो दिन भी करीब आ गया था मैंने कुछ तोहफे खरीदे थे उसकी पसंद के।

मैंने पूछा क्या हुआ फिर वो नहीं आयीं थीं आपसे मिलने क्या वादा तोड़ दिया उन्होंने ? सुनकर उन्होंने तपाक से जवाब दिया मुझे उस वक़्त!!!नहीं ! यही तो बात थीं उसमें जो उसको ख़ास बनाती थीं।शायद ही उसने कभी किसी का दिल दुखाया हो वो बहुत प्यारी थी।कहकर वो आगे बोलने लगे,वो दिन भी आया जब हम दोनों मिलने वाले थे।मैं बहुत खुश था कि आज मेरे दिल की बात उसको बता दूँगा। मैं पूरी तैयारी के साथ निकलने ही वाला था की पिताजी ने आवाज़ लगा कर अपने पास बुलाया।हाथ में कुछ काग़ज़ थमाते हुए बोले ज़रा इनको दफ्तर तक पहुँचा देना और काम इतना ज़रूरी था कि में मना नहीं कर पाया।मन में यहीं था कि जल्दी से काम ख़त्म करके मैं सीधे निकल जाऊँगा।दो तीन घण्टे थे मेरे पास तो मुझे उस वक़्त लगा कि में तय समय पर पहुंच जाऊँगा।कहते अपने दिल को थपथपाने लगे जैसे लगा मानों किस ग्लानि में डूब गए हों।उनके चेहरे वो दर्द साफ़ झलक रहा था अब । मैंने उनको पानी पिलाया,थोड़ा सँभालते हुए खुद को बाबाजी फिर बताने लगे,बेटी उस दिन समय ने भी खेल खेला था शायद मेरे साथ। मुझे निकलने में कोई दो घण्टे कि देरी लगभग हो गयी थी। जानती हों उस दिन मैं देर से बिल्कुल भी नहीं पहुँचना चाहता था।लेकिन काम में फँसने में कारण देरी हो तो गयी ही थी।

मन परेशान भी था आज उसको मैंने कितना इंतज़ार कराया है, क्या सोच रही होगी वो ? जाने कैसे कैसे ख़याल मन को परेशान कर रहे थे। इसी उधेड़ बुन में आखिर में अपनी मंज़िल तक पहुंच हों गया,क्या बताऊँ कितना खुश था मैं। थोड़ा अटपटा लगा लेकिन मैंने देखा रोज़ की तरह वहां कुछ अलग सा माहौल था।ज़्यादा भीड़भाड़ का इलाका नहीं हुआ करता था ये।लेकिन उस दिन इतनी भीड़ देख कर में सोच में ज़रूर पड़ गया। बस सब कुछ नज़रअंदाज़ करके मैं गाड़ी खड़ी करके रेस्त्रां की तरफ़ बड़ा तो मुझे किसी नए रुकने का इशारा किया बस यहीं एक तरफ़ में खड़ा हो गया।दिमाग में ये भी चल रहा था आखिर हुआ क्या है ? थोड़ी देर बीतने पर मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने पास खड़े एक शख्श से पूछ ही लिया कि वहां क्या हुआ है ? क्यूंकि कहीं न कहीं मुझे ये भी लग रहा था कि मेरी दोस्त भी तो अंदर मेरा इंतज़ार कर रही होगी।

मुझे उससे मिलना था क्यूंकि में पहले ही देर कर चुका था शाम भी ढलने को थी मुझे उसकी चिंता भी हो रही थी।जानती हो खुद को ही कोस रहा था कि आज ही के दिन मैंने उसको इंतज़ार करवाया।बोलते ही वो सर को झुका कर बैठ गए। शांत हो गए थे बिल्कुल,मैंने उन्हें फिर ढाँढस बँधाया और समझाया आज आप कह दोगे तो मन का शायद भार कुछ कम हों जाए। मेरा इतना कहना था कि वो अपने माथे को ठोकने लगे।में नहीं जानता था कि वो दिन इतना काला हों जाएगा मेरे लिए बेटी,जानती हों जब उस शख्श ने मुझे क्या बताया ? उसने कहा किसी लड़की कि हत्या हो गयी है अंदर जाने के लिए इसलिए मनाही है।कुछ लड़कों में मिलकर उसके साथ छेड़खानी की कोशिश की थी।उसके विरोध करने पर ही शायद उन लड़कों ने उस पर हमला कर दिया और उस लड़की को मार डाला, मेरे पैरों तले ज़मीन नहीं रही थी बेटी उस वक़्त।

दिल बार बार कह रहा था वो नहीं होगी, जाने कैसे कैसे खुद को बहलाने लगा था मैं। कहते कहते अचानक वो चीखने लगे Iजाने कितने वर्षों का वो सैलाब था उनकी आँखों से बहने लगा।बड़ा ही करुण क्रंदन था।जिसने मेरे दिल को झकझोर के रख दिया था मेरी रूह काँप गयी थी। रोते रोते वो फिर बोलने लगे।बेटी मैं ये सब सोच ही रहा था कि इतने में कुछ लोग,"वो लड़की जिसकी हत्या हो गयी थी",को लेकर बाहर आये।मैं उसी तरफ़ भागा,बस ये देखने के लिए कि किसके साथ ये सब हुआ, मैं जैसे ही उधर पहुंचा देखकर मैं स्तब्ध रह गया,"वो और कोई नहीं मेरा प्यार,मेरी प्यारी दोस्त ही थी,उसी का बेजान शरीर मेरे सामने से ले जाया जा रहा था।


मैं क्या कर बैठा था ? मैंने क्यूँ उसको बुलाया ? चीखते हुए वो कभी अपनी छाती तो कभी अपने पैरों को पटक रहे थे।सच कहूं तो कभी किसी को इस तरह नहीं देखा था। मैंने उनको जैसे तैसे रोका और माफ़ी मांगते हुए कहा,मुझे माफ़ कर दीजिये शायद मेरी वजह से आज आपको इतना कष्ट हुआ है।मुझे नहीं पता था आपके जीवन में ऐसी कोई घटना हुई।मैंने बेवजह ही आपको परेशान कर दिया। मैं हाथ जोड़कर उठने को हुई ही थी कि बाबाजी ने मुझे दो पल और रुकने को कहा बेटी माफ़ी ना मांगो! जानती हो बहुत दिल करता था किसी से मन कि बात कहूं लेकिन नहीं कह सकता था।

उस हादसे के बाद मैं बेसुद सा हों गया था शायद यहाँ से उठा ही नहीं उस हादसे में बाद। कई बार माँ पिताजी समझाने भी आये लेकिन कभी यहाँ से उठ ही नहीं पाया।माँ पिताजी शहर छोड़ कर चले गए बदनामी के डर से अपनी आँखों के सामने इस रेस्त्रां को बंद होते देखा, सब जैसे उस दिन ही ठहर गया था मेरे लिए।ये जो बिस्तरकस देख रही हो असल में इसमें वो तोहफ़े हैं जो मैं उसको देने में लिए लाया था।जानती हों एक एक उसकी पसंद की चीज़ें खरीदीं थी मैंने।इसमें उन यादों का दर्द है जो बनने से पहले ही मिट गयीं। और तुम पूछ रही थी कि ऐसा क्यों लिखा है इस पर,"आपको बताऊँ कुछ अंग्रेजी में अंकित था उसमें 'हेल टेक मी अवे ' बताते हुए वो बोले बहुत दर्द और तकलीफ भरा था वो पल इसलिए उसकी पसंदीदा चीज़ों को बंद करके ये अंकित कर दिया, में उस दिन के बाद यहाँ से कभी नहीं उठा। यही सोचकर न जाने कब उसकी रूह मुझे पुकार ले ? रात दिन आँखें मूँदे बस उसको ही सोचकर ये धुन बजाता हूँ।जानता हूँ वो आसपास ही है मेरे,जब भी आँखें बंद करता हूँ बस वो मेरे पास आ जाती है घंटो सुनाता हूँ उसको ये धुन,बस इसलिए करता रहता हूँ मैं उसका इंतज़ार !

कहते कहते वो फिर से अपनी आँखें बंद कर उंगलियां गिटार पर चलाने लगे और उसी धुन में मग्न हों गए।और मैं पूरी तरह मूक हो चुकी थी। स्तब्ध सी में उठ कर घर को रवाना हों गयी।ऐसा लग रहा था मानों दिमाग सुन्न हों चला है। आज कौतुहल तो मन का शांत हो गया था लेकिन जाने कितने सवाल और खड़े कर दिए थे उनकी कहानी ने, आखिर एक अधूरा प्रेम किसी के जीवन को भी इस तरह बदल सकता है ? कोई इस तरह भी खुद को फना कर सकता है ? शायद एक तरफ़ा प्रेम ही तो था लेकिन एक अच्छे खासे व्यक्तित्व को एकांत दे गया,इतना दर्द उसके जीवन में भर गया कि संभ्रांत परिवार का वो लड़का एक सड़क किनारे बैठा संगीतकार बन कर रह गया था। यही थी उस बुज़ुर्ग के दर्द भरे संगीत में छुपी कहानी।


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