सबसे बड़ो रुपियो.
सबसे बड़ो रुपियो.
सबसे बड़ो रुपियो.
“मख्खीमल बाप – मधुमल दीकरो”
नया साल रो स्नेह-मिलन थ्यो। गाम रो चौक सज गयो। ढोल-नगाड़ा बाजा, मिठाई री खुशबू अ फटाका री आवाजा गाम ने गूंजावै लागी।
👴 मख्खीमल बाप – गाम रो सबसे धनी सेठ। हर साल नया साल आवै तो रुपिया री तागत देखावै।
👦 मधुमल दीकरो – शहर में पढ़्यो-लिख्यो, अब गाम आव्यो। मन में ठाण्यो कि बाप री रुपिया वाली सोच ने व्यंग में हिलावै।
प्रसंग
मख्खीमल बाप मंच पर चढ़्यो अ बोल्यो—
“भाइयो-बहनो! रुपिया बिना आदमी अधूरो है।
रुपिया होवे तो इज्जत, रुपिया होवे तो स्नेह,
अ रुपिया होवे तो दुनिया सलाम करे।”
भीड़ हाँ-हाँ करै लागी।
इतरे में मधुमल दीकरो हँसतो-हँसतो आगे आयो अ बोल्यो—
“बापजी! आप तो मख्खीमल हो—सबसे मोटो रुपियो।
अ मैं मधुमल—नाणो रुपियो।
पर नाणो रुपियो बिना मोटो रुपियो भी चलै कोनी।”
भीड़ में तालियाँ गूँज ग्या।
एक बुजुर्ग व्यंग में बोल्यो—
“साच्चो है रे! मधुमल रुपियो नाणो सही,
पर मख्खीमल बिना मधुमल री मिठास कोनी।”
व्यंग
स्नेह-मिलन धीरे-धीरे रुपिया री होड़ में बदल गयो।
मिठाई खावण वालो बोल्यो—
“ई मिठाई मख्खीमल रो रुपिया वाली है कि मधुमल रो?”
फटाका देखण वालो हँसके बोल्यो—
“मख्खीमल रो रुपियो तो आसमान में चमक गयो,
मधुमल रो रुपियो तो धुंवा में गुम गयो!”
हँसी-मजाक में नया साल कट गयो।
ट्विस्ट
कार्यक्रम खतम थ्या पाछे,
मधुमल दीकरो चुपचाप बची-खुची मिठाई, खावणो
गरीब मजूरां अ कारीगरां में बाँट आयो।
मजूर हँसतो-हँसतो बोल्यो—
“भाया! अमारै खातर तो रोज नया साल है।
रोज री कमाई अमारो तिहार,
रोज री रोटली अमारो प्रसाद,
अ रोज रो पसीनो अमारो दीयो।”
अंत
मख्खीमल बाप खामोश रह गयो।
हाथ में रुपियो थ्यो,
पर जवाब जुबान पर कोनी आयो।
नया साल रो साच्चो संदेश यो है—
मख्खीमल रो रुपियो सबसे मोटो सही,
मधुमल तो छाया जिको।
पर मजूर अ कारीगर री नजर में—
जो रोज कमाई खाय,
वो ही रोज होली, रोज दिवाळी,
अ रोज नया साल मनावै।
😄
📜 ડિસ્કલેમર
આ રચના એક કલ્પિત વ્યંગાત્મક વાર્તા છે. અહીં દર્શાવેલા પાત્રો, ઘટનાઓ અને સંવાદો માત્ર હાસ્ય અને વિચારપ્રેરણા માટે છે. કોઈ પણ વ્યક્તિ, સમુદાય કે વ્યવસાય સાથે સીધો અથવા આડકતરો સંબંધ હોવો જરૂરી નથી.
આ વાર્તા મારવાડી ભાષા અને ગુજરાતી લિપિમાં રજૂ કરવામાં આવી છે, જેનુ ઉદ્દેશ લોકસંસ્કૃતિ, ભાષા અને જીવનશૈલીની મીઠાસને ઉજાગર કરવું છે.
પાઠકોએ કૃપા કરીને આને હાસ્ય અને કલ્પનાના દ્રષ્ટિકોણથી જ માણવું.
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